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यज्ञः - भगवान् विष्णु, 

इज्यः - पूजनीय, 

महेज्यः -सबसे अधिक उपासनीय, 

क्रतुः - यूपसंयुक्त यज्ञस्वरूप, 

सत्रम्- सत्पुरुषोंकी रक्षा करनेवाले, 

सतां गतिः -सत्पुरुषोंके परम प्रापणीय स्थान, 

सर्वदर्शी - समस्त प्राणियोंको और उनके कार्योंको देखनेवाले, 

विमुक्तात्मा - सांसारिक बन्धनसे रहित आत्मस्वरूप, 

सर्वज्ञः - सबको जाननेवाले, 

ज्ञानमुत्तमम् - सर्वोत्कृष्ट ज्ञानस्वरूप (४४५-४५४) ॥ ६१ ॥

सुव्रतः - प्रणतपालनादि श्रेष्ठ व्रतोंवाले, 

सुमुखः -सुन्दर और प्रसन्न मुखवाले, 

सूक्ष्मः - अणुसे भी अणु, 

सुघोषः - सुन्दर और गम्भीर वाणी बोलनेवाले, 

सुखदः -अपने भक्तोंको सब प्रकारसे सुख देनेवाले, 

सुहृत् - प्राणिमात्रपर अहैतुकी दया करनेवाले परम मित्र, 

मनोहरः - अपने रूप-लावण्य और मधुर भाषणादिसे सबके मनको हरनेवाले, 

जितक्रोधः - क्रोधपर विजय करनेवाले अर्थात् अपने साथ अत्यन्त अनुचित व्यवहार करनेवालेपर भी क्रोध न करनेवाले, 

वीरबाहुः -अत्यन्त पराक्रमशाली भुजाओंसे युक्त, 

विदारणः -अधर्मियोंको नष्ट करनेवाले (४५५-४६४) ॥ ६२ ॥

स्वापनः - प्रलयकाल में समस्त प्राणियों को अज्ञाननिद्रा में शयन करानेवाले, 

स्ववशः - स्वतन्त्र, 

व्यापी -आकाशकी भाँति सर्वव्यापी, 

नैकात्मा - प्रत्येक युगमें लोकोद्धारके लिये अनेक रूप धारण करनेवाले, 

नैककर्मकृत्-जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप तथा भिन्न-भिन्न अवतारोंमें मनोहर लीलारूप अनेक कर्म करनेवाले, 

वत्सरः - सबके निवासस्थान, 

वत्सलः -भक्तोंके परम स्नेही, 

वत्सी-वृन्दावनमें बछड़ोंका पालन करनेवाले, 

रत्नगर्भः - रत्नोंको अपने गर्भमें धारण करनेवाले समुद्ररूप, 

धनेश्वरः- सब प्रकारके धनोंके स्वामी (४६५-४७४) ॥ ६३ ॥

धर्मगुप् - धर्मकी रक्षा करनेवाले, 

धर्मकृत् - धर्मकी स्थापना करनेके लिये स्वयं धर्मका आचरण करनेवाले, 

धर्मी - सम्पूर्ण धर्मोंके आधार, 

सत् -सत्यस्वरूप, 

असत्- स्थूल जगत्स्वरूप, 

क्षरम् -सर्वभूतमय, 

अक्षरम् - अविनाशी, 

अविज्ञाता- क्षेत्रज्ञ जीवात्माको विज्ञाता कहते हैं, उनसे विलक्षण भगवान् विष्णु, 

सहस्त्रांशुः- हजारों किरणोंवाले सूर्यस्वरूप, 

विधाता - सबको अच्छी प्रकार धारण करनेवाले, 

कृतलक्षणः- श्रीवत्स आदि चिह्नोंको धारण करनेवाले (४७५-४८५) ॥६४॥

गभस्तिनेमिः - किरणोंके बीचमें सूर्यरूपसे स्थित,

सत्त्वस्थः - अन्तर्यामीरूपसे समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित रहनेवाले, 

सिंहः- भक्त प्रह्लादके लिये नृसिंहरूप धारण करनेवाले, 

भूतमहेश्वरः - सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वर, 

आदिदेवः - सबके आदि कारण और दिव्यस्वरूप, 

महादेवः - ज्ञानयोग और ऐश्वर्य आरि महिमाओंसे युक्त, 

देवेशः - समस्त देवोंके स्वामी 

देवभृद्गुरुः - देवोंका विशेषरूपसे भरण-पोषण करनेवाले, उनके परम गुरु (४८६-४९३) ॥ ६५॥

उत्तरः - संसार-समुद्रसे उद्धार करनेवाले और सर्वश्रेष्ठ, 

गोपतिः - गोपालरूपसे गायोंकी रक्षा करनेवाले, 

गोप्ता - समस्त प्राणियोंका पालन और रक्षा करनेवाले, 

ज्ञानगम्यः - ज्ञानके द्वारा जाननेमें आनेवाले, 

पुरातनः -सदा एकरस रहनेवाले, सबके आदि पुराणपुरुष, 

शरीरभूतभृत् - शरीरके उत्पादक पंचभूतोंका प्राणरूपसे पालन करनेवाले, 

भोक्ता - निरतिशय आनन्दपुंजोंको भोगनेवाले, 

कपीन्द्रः - बंदरोंके स्वामी श्रीराम, 

भूरिदक्षिणः - श्रीरामादि अवतारोंमें यज्ञ करते समय बहुत-सी दक्षिणा प्रदान करनेवाले (४९४-५०२) ॥ ६६ ॥ 

सोमपः - यज्ञोंमें देवरूपसे और यजमानरूपसे सोमरसका पान करनेवाले, 

अमृतपः समुद्र-मन्थनसे निकाला हुआ अमृत देवोंको पिलाकर स्वयं पीनेवाले, 

सोमः - ओषधियोंका पोषण करनेवाले चन्द्रमारूप, 

पुरुजित् - बहुतोंपर विजय लाभ करनेवाले, 

पुरुसत्तमः -विश्वरूप और अत्यन्त श्रेष्ठ, 

विनयः- दुष्टोंको दण्ड देनेवाले, 

जयः - सबपर विजय प्राप्त करनेवाले, 

सत्यसंधः - सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाले, 

दाशार्हः -दशार्हकुलमें प्रकट होनेवाले, 

सात्वतां पतिः- यादवोंके और अपने भक्तोंके स्वामी यानी उनका योगक्षेम चलानेवाले (५०३-५१२) ॥ ६७ ॥

जीवः - क्षेत्रज्ञरूपसे प्राणोंको धारण करनेवाले, 

विनयितासाक्षी - अपने शरणापन्न भक्तोंके विनयभावको तत्काल प्रत्यक्ष अनुभव करनेवाले, 

मुकुन्दः- मुक्तिदाता, 

अमितविक्रमः - वामनावतारमें पृथ्वी नापते समय अत्यन्त विस्तृत पैर रखनेवाले, 

अम्भोनिधिः -जलके निधान समुद्रस्वरूप, 

अनन्तात्मा -अनन्तमूर्ति, 

महोदधिशयः - प्रलयकालके महान् समुद्रमें शयन करनेवाले, 

अन्तकः प्राणियोंका संहार करनेवाले मृत्युस्वरूप (५१३-५२०) ॥ ६८ ॥

अजः - अकार भगवान् विष्णुका वाचक है, उससे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्मा, 

महार्हः - पूजनीय, स्वाभाव्यः - नित्य सिद्ध होनेके कारण स्वभावसे ही उत्पन्न न होनेवाले, 

जितामित्रः- रावण-शिशुपालादि शत्रुओंको जीतनेवाले, 

प्रमोदनः - स्मरणमात्रसे नित्य प्रमुदित करनेवाले, 

आनन्दः - आनन्दस्वरूप, 

नन्दनः - सबको प्रसन्न करनेवाले, 

नन्दः- सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न, 

सत्यधर्मा - धर्म-ज्ञानादि सब गुणोंसे युक्त, 

त्रिविक्रमः - तीन डगमें तीनों लोकोंको नापनेवाले (५२१-५३०) ॥ ६९ ॥

महर्षिः कपिलाचार्यः - सांख्यशास्त्रके प्रणेता भगवान् कपिलाचार्य, 

कृतज्ञः - किये हुएको जाननेवाले यानी अपने भक्तोंकी सेवाको बहुत मानकर अपनेको उनका ऋणी समझनेवाले,

मेदिनीपतिः - पृथ्वीके स्वामी, 

त्रिपदः - त्रिलोकीरूप तीन पैरोंवाले विश्वरूप, 

त्रिदशाध्यक्षः - देवताओंके स्वामी, 

महाशृङ्गः -मत्स्यावतारमें महान् सींग धारण करनेवाले, 

कृतान्तकृत्- स्मरण करनेवालोंके समस्त कर्मोंका अन्त करनेवाले (५३१-५३७) ॥ ७० ॥

महावराहः - हिरण्याक्षका वध करनेके लिये महावराहरूप धारण करनेवाले, 

गोविन्दः - नष्ट हुई पृथ्वीको पुनः प्राप्त कर लेनेवाले, 

सुषेणः - पार्षदोंके समुदायरूप सुन्दर सेनासे सुसज्जित, 

कनकाङ्गदी -सुवर्णका बाजूबंद धारण करनेवाले, 

गुह्यः- हृदयाकाशमें छिपे रहनेवाले, 

गभीरः- अतिशय गम्भीर स्वभाववाले, 

गहनः - जिनके स्वरूपमें प्रविष्ट होना अत्यन्त कठिन हो-ऐसे, 

गुप्तः - वाणी और मनसे जाननेमें न आनेवाले, 

चक्रगदाधरः - भक्तोंकी रक्षा करनेके लिये चक्र और गदा आदि दिव्य आयुधोंको धारण करनेवाले (५३८-५४६) ॥ ७१ ॥

वेधाः - सब कुछ विधान करनेवाले, 

स्वाङ्गः -कार्य करनेमें स्वयं ही सहकारी, 

अजितः - किसीके द्वारा न जीते जानेवाले, 

कृष्णः - श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण, 

दृढः - अपने स्वरूप और सामर्थ्यसे कभी भी च्युत न होनेवाले, 

सङ्कर्षणोऽच्युतः - प्रलयकालमें एक साथ सबका संहार करनेवाले और जिनका कभी किसी भी कारणसे पतन न हो सके ऐसे अविनाशी, 

वरुणः -जलके स्वामी वरुण देवता, 

वारुणः - वरुणके पुत्र वसिष्ठस्वरूप, 

वृक्षः - अश्वत्थवृक्षरूप, 

पुष्कराक्षः -हृदयकमलमें चिन्तन करनेसे प्रत्यक्ष होनेवाले, 

महामनाः -संकल्पमात्रसे उत्पत्ति, पालन और संहार आदि समस्त लीला करनेकी शक्तिवाले (५४७-५५७) ॥ ७२ ॥

भगवान् - उत्पत्ति और प्रलय, आना और जाना तथा विद्या और अविद्याको जाननेवाले एवं सर्वैश्वर्यादि छहों भगोंसे युक्त, 

भगहा- अपने भक्तोंका प्रेम बढ़ानेके लिये उनके ऐश्वर्यका हरण करनेवाले और प्रलयकालमें सबके ऐश्वर्यको नष्ट करनेवाले, 

आनन्दी - परमसुखस्वरूप, 

वनमाली - वैजयन्ती वनमाला धारण करनेवाले, 

हलायुधः - हलरूप शस्त्रको धारण करनेवाले, बलभद्रस्वरूप, 

आदित्यः - अदितिपुत्र वामनभगवान्, 

ज्योतिरादित्यः - सूर्यमण्डलमें विराजमान ज्योतिःस्वरूप, 

सहिष्णुः - समस्त द्वन्द्वोंको सहन करनेमें समर्थ, 

गतिसत्तमः - सत्पुरुषोंके परम गन्तव्य और सर्वश्रेष्ठ (५५८-५६६) ॥ ७३ ॥

सुधन्वा - अतिशय सुन्दर शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले, 

खण्डपरशुः - शत्रुओंका खण्डन करनेवाले, फरसेको धारण करनेवाले परशुरामस्वरूप, 

दारुणः -सन्मार्गविरोधियोंके लिये महान् भयंकर, 

द्रविणप्रदः - अर्थार्थी भक्तोंको धन-सम्पत्ति प्रदान करनेवाले, 

दिविस्पृक्- स्वर्गलोकतक व्याप्त, 

सर्वदृग्व्यासः - सबके द्रष्टा एवं वेदका विभाग करनेवाले श्रीकृष्णद्वैपायनस्वरूप, 

वाचस्पतिरयोनिजः -विद्याके स्वामी तथा बिना योनिके स्वयं ही प्रकट होनेवाले (५६७-५७३) ॥ ७४ ॥ 

त्रिसामा - देवव्रत आदि तीन सामश्रुतियोंद्वारा जिनकी स्तुति की जाती है-ऐसे परमेश्वर, 

सामगः -सामवेदका गान करनेवाले, 

साम - सामवेदस्वरूप, 

निर्वाणम् - परमशान्तिके निधान परमानन्दस्वरूप, 

भेषजम् - संसाररोगकी ओषधि, 

भिषक् - संसाररोगका नाश करनेके लिये गीतारूप उपदेशामृतका पान करानेवाले परम वैद्य, 

संन्यासकृत् - मोक्षके लिये संन्यासाश्रम और संन्यासयोगका निर्माण करनेवाले, 

शमः - उपशमताका उपदेश देनेवाले, 

शान्तः - परमशान्ताकृति, 

निष्ठा-सबकी स्थितिके आधार अधिष्ठानस्वरूप, 

शान्तिः -परम शान्तिस्वरूप, 

परायणम् - मुमुक्षु पुरुषोंके परम प्राप्य स्थान (५७४-५८५) ॥ ७५ ॥

शुभाङ्गः - अति मनोहर परम सुन्दर अंगोंवाले, 

शान्तिदः - परमशान्ति देनेवाले, 

स्त्रष्टा - सर्गके आदिमें सबकी रचना करनेवाले, 

कुमुदः - पृथ्वीपर प्रसन्नतापूर्वक लीला करनेवाले, 

कुवलेशयः - जलमें शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले, 

गोहितः गोपालरूपसे गायोंका और अवतार धारण करके भार उतारकर पृथ्वीका हित करनेवाले, 

गोपतिः- पृथ्वीके और गायोंके स्वामी, 

गोप्ता - अवतार धारण करके सबके सम्मुख प्रकट होते समय अपनी मायासे अपने स्वरूपको आच्छादित करनेवाले,

वृषभाक्षः- समस्त कामनाओंकी वर्षा करनेवाली कृपादृष्टिसे युक्त, 

वृषप्रियः - धर्मसे प्यार करनेवाले (५८६-५९५) ॥ ७६ ॥

अनिवर्ती - रणभूमिमें और धर्मपालनमें पीछे न हटनेवाले, 

निवृत्तात्मा - स्वभावसे ही विषय-वासनारहित नित्य शुद्ध मनवाले, 

संक्षेप्ता - विस्तृत जगत्‌को क्षणभरमें संक्षिप्त यानी सूक्ष्मरूपसे करनेवाले, 

क्षेमकृत् - शरणागतकी रक्षा करनेवाले, 

शिवः - स्मरणमात्रसे पवित्र करनेवाले कल्याणस्वरूप, 

श्रीवत्सवक्षाः श्रीवत्स नामक चिह्नको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले, 

श्रीवासः- श्रीलक्ष्मीजीके वासस्थान, 

श्रीपतिः परमशक्तिरूपा श्रीलक्ष्मीजीके स्वामी, 

श्रीमतां वरः - सब प्रकारकी सम्पत्ति और ऐश्वर्यसे युक्त ब्रह्मादि समस्त लोकपालोंसे श्रेष्ठ (५९६-६०४) ॥ ७७ ॥

श्रीदः - भक्तोंको श्री प्रदान करनेवाले, 

श्रीशः -लक्ष्मीके नाथ, 

श्रीनिवासः- श्रीलक्ष्मीजीके अन्तःकरणमें नित्य निवास करनेवाले, 

श्रीनिधिः समस्त श्रियोंके आधार, 

श्रीविभावनः - सब मनुष्योंके लिये उनके कर्मानुसार नाना प्रकारके ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले, 

श्रीधरः - जगज्जननी श्रीको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले, 

श्रीकरः - स्मरण, स्तवन और अर्चन आदि करनेवाले भक्तोंके लिये श्रीका विस्तार करनेवाले, 

श्रेयः - कल्याणस्वरूप, 

श्रीमान्- सब प्रकारकी श्रियोंसे युक्त, 

लोकत्रयाश्रयः - तीनों लोकोंके आधार (६०५-६१४) ॥ ७८ ॥

स्वक्षः - मनोहर कृपाकटाक्षसे युक्त परम सुन्दर आँखोंवाले, 

स्वङ्गः - अतिशय कोमल परम सुन्दर मनोहर अंगोंवाले, 

शतानन्दः- लीलाभेदसे सैकड़ों विभागोंमें विभक्त आनन्दस्वरूप, 

नन्दिः परमानन्दविग्रह, 

ज्योतिर्गणेश्वरः - नक्षत्रसमुदायोंके ईश्वर, 

विजितात्मा -जीते हुए मनवाले, 

अविधेयात्मा - जिनके असली स्वरूपका किसी प्रकार भी वर्णन नहीं किया जा सके-ऐसे अनिर्वचनीयस्वरूप,

सत्कीर्तिः - सच्ची कीर्तिवाले, 

छिन्नसंशयः- हथेली में रखे हुए बेरके समान सम्पूर्ण विश्वको प्रत्यक्ष देखनेवाले होनेसे सब प्रकारके संशयोंसे रहित (६१५-६२३) ॥ ७९ ॥

उदीर्णः - सब प्राणियोंसे श्रेष्ठ, 

सर्वतश्चक्षुः -समस्त वस्तुओंको सब दिशाओंमें सदा-सर्वदा देखनेकी शक्तिवाले, 

अनीशः - जिनका दूसरा कोई शासक न हो-ऐसे स्वतन्त्र, 

शाश्वतस्थिरः - सदा एकरस स्थिर रहनेवाले, निर्विकार, 

भूशयः - लंकागमनके लिये मार्गकी याचना करते समय समुद्रतटकी भूमिपर शयन करनेवाले, 

भूषणः - स्वेच्छासे नाना अवतार लेकर अपने चरणचिह्नोंसे भूमिकी शोभा बढ़ानेवाले, 

भूतिः- सत्तास्वरूप और समस्त विभूतियोंके आधारस्वरूप, 

विशोकः - सब प्रकारसे शोकरहित, 

शोकनाशनः - स्मृतिमात्रसे भक्तोंके शोकका समूल नाश करनेवाले (६२४-६३२) ॥ ८० ॥

अर्चिष्मान् - चन्द्र-सूर्य आदि समस्त ज्योतियोंको देदीप्यमान करनेवाली अतिशय प्रकाशमय अनन्त किरणोंसे युक्त,

अर्चितः - समस्त लोकोंके पूज्य ब्रह्मादिसे भी पूजे जानेवाले, 

कुम्भः - घटकी भाँति सबके निवासस्थान, 

विशुद्धात्मा - परम शुद्ध निर्मल आत्मस्वरूप, 

विशोधनः - स्मरणमात्रसे समस्त पापोंका नाश करके भक्तोंके अन्तःकरणको परम शुद्ध कर देनेवाले, 

अनिरुद्धः - जिनको कोई बाँधकर नहीं रख सके-ऐसे चतुर्व्यहमें अनिरुद्धस्वरूप, 

अप्रतिरथः - प्रतिपक्षसे रहित, 

प्रद्युम्नः - परमश्रेष्ठ अपार धनसे युक्त चतुर्व्यहमें प्रद्युम्नस्वरूप, 

अमितविक्रमः - अपार पराक्रमी (६३३-६४१) ॥ ८१ ॥

कालनेमिनिहा - कालनेमि नामक असुरको मारनेवाले, 

वीरः - परम शूरवीर, 

शौरिः - शूरकुलमें उत्पन्न होनेवाले श्रीकृष्णस्वरूप, 

शूरजनेश्वरः - अतिशय शूरवीरताके कारण इन्द्रादि शूरवीरोंके भी इष्ट, 

त्रिलोकात्मा - अन्तर्यामीरूपसे तीनों लोकोंके आत्मा, 

त्रिलोकेशः - तीनों लोकोंके स्वामी, 

केशवः - सूर्यकी किरणरूप केशवाले, 

केशिहा -केशी नामक असुरको मारनेवाले, 

हरिः- स्मरणमात्रसे समस्त पापोंका और समूल संसारका हरण करनेवाले (६४२-६५०) ॥ ८२ ॥

कामदेवः - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थोंको चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा अभिलषित समस्त कामनाओंके अधिष्ठाता परमदेव, 

कामपालः -सकामी भक्तोंकी कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले, 

कामी -स्वभावसे ही पूर्ण काम और अपने प्रियतमोंको चाहनेवाले, 

कान्तः - परम मनोहर श्यामसुन्दर देह धारण करनेवाले गोपीजनवल्लभ, 

कृतागमः - समस्त वेद और शास्त्रोंको रचनेवाले, 

अनिर्देश्यवपुः - जिसके दिव्य स्वरूपका किसी प्रकार भी वर्णन नहीं किया जा सके-ऐसे अनिर्वचनीय शरीरवाले,

विष्णुः - शेषशायी भगवान् विष्णु, 

वीरः - बिना ही पैरोंके गमन करने आदि अनेक दिव्य शक्तियोंसे युक्त, 

अनन्तः -जिनके स्वरूप, शक्ति, ऐश्वर्य, सामर्थ्य और गुणोंका कोई भी पार नहीं पा सकता- ऐसे अविनाशी गुण, प्रभाव और शक्तियोंसे युक्त, 

धनञ्जयः -अर्जुनरूपसे दिग्विजयके समय बहुत-सा धन जीतकर लानेवाले (६५१-६६०) ॥ ८३ ॥

ब्रह्मण्यः - तप, वेद, ब्राह्मण और ज्ञानकी रक्षा करनेवाले, 

ब्रह्मकृत् - पूर्वोक्त तप आदिकी रचनावाले, 

ब्रह्मा - ब्रह्मारूपसे जगत्को उत्पन्न करनेवाले, 

ब्रह्म - सच्चिदानन्दस्वरूप, 

ब्रह्मविवर्धनः - पूर्वोक्त ब्रह्मशब्दवाची तप आदिकी वृद्धि करनेवाले, 

ब्रह्मवित् -वेद और वेदार्थको पूर्णतया जाननेवाले, 

ब्राह्मणः -समस्त वस्तुओंको ब्रह्मरूपसे देखनेवाले, 

ब्रह्मी - ब्रह्मशब्दवाची तपादि समस्त पदार्थोंके अधिष्ठान, 

ब्रह्मज्ञः - अपने आत्मस्वरूप ब्रह्मशब्दवाची वेदको पूर्णतया यथार्थ जाननेवाले, 

ब्राह्मणप्रियः -ब्राह्मणोंके परम प्रिय और ब्राह्मणोंको अतिशय प्रिय माननेवाले (६६१-६७०) ॥ ८४ ॥

महाक्रमः - बड़े वेगसे चलनेवाले, 

महाकर्मा -भिन्न-भिन्न अवतारोंमें नाना प्रकारके महान् कर्म करनेवाले, 

महातेजाः - जिसके तेजसे समस्त तेजस्वी देदीप्यमान होते हैं- ऐसे महान् तेजस्वी, 

महोरगः -बड़े भारी सर्प यानी वासुकिस्वरूप, 

महाक्रतुः -महान् यज्ञस्वरूप, 

महायज्वा - बड़े यजमान यानी लोकसंग्रहके लिये बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले, 

महायज्ञः - जपयज्ञ आदि भगवत्प्राप्तिके साधनरूप, समस्त यज्ञ जिनकी विभूतियाँ हैं- ऐसे महान् यज्ञस्वरूप, 

महाहविः - ब्रह्मरूप अग्निमें हवन किये जानेयोग्य प्रपंचरूप हवि जिनका स्वरूप है-ऐसे महान् हविःस्वरूप (६७१-६७८) ॥ ८५ ॥

स्तव्यः - सबके द्वारा स्तुति किये जानेयोग्य, 

स्तवप्रियः - स्तुतिसे प्रसन्न होनेवाले, 

स्तोत्रम् - जिनके द्वारा भगवान्के गुण-प्रभावका कीर्तन किया जाता है, वह स्तोत्र, 

स्तुतिः - स्तवनक्रियास्वरूप, 

स्तोता - स्तुति करनेवाले, 

रणप्रियः - युद्धमें प्रेम करनेवाले, 

पूर्णः -समस्त ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्य और गुणोंसे परिपूर्ण, 

पूरयिता - अपने भक्तोंको सब प्रकारसे परिपूर्ण करनेवाले, 

पुण्यः - स्मरणमात्रसे पापोंका नाश करनेवाले पुण्यस्वरूप, 

पुण्यकीर्तिः - परमपावन कीर्तिवाले, 

अनामयः - आन्तरिक और बाह्य - सब प्रकारकी व्याधियोंसे रहित (६७९-६८९) ॥ ८६ ॥

मनोजवः - मनकी भाँति वेगवाले, 

तीर्थकरः -समस्त विद्याओंके रचयिता और उपदेशकर्ता, 

वसुरेताः -हिरण्यमय पुरुष (प्रथम पुरुष-सृष्टिका बीज) जिनका वीर्य है-ऐसे सुवर्णवीर्य, 

वसुप्रदः - प्रचुर धन प्रदान करनेवाले, 

वसुप्रदः - अपने भक्तोंको मोक्षरूप महान् धन देनेवाले, 

वासुदेवः - वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण, 

वसुः -सबके अन्तःकरणमें निवास करनेवाले, 

वसुमनाः -समानभावसे सबमें निवास करनेकी शक्तिसे युक्त मनवाले, 

हविः - यज्ञमें हवन किये जानेयोग्य हविः स्वरूप (६९०-६९८) ॥ ८७ ॥

सद्गतिः - सत्पुरुषोंद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य गतिस्वरूप, 

सत्कृतिः - जगत्की रक्षा आदि सत्कार्य करनेवाले, 

सत्ता-सदा-सर्वदा विद्यमान सत्तास्वरूप, 

सद्भूतिः - बहुत प्रकारसे बहुत रूपोंमें भासित होनेवाले, 

सत्परायणः - सत्पुरुषोंके परम प्रापणीय स्थान, 

शूरसेनः - हनुमानादि श्रेष्ठ शूरवीर योद्धाओंसे युक्त सेनावाले, 

यदुश्रेष्ठः - यदुवंशियोंमें सर्वश्रेष्ठ, 

सन्निवासः - सत्पुरुषोंके आश्रय, 

सुयामुनः - जिनके परिकर यमुना-तटनिवासी गोपालबाल आदि अति सुन्दर हैं, ऐसे श्रीकृष्ण (६९९-७०७) ॥ ८८ ॥

भूतावासः - समस्त प्राणियोंके मुख्य निवासस्थान, 

वासुदेवः - अपनी मायासे जगत्को आच्छादित करनेवाले परमदेव, 

सर्वासुनिलयः - समस्त प्राणियोंके आधार, 

अनलः - अपार शक्ति और सम्पत्तिसे युक्त, 

दर्पहा -धर्मविरुद्ध मार्गमें चलनेवालोंके घमण्डको नष्ट करनेवाले, 

दर्पदः - अपने भक्तोंको विशुद्ध गौरव देनेवाले, 

दृप्तः - नित्यानन्दमग्न, 

दुर्धरः - बड़ी कठिनतासे हृदयमें धारित होनेवाले, 

अपराजितः - दूसरोंसे अजित अर्थात् भक्तपरवश (७०८-७१६) ॥ ८९ ॥

विश्वमूर्तिः - समस्त विश्व ही जिनकी मूर्ति है-ऐसे विराट्स्वरूप, 

महामूर्तिः - बड़े रूपवाले, 

दीप्तमूर्तिः - स्वेच्छासे धारण किये हुए देदीप्यमान स्वरूपसे युक्त, 

अमूर्तिमान् - जिनकी कोई मूर्ति नहीं-ऐसे निराकार, 

अनेकमूर्तिः - नाना अवतारोंमें स्वेच्छासे लोगोंका उपकार करनेके लिये बहुत मूर्तियोंको धारण करनेवाले, 

अव्यक्तः - अनेक मूर्ति होते हुए भी जिनका स्वरूप किसी प्रकार व्यक्त न किया जा सके-ऐसे अप्रकटस्वरूप,

शतमूर्तिः - सैकड़ों मूर्तियोंवाले, 

शताननः - सैकड़ों मुखवाले (७१७-७२४) ॥ ९० ॥ 

एकः - सब प्रकारके भेद-भावोंसे रहित अद्वितीय, 

नैकः - उपाधिभेदसे अनेक, 

सवः - जिनमें सोमनामकी ओषधिका रस निकाला जाता है - ऐसे यज्ञस्वरूप, 

कः - सुखस्वरूप, 

किम् - विचारणीय ब्रह्मस्वरूप, 

यत् - स्वतः सिद्ध, 

तत्-विस्तार करनेवाले, 

पदमनुत्तमम् - मुमुक्षु पुरुषोंद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य अत्युत्तम परमपद, 

लोकबन्धुः - समस्त प्राणियोंके हित करनेवाले परम मित्र, 

लोकनाथः - सबके द्वारा याचना किये जानेयोग्य लोकस्वामी, 

माधवः -मधुकुलमें उत्पन्न होनेवाले, 

भक्तवत्सलः - भक्तोंसे प्रेम करनेवाले (७२५-७३६) ॥ ९१ ॥

सुवर्णवर्णः - सोनेके समान पीतवर्णवाले, 

हेमाङ्गः -सोनेके समान सुडौल चमकीले अंगोंवाले, 

वराङ्गः - परम श्रेष्ठ अंग-प्रत्यंगोंवाले, 

चन्दनाङ्गदी - चन्दन के लेप और बाजूबंदसे सुशोभित, 

वीरहा - राग-द्वेष आदि प्रबल शत्रुओंसे डरकर शरणमें आनेवालोंके अन्तःकरणमें उनका अभाव कर देनेवाले, 

विषमः -जिनके समान दूसरा कोई नहीं-ऐसे अनुपम, 

शून्यः - समस्त विशेषणोंसे रहित, 

घृताशीः - अपने आश्रितजनोंके लिये कृपासे सने हुए द्रवित संकल्प करनेवाले, 

अचलः - किसी प्रकार भी विचलित न होनेवाले-अविचल, 

चलः - वायुरूपसे सर्वत्र गमन करनेवाले (७३७-७४६) ॥ ९२ ॥

अमानी - स्वयं मान न चाहनेवाले, अभिमानरहित, 

मानदः - दूसरोंको मान देनेवाले, 

मान्यः - सबके पूजनेयोग्य माननीय, 

लोकस्वामी - चौदह भुवनोंके स्वामी, 

त्रिलोकधृक् - तीनों लोकोंको धारण करनेवाले, 

सुमेधाः - अति उत्तम सुन्दर बुद्धिवाले, 

मेधजः - यज्ञमें प्रकट होनेवाले, 

धन्यः - नित्य कृतकृत्य होनेके कारण सर्वथा धन्यवादके पात्र, 

सत्यमेधाः – सच्ची और श्रेष्ठ बुद्धिवाले, 

धराधरः - अनन्तभगवान्के रूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले (७४७-७५६) ॥ ९३ ॥

तेजोवृषः - आदित्यरूपसे तेजकी वर्षा करनेवाले और भक्तोंपर अपने अमृतमय तेजकी वर्षा करनेवाले, 

द्युतिधरः - परम कान्तिको धारण करनेवाले, 

सर्वशस्त्रभृतां वरः - समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ, 

प्रग्रहः - भक्तोंके द्वारा अर्पित पत्र-पुष्पादिको ग्रहण करनेवाले, 

निग्रहः - सबका निग्रह करनेवाले, 

व्यग्रः -अपने भक्तोंको अभीष्ट फल देनेमें लगे हुए, 

नैकशृङ्गः -नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातरूप चार सींगोंको धारण करनेवाले शब्दब्रह्मस्वरूप, 

गदाग्रजः - गदसे पहले जन्म लेनेवाले (७५७-७६४) ॥ ९४ ॥

चतुर्मूर्तिः - राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्नरूप चार मूर्तियोंवाले, 

चतुर्बाहुः - चार भुजाओंवाले, 

चतुर्यूहः – वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध - इन चार व्यूहोंसे युक्त, 

चतुर्गतिः - सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्यरूप चार परम गतिस्वरूप, 

चतुरात्मा- मन, बुद्धि, अहंकार और चित्तरूप चार अन्तःकरणवाले, 

चतुर्भावः- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - इन चारों पुरुषार्थोंके उत्पत्तिस्थान, 

चतुर्वेदवित्- चारों वेदोंके अर्थको भलीभाँति जाननेवाले, 

एकपात् - एक पादवाले यानी एक पाद (अंश)-से समस्त विश्वको व्याप्त करनेवाले (७६५-७७२) ॥ ९५ ॥

समावर्तः - संसारचक्रको भलीभाँति घुमानेवाले, 

अनिवृत्तात्मा - सर्वत्र विद्यमान होनेके कारण जिनका आत्मा कहींसे भी (हटा हुआ) नहीं है, ऐसे, 

दुर्जयः - किसीसे भी जीतनेमें न आनेवाले, 

दुरतिक्रमः -जिनकी आज्ञाका कोई उल्लंघन नहीं कर सके ऐसे, 

दुर्लभः - बिना भक्तिके प्राप्त न होनेवाले, 

दुर्गमः -कठिनतासे जाननेमें आनेवाले, 

दुर्गः - कठिनतासे प्राप्त होनेवाले, 

दुरावासः - बड़ी कठिनतासे योगिजनोंद्वारा हृदयमें बसाये जानेवाले, 

दुरारिहा - दुष्ट मार्गमें चलनेवाले दैत्योंका वध करनेवाले (७७३-७८१) ॥ ९६ ॥

शुभाङ्गः - कल्याणकारक सम्बोधन [नाम]-वाले, 

लोकसारङ्गः - लोकोंके सारको ग्रहण करनेवाले, \

सुतन्तुः -सुन्दर विस्तृत जगद्रूप तन्तुवाले, 

तन्तुवर्धनः- पूर्वोक्त जगत्-तन्तुको बढ़ानेवाले, 

इन्द्रकर्मा - इन्द्रके समान कर्मवाले, 

महाकर्मा-बड़े-बड़े कर्म करनेवाले, 

कृतकर्मा - जो समस्त कर्तव्य कर्म कर चुके हों, जिनका कोई कर्तव्य शेष न रहा हो ऐसे कृतकृत्य, 

कृतागमः - अपने अवतारयोनि के अनुरूप अनेक कार्यों को पूर्ण करनेके लिये अवतार धारण करके आनेवाले (७८२-७८९) ॥ ९७ ॥

उद्भवः - स्वेच्छासे श्रेष्ठ जन्म धारण करनेवाले, 

सुन्दरः - सबसे अधिक भाग्यशाली होनेके कारण परम सुन्दर, 

सुन्दः - परम करुणाशील, 

रत्ननाभः - रत्नके समान सुन्दर नाभिवाले, 

सुलोचनः - सुन्दर नेत्रोंवाले, 

अर्कः - ब्रह्मादि पूज्य पुरुषोंके भी पूजनीय, 

वाजसनः -याचकोंको अन्न प्रदान करनेवाले, 

शृङ्गी - प्रलयकालमें सींगयुक्त मत्स्यविशेषका रूप धारण करनेवाले. 

जयन्तः - शत्रुओंको पूर्णतया जीतनेवाले, 

सर्वविज्ञ्जयी - सर्वज्ञ यानी सब कुछ जाननेवाले और सबको जीतनेवाले (७९०-७९९) ॥ ९८ ॥

सुवर्णबिन्दुः - सुन्दर अक्षर और बिन्दुसे युक्त ओंकारस्वरूप नाम ब्रह्म, 

अक्षोभ्यः - किसीके द्वारा भी क्षुभित न किये जा सकनेवाले, 

सर्ववागीश्वरेश्वरः -समस्त वाणीपतियोंके यानी ब्रह्मादिके भी स्वामी, 

महाहृदः - ध्यान करनेवाले जिसमें गोता लगाकर आनन्दमें मग्न होते हैं, ऐसे परमानन्दके महान् सरोवर, 

महागर्तः - मायारूप महान् गर्तवाले, 

महाभूतः - त्रिकालमें कभी नष्ट न होनेवाले महाभूतस्वरूप, 

महानिधिः -सबके महान् निवासस्थान (८००-८०६) ॥ ९९ ॥ 

कुमुदः - कु अर्थात् पृथ्वीको उसका भार उतारकर प्रसन्न करनेवाले, 

कुन्दरः - हिरण्याक्षको मारनेके लिये पृथ्वीको विदीर्ण करनेवाले, 

कुन्दः - कश्यपजीको पृथ्वी प्रदान करनेवाले, 

पर्जन्यः - बादलकी भाँति समस्त इष्ट वस्तुओंकी वर्षा करनेवाले, 

पावनः -स्मरणमात्रसे पवित्र करनेवाले, 

अनिलः - सदा प्रबुद्ध रहनेवाले, 

अमृताशः - जिनकी आशा कभी विफल न हो-ऐसे अमोघसंकल्प, 

अमृतवपुः - जिनका कलेवर कभी नष्ट न हो-ऐसे नित्यविग्रह, 

सर्वज्ञः - सदा-सर्वदा सब कुछ जाननेवाले, 

सर्वतोमुखः - सब ओर मुखवाले यानी जहाँ कहीं भी उनके भक्त भक्तिपूर्वक पत्र-पुष्पादि जो कुछ भी अर्पण करें, उसे भक्षण करनेवाले (८०७-८१६) ॥ १०० ॥

सुलभः - नित्य-निरन्तर चिन्तन करनेवालेको और एकनिष्ठ श्रद्धालु भक्त को बिना ही परिश्रमके सुगमतासे प्राप्त होनेवाले, 

सुव्रतः - सुन्दर भोजन करनेवाले यानी अपने भक्तोंद्वारा प्रेमपूर्वक अर्पण किये हुए पत्र-पुष्पादि मामूली भोजनको भी परम श्रेष्ठ मानकर खानेवाले, 

सिद्धः - स्वभावसे ही समस्त सिद्धियोंसे युक्त, 

शत्रुजित् - देवता और सत्पुरुषोंके शत्रुओंको अपने शत्रु मानकर जीतनेवाले, 

शत्रुतापनः - शत्रुओंको तपानेवाले, 

न्यग्रोधः-वटवृक्षरूप, 

उदुम्बरः - कारणरूपसे आकाशके भी ऊपर रहनेवाले, 

अश्वत्थः - पीपलवृक्षस्वरूप, 

चाणूरान्ध्रनिषूदनः - चाणूर नामक अन्ध्रजातिके वीर मल्लको मारनेवाले (८१७-८२५) ॥ १०१ ॥

सहस्त्रार्चिः - अनन्त किरणोंवाले, 

सप्तजिह्वः -काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी और विश्वरुचि - इन सात जिह्वावाले अग्निस्वरूप, 

सप्तैधाः - सात दीप्तिवाले अग्निस्वरूप, 

सप्तवाहनः - सात घोड़ोंवाले सूर्यरूप, 

अमूर्तिः -मूर्तिरहित निराकार, 

अनघः - सब प्रकारसे निष्पाप, 

अचिन्त्यः - किसी प्रकार भी चिन्तन करनेमें न आनेवाले, 

भयकृत् - दुष्टोंको भयभीत करनेवाले, 

भयनाशनः - स्मरण करनेवालोंके और सत्पुरुषोंके भयका नाश करनेवाले (८२६-८३४) ॥ १०२ ॥

अणुः - अत्यन्त सूक्ष्म, 

बृहत् - सबसे बड़े, 

कृशः - अत्यन्त पतले और हलके, 

स्थूलः - अत्यन्त मोटे और भारी, 

गुणभृत्- समस्त गुणोंको धारण करनेवाले, 

निर्गुणः - सत्त्व, रज और तम - इन तीनों गुणोंसे रहित, 

महान् - गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और ज्ञान आदिकी अतिशयताके कारण परम महत्त्वसम्पन्न, 

अधृतः - जिनको कोई भी धारण नहीं कर सकता-ऐसे निराधार, 

स्वधृतः - अपने-आपसे धारित यानी अपनी ही महिमामें स्थित, 

स्वास्यः - सुन्दर मुखवाले, 

प्राग्वंशः - जिनसे समस्त वंशपरम्परा आरम्भ हुई है-ऐसे समस्त पूर्वजोंके भी पूर्वज आदिपुरुष, 

वंशवर्द्धनः - जगत्-प्रपंचरूप वंशको और यादव-वंशको बढ़ानेवाले (८३५-८४६) ॥ १०३ ॥

भारभृत् - शेषनाग आदिके रूपमें पृथ्वीका भार उठानेवाले और अपने भक्तोंके योगक्षेमरूप भारको वहन करनेवाले,

कथितः - वेद-शास्त्र और महापुरुषोंद्वारा जिनके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपका बारंबार कथन किया गया है, ऐसे सबके द्वारा वर्णित, 

योगी - नित्य समाधियुक्त, 

योगीशः - समस्त योगियोंके स्वामी, 

सर्वकामदः - समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, 

आश्रमः - सबको विश्राम देनेवाले, 

श्रमणः - दुष्टोंको संतप्त करनेवाले, 

क्षामः प्रलयकालमें सब प्रजाका क्षय करनेवाले, 

सुपर्णः - वेदरूप सुन्दर पत्तोंवाले (संसारवृक्षस्वरूप), 

वायुवाहनः - वायुको गमन करनेके लिये शक्ति देनेवाले (८४७-८५६) ॥ १०४॥

धनुर्धरः - धनुषधारी श्रीराम, 

धनुर्वेदः - धनुर्विद्याको जाननेवाले श्रीराम, 

दण्डः - दमन करनेवालोंकी दमनशक्ति, 

दमयिता - यम और राजा आदिके रूपमें दमन करनेवाले, 

दमः - दण्डका कार्य यानी जिनको दण्ड दिया जाता है, उनका सुधार, 

अपराजितः - शत्रुओंद्वारा पराजित न होनेवाले, 

सर्वसहः - सब कुछ सहन करनेकी सामर्थ्यसे युक्त, अतिशय तितिक्षु, 

नियन्ता - सबको अपने-अपने कर्तव्यमें नियुक्त करनेवाले, 

अनियमः - नियमोंसे न बँधे हुए, जिनका कोई भी नियन्त्रण करनेवाला नहीं, ऐसे परम स्वतन्त्र, 

अयमः - जिनका कोई शासक नहीं अथवा मृत्युरहित (८५७-८६६) ॥ १०५ ॥ 

सत्त्ववान्-बल, वीर्य, सामर्थ्य आदि समस्त सत्त्वोंसे सम्पन्न, 

सात्त्विकः - सत्त्वगुण-प्रधान विग्रह, 

सत्यः - सत्य-भाषणस्वरूप, 

सत्यधर्मपरायणः - यथार्थ भाषण और धर्मके परम आधार, 

अभिप्रायः -प्रेमीजन जिनको चाहते हैं- ऐसे परम इष्ट, 

प्रियार्हः -अत्यन्त प्रिय वस्तु समर्पण करनेके लिये योग्य पात्र, 

अर्हः - सबके परम पूज्य; 

प्रियकृत्- भजनेवालोंका प्रिय करनेवाले, 

प्रीतिवर्धनः - अपने प्रेमियोंके प्रेमको बढ़ानेवाले (८६७-८७५) ॥ १०६ ॥

विहायसगतिः - आकाशमें गमन करनेवाले, 

ज्योतिः - स्वयंप्रकाशस्वरूप, 

सुरुचिः - सुन्दर रुचि और कान्तिवाले, 

हुतभुक् - यज्ञमें हवन की हुई समस्त हविको अग्निरूपसे भक्षण करनेवाले, 

विभुः -सर्वव्यापी, 

रविः - समस्त रसोंका शोषण करनेवाले सूर्य, 

विरोचनः - विविध प्रकारसे प्रकाश फैलानेवाले,

सूर्यः - शोभाको प्रकट करनेवाले, 

सविता - समस्त जगत्को प्रसव यानी उत्पन्न करनेवाले, 

रविलोचनः -सूर्यरूप नेत्रोंवाले (८७६-८८५) ॥ १०७ ॥

अनन्तः - सब प्रकारसे अन्तरहित, 

हुतभुक् -यज्ञमें हवन की हुई सामग्रीको उन-उन देवताओंके रूपमें भक्षण करनेवाले, 

भोक्ता - प्रकृतिको भोगनेवाले, 

सुखदः - भक्तोंको दर्शनरूप परम सुख देनेवाले, 

नैकजः - धर्मरक्षा, साधुरक्षा आदि परम विशुद्ध हेतुओंसे स्वेच्छापूर्वक अनेक जन्म धारण करनेवाले, 

अग्रजः - सबसे पहले जन्मनेवाले आदिपुरुष, 

अनिर्विण्णः - पूर्णकाम होनेके कारण विरक्तिसे रहित, 

सदामर्षी - सत्पुरुषोंपर क्षमा करनेवाले, 

लोकाधिष्ठानम् - समस्त लोकोंके आधार, 

अद्भुतः -अत्यन्त आश्चर्यमय (८८६-८९५) ॥ १०८ ॥

सनात् - अनन्तकालस्वरूप, 

सनातनतमः - सबके कारण होनेसे ब्रह्मादि पुरुषोंकी अपेक्षा भी परम पुराणपुरुष, 

कपिलः - महर्षि कपिल, 

कपिः - सूर्यदेव, 

अप्ययः - सम्पूर्ण जगत्के लयस्थान, 

स्वस्तिदः -परमानन्दरूप मंगल देनेवाले, 

स्वस्तिकृत्- आश्रितजनोंका करनेवाले, 

स्वस्ति - कल्याणस्वरूप, 

स्वस्तिभुक् - भक्तोंके परम कल्याणकी रक्षा करनेवाले, 

स्वस्तिदक्षिणः - कल्याण करनेमें समर्थ और शीघ्र कल्याण करनेवाले (८९६-९०५) ॥ १०९ ॥

अरौद्रः - सब प्रकारके रुद्र (क्रूर) -भावोंसे रहित शान्तमूर्ति, 

कुण्डली - सूर्यके समान प्रकाशमान मकराकृत कुण्डलोंको धारण करनेवाले, 

चक्री- सुदर्शनचक्रको धारण करनेवाले, 

विक्रमी - सबसे विलक्षण पराक्रमशील, 

ऊर्जितशासनः - जिनका श्रुति-स्मृतिरूप शासन अत्यन्त श्रेष्ठ है-ऐसे अतिश्रेष्ठ शासन करनेवाले, 

शब्दातिगः -शब्दकी जहाँ पहुँच नहीं, ऐसे वाणीके अविषय, 

शब्दसहः - समस्त वेदशास्त्र जिनकी महिमाका बखान करते हैं, ऐसे, 

शिशिरः - त्रितापपीड़ितोंको शान्ति देनेवाले शीतलमूर्ति, 

शर्वरीकरः - ज्ञानियोंकी रात्रि संसार और अज्ञानियोंकी रात्रि ज्ञान- इन दोनोंको उत्पन्न करनेवाले (९०६-९१४) ॥ ११० ॥ 

अक्रूरः- सब प्रकारके क्रूरभावोंसे रहित, 

पेशलः - मन, वाणी और कर्म - सभी दृष्टियोंसे सुन्दर होनेके कारण परम सुन्दर, 

दक्षः - सब प्रकारसे समृद्ध, परमशक्तिशाली और क्षणमात्रमें बड़े-से-बड़ा कार्य कर देनेवाले महान् कार्यकुशल,

दक्षिणः -संहारकारी, 

क्षमिणां वरः - क्षमा करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ, 

विद्वत्तमः - विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ परम विद्वान्, 

वीतभयः - सब प्रकारके भयसे रहित, 

पुण्यश्रवणकीर्तनः - जिनके नाम, गुण, महिमा और स्वरूपका श्रवण और कीर्तन परम पुण्य यानी परमपावन है, ऐसे (९१५-९२२) ॥ १११ ॥

उत्तारणः - संसार-सागरसे पार करनेवाले, 

दुष्कृतिहा- पापोंका और पापियोंका नाश करनेवाले, 

पुण्यः - स्मरण आदि करनेवाले समस्त पुरुषोंको पवित्र कर देनेवाले, 

दुःस्वप्ननाशनः - ध्यान, स्मरण, कीर्तन और पूजन करनेसे बुरे स्वप्नोंका और संसाररूप दुःस्वप्नका नाश करनेवाले,

वीरहा - शरणागतोंकी विविध गतियोंका यानी संसारचक्रका नाश करनेवाले, 

रक्षणः - सब प्रकारसे रक्षा करनेवाले, 

सन्तः - विद्या और विनयका प्रचार करनेके लिये संतोंके रूपमें प्रकट होनेवाले, 

जीवनः - समस्त प्रजाको प्राणरूपसे जीवित रखनेवाले, 

पर्यवस्थितः - समस्त विश्वको व्याप्त करके स्थित रहनेवाले (९२३-९३१) ॥ ११२ ॥

अनन्तरूपः - अनन्त - अमितरूपवाले, 

अनन्तश्रीः -अनन्तश्री यानी अपरिमित पराशक्तियोंसे युक्त, 

जितमन्युः - सब प्रकारसे क्रोधको जीत लेनेवाले, 

भयापहः - भक्तभयहारी, 

चतुरस्त्रः- चार वेदरूप कोणोंवाले मंगलमूर्ति और न्यायशील, 

गभीरात्मा -गम्भीर मनवाले, 

विदिशः - अधिकारियोंको उनके कर्मानुसार विभागपूर्वक नाना प्रकारके फल देनेवाले, 

व्यादिशः - सबको यथायोग्य विविध आज्ञा देनेवाले, 

दिशः - वेदरूपसे समस्त कर्मोंका फल बतलानेवाले (९३२-९४०) ॥११३॥

अनादिः - जिसका आदि कोई न हो ऐसे सबके कारणस्वरूप, 

भूर्भुवः - पृथ्वीके भी आधार, 

लक्ष्मीः -समस्त शोभायमान वस्तुओंकी शोभा, 

सुवीरः - आश्रित-जनोंके अन्तःकरणमें सुन्दर कल्याणमयी विविध स्फुरणा करनेवाले, 

रुचिराङ्गदः - परम रुचिकर कल्याणमय बाजूबन्दोंको धारण करनेवाले, 

जननः - प्राणिमात्रको उत्पन्न करनेवाले, 

जनजन्मादिः - जन्म लेनेवालोंके जन्मके मूल कारण, 

भीमः - सबको भय देनेवाले, 

भीमपराक्रमः - अतिशय भय उत्पन्न करनेवाले, पराक्रमसे युक्त (९४१-९४९) ॥ ११४ ॥

आधारनिलयः - आधारस्वरूप पृथ्वी आदि समस्त भूतोंके स्थान, 

अधाता - जिसका कोई भी बनानेवाला न हो ऐसे स्वयं स्थित, 

पुष्पहासः - पुष्पकी भाँति विकसित हास्यवाले, 

प्रजागरः - भली प्रकार जाग्रत् रहनेवाले नित्यप्रबुद्ध, 

ऊर्ध्वगः - सबसे ऊपर रहनेवाले, 

सत्पथाचारः - सत्पुरुषोंके मार्गका आचरण करनेवाले मर्यादापुरुषोत्तम, 

प्राणदः - परीक्षित् आदि मरे हुए को भी जीवन देनेवाले, 

प्रणवः - ॐकारस्वरूप, 

पणः -यथायोग्य व्यवहार करनेवाले (९५०-९५८) ॥ ११५ ॥

प्रमाणम् - स्वतः सिद्ध होनेसे स्वयं प्रमाणस्वरूप, 

प्राणनिलयः - प्राणोंके आधारभूत, 

प्राणभृत्- समस्त प्राणोंका पोषण करनेवाले, 

प्राणजीवनः - प्राणवायुके संचारसे प्राणियोंको जीवित रखनेवाले, 

तत्त्वम्-यथार्थ तत्त्वरूप, 

तत्त्ववित्- यथार्थ तत्त्वको पूर्णतया जाननेवाले, 

एकात्मा - अद्वितीयस्वरूप, 

जन्ममृत्युजरातिगः - जन्म, मृत्यु और बुढ़ापा आदि शरीरके धर्मोंसे सर्वथा अतीत (९५९-९६६) ॥ ११६ ॥

भूर्भुवः स्वस्तरुः - भूः, भुवः, स्वःरूप तीनों लोकोंको व्याप्त करनेवाले और संसारवृक्षस्वरूप, 

तारः - संसार-सागरसे पार उतारनेवाले, 

सविता - सबको उत्पन्न करनेवाले पितामह, 

प्रपितामहः - पितामह ब्रह्माके भी पिता, 

यज्ञः - यज्ञस्वरूप, 

यज्ञपतिः - समस्त यज्ञोंके अधिष्ठाता, 

यज्वा - यजमानरूपसे यज्ञ करनेवाले, 

यज्ञाङ्गः -समस्त यज्ञरूप अंगोंवाले, 

यज्ञवाहनः - यज्ञोंको चलानेवाले (९६७-९७५) ॥ ११७ ॥

यज्ञभृत्-यज्ञोंका धारण-पोषण करनेवाले, 

यज्ञकृत्- यज्ञोंके रचयिता, 

यज्ञी - समस्त यज्ञ जिसमें समाप्त होते हैं-ऐसे यज्ञशेषी, 

यज्ञभुक्- समस्त यज्ञोंके भोक्ता, 

यज्ञसाधनः - ब्रह्मयज्ञ, जपयज्ञ आदि बहुत-से यज्ञ जिनकी प्राप्तिके साधन हैं, ऐसे, 

यज्ञान्तकृत्- यज्ञोंका अन्त करनेवाले यानी उनका फल देनेवाले, 

यज्ञगुह्यम् - यज्ञोंमें गुप्त ज्ञानस्वरूप और निष्काम यज्ञस्वरूप, 

अन्नम् - समस्त प्राणियोंके अन्न यानी अन्नकी भाँति उनकी सब प्रकारसे तुष्टि-पुष्टि करनेवाले तथा 

अन्नादः - समस्त अन्नोंके भोक्ता (९७६-९८४) ॥ ११८ ॥

आत्मयोनिः - जिनका कारण दूसरा कोई नहीं - ऐसे स्वयं योनिस्वरूप, 

स्वयंजातः - स्वयं अपने-आप स्वेच्छापूर्वक प्रकट होनेवाले, 

वैखानः - पातालवासी हिरण्याक्षका वध करनेके लिये पृथ्वीको खोदनेवाले, 

सामगायनः - सामवेदका गान करनेवाले, 

देवकीनन्दनः -देवकीपुत्र, 

स्त्रष्टा - समस्त लोकोंके रचयिता, 

क्षितीशः -पृथ्वीपति, 

पापनाशनः - स्मरण, कीर्तन, पूजन और ध्यान आदि करनेसे समस्त पाप-समुदायका नाश करनेवाले (९८५-९९२) ॥ ११९ ॥

शङ्खभृत् - पांचजन्यशंखको धारण करनेवाले, 

नन्दकी - नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले, 

चक्री-संसारचक्रको चलानेवाले, 

शार्ङ्गधन्वा -शार्ङ्गधनुषधारी, 

गदाधरः - कौमोदकी नामकी गदा धारण करनेवाले, 

रथाङ्गपाणिः - भीष्मकी प्रतिज्ञा रखनेके लिये सुदर्शनचक्रको हाथमें धारण करनेवाले, 

अक्षोभ्यः - जो किसी प्रकार भी विचलित नहीं किये जा सके, ऐसे, 

सर्वप्रहरणायुधः - ज्ञात और अज्ञात जितने भी युद्धभूमिमें काम करनेवाले हथियार हैं, उन सबको धारण करनेवाले (९९३-१०००) ॥ १२० ॥ 

॥ सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ॥

यहाँ हजार नामोंकी समाप्ति दिखलानेके लिये अन्तिम नामको दुबारा लिखा गया है। मंगलवाची होनेसे ॐकारका स्मरण किया गया है। अन्तमें नमस्कार करके भगवान्‌की पूजा की गयी है।

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