JAI SHRI RAM
33 KOTI DEVI DEVTA
३३ कोटि देवी देवता

३३ कोटि देवी देवता की बात की जाए, तो संस्कृत शब्द कोटि के हिंदी में २ अर्थ होते है - एक करोड़ दूसरा प्रकार, यहाँ कोटि का अर्थ है प्रकार | वेदों में भी इसका उल्लेख है , जैसे की अर्थववेद में ३३ कोटि देवी देवता का उल्लेख (काण्ड १० , सूक्त ७ , श्लोक १३ , श्लोक २२) में है| और वर्णन बहुत विस्तार से ऋग्वेद में किया हुआ है|
परन्तु हमने इसका इसका संक्षित्प में वर्णन बृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार किया है|
वेदों और उपनिषद् के अनुसार ८ वासु , १२ आदित्य , ११ रूद्र , इंद्र और प्रजापति (वेदों में यहाँ २ अश्विनी कुमार को स्थान दिया गया है|) , इन सबको मिलाकर कुल ३३ कोटि देवी देवता हुए |
आठ वासु
उपनिषद् के अनुसार अग्नि , पृथ्वी , वायु , आकाश , सूर्य अंतरिक्ष , चन्द्रमा , तारे , ये आठ वासु है| इन्हीं आठ वसुओं में सारा जगत स्थति है, इसलिए "वासु" इस कारण कहलाते हैं |
१२ आदित्य
संवत्सर अर्थात वर्ष के जो १२ मॉस होते है , वे ही १२ सूर्य है , वे इस सपूर्ण जगत को लिए हुए गमन करते है| और क्योंकि वे सूर्य इन सब १२ मास को ग्रहण किये हुए चलते है , इसी कारण वे आदित्य कहे जाते है |
माना जाता है कि , ये १२ आदित्य अदिति और कश्यप के १२ पुत्र है, इसलिए भी इनका नाम आदित्य पड़ा|
वे १२ आदित्य कुछ इस प्रकार है - वरुण , मित्र , अर्यमा , भग , अंशुमन , धाता , इंद्र , परजन्य , त्वष्टा , विष्णु , पुसन , विवस्वान|
१) इंद्र : ये देवाधिपति इंद्र को दर्शाता है। इनकी शक्ति असीम है, इंद्रियों पर इनका अधिकार है। शत्रुओं का दमन और देवों की रक्षा का भार इन्हीं पर है। ये श्रावण मास में शासन करते है।
२) धाता : ये प्रजापति के रूप में जाने जाते हैं। जन समुदाय की श्रृष्टि में इन्हीं का योगदान है। सामाजिक नियमों के पालन का ध्यान रखना इनका कर्तव्य है। इन्हें श्रृष्टि कर्ता भी कहां जाता है। ये चैत्र मास में शासन करते हैं।
३) पर्जन्य : ये मेघों में निवास करते हैं। इनका मेघों पर नियंत्रण है, वर्षा के होने तथा किरणों के प्रभाव से जो जल बरसता है वो इन्हीं के नियंत्रण से होता है। ये फाल्गुन मास में शासन करते हैं।
४) त्वष्टा : इनका निवास स्थान वनस्पति , औषधि और पेड़ पौधों में है। इन्हीं के तेज से प्रकृति की वनस्पति में तेज व्याप्त होता है, जिसके द्वारा जीवन को आधार प्राप्त होता है।
५) पूषा : इनका निवास अन्न में होता है। समस्त प्रकार के धान्यों में ये विराजमान है। इन्हीं के द्वारा अन्न में पौष्टिकता एवं ऊर्जा आती है। अनाज में जो भी स्वाद और रस मौजूद होता है वो इन्हीं के तेज से होता है। ये माघ मास में शासन करते है।
६) अर्यमा : ये वायु रूप में प्राणशक्ति का संचार करते हैं। चराचर जगत की जीवन शक्ति है। प्रकृति की आत्म रूप में निवास करते हैं। ये वैशाख मास में शासन करते है।
७) भग : प्राणियों के शरीर में अंग के रूप में विद्यमान है। ये देव शरीर में चेतना, ऊर्जा शक्ति , काम शक्ति तथा जीवंतता की अभिव्यक्ति करते है। ये पुष्य मास में शासन करते है।
८) विवस्वान: ये अग्नि देव है , इनमें जो तेज व ऊष्मा व्याप्त है वह सूर्य से है, कृषि और फलों का पाचन, प्राणियों द्वारा खाए गए भोजन का पाचन इसी अग्नि द्वारा होता है। ये भाद्रपद मास में शासन करते है।
९) विष्णु : इन्हें वामन, त्रिविक्रम भी कहते है। ये देवताओं के शत्रुओं का संहार करने वाले श्री विष्णु जी है। संसार के समस्त कष्टों से मुक्ति करने वाले है। ये कार्तिक मास में शासन करते है।
१०) अंशुमान : ये वायु रूप में प्राण में तत्व बनकर देह में बिराजमान है। इन्हीं से जीवन सजग और तेज पूर्ण रहता है। वे मार्गशीष मास में शासन करते है।
११) वरुण : ये जल तत्व का प्रतीक है। ये मनुष्य में विराजमान है, जीवन बनकर समस्त प्रकृति के जीवन का आधार है।जल के अभाव में जीवन को कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ये आषाढ़ मास में शासन करते है।
१) मित्र : ये विश्व के कल्याण हेतु तपस्या करने वाले, ब्रह्मांड के कल्याण की क्षमता रखने वाले है। ये ज्येष्ठ मास में शासन करते है।
११ रूद्र
जो मनुष्य के विषय अर्थात ५ इन्द्रियां , ५ कर्मेन्द्रियाँ और एक मन है , वे ही ग्यारह रुद्र है| जब वे इस मरण धर्म वाले शरीर से निकलते हैं , तब मरने वाले के सम्बन्धियों को रुलाते है, और क्योंकि मरण समय में वे रुलाते है , इस कारण से वे रूद्र कहे जाते हैं |
वे ग्यारह रूद्र कुछ इस प्रकार है - प्राण , अपान , समान , उड़ान , व्यान , नाग , कूर्म , कृकल , देवदत्त , धनज्जय आत्मा|
१) प्राण : इसका स्थान नासिका (नाक) से हृदय तक तक है। नेत्र , कान , होंठ आदि शरीर के अंग इसी के सहयोग से कार्य करते है। ये सभी प्राणियों का राजा है। जैसे राजा अपने अधिकारियों को विभिन्न स्थानों पर विभिन्न कार्यों के लिए नियुक्त करता है, वैसे ही ये भी अन्य प्राणों को विभिन्न स्थानों पर विभिन्न कार्यों के लिए नियुक्त करता है।
२) अपान : इसका स्थान नाभि से पांव तक है। ये मल मूत्र की जगह से इंद्रिय द्वारा मल व वायु तथा मूत्रेन्द्रिय द्वारा मूत्र व वीर्य (स्पर्म) को तथा योनि (गर्भ की जगह) द्वारा रज व गर्भ को शरीर से बाहर निकालने का कार्य करता है।
३) समान : इसका स्थान हृदय से नाभि तब है। यह खाए हुए अन्न को पचाने तथा पचे हुए अन्न से रस, रक्त आदि धातुओं को बनाने का कार्य करता है।
४) उड़ान : ये कंठ (गले) से सिर (मस्तिष्क) तक के सभी अंगों में रहता है। शब्दों का उच्चारण (कहना) वमन ( कटु बात/ गलत बात कहना) आदि के अतिरिक्त ये अच्छे कर्म करने वाली जीवात्मा को उत्तम योनि में व बुरे कर्म करने वाली जीवात्मा को बुरे लोक ) सुअर, कुत्ता , आदि योनि) में तथा जिस मनुष्य के पाप पुण्य बराबर जो , उसे मनुष्य लोक (मनुष्य योनि) में ले जाता।
५) व्यान : ये सम्पूर्ण शरीर में रहता है। हृदय से मुख्य 101 नाड़ियां (नस) निकलती है, प्रत्येक नाड़ी की 100–100 शाखाएं है तथा प्रत्येक शाखा को ही 7100 उपशाखाएं है। इस प्रकार कूल 727, 210,201 नाड़ी शाखा–उपशाखाओ में ये रहता है। समस्त शरीर में रक्त संचार, प्राण संचार का कार्य यही करता है तथा अन्य प्राणों को उनके कार्यों में सहयोग भी देता है।
६) नाग : ये गले से होंठ तक रहता है। डकार , हिचकी आदि कर्म इसी के द्वारा होते है।
७) कूर्म : इसका स्थान मुख्य रूप से नेत्र गोलक (आई बॉल) है। ये नेत्र गोलकों में रहते हुए उन्हें दाएं बाएं, ऊपर नीचे घूमने को तथा पलकों को खोलने बंद करने की।क्रिया करता है। आंसू भी इसी के सहयोग से निकलते है।
८) कृकल : ये मुख से हृदय तक के स्थान में रहता है। तथा अंगड़ाई , भूख, प्यास आदि को उत्पन्न करने का कार्य करता है।
९) देवदत्त : ये नासिका (नाक) से कंठ तक ले स्थान में रहता है। इसका कार्य छींक , आलस्य, तंद्रा (वो अवस्था जिसमें बहुत अधिक मालूम पड़ने के कारण मनुष्य कुछ कुछ सो जाए) , निद्रा आदि को लाने का है।
१०) धनज्जय : ये सम्पूर्ण शरीर में व्यापक है। इसका कार्य शरीर के सभी अंगों।को खींचे रखना , मांसपेशियों को सुंदर बनाना आदि है। शरीर में से जीवात्मा के निकल जाने पर ये भी निकल जाता है। फलत: इस प्राण के अभाव से शरीर फूल जाता है।
११) आत्मा : आत्मा ही जीवन का मूल है, ये वो ग्यारहवा रुद्र है जिसके शरीर को छोड़ते ही, मृतक के रिश्तेदार को रोना आता है।
इंद्र और प्रजापति
इंद्र और प्रजापति शेष दो देवता है , जिसमे मेघ इंद्र है और यज्ञ प्रजापति है. जहाँ मेघ का अथ है विद्युत् और यज्ञ का अर्थ है पशु|
२ अश्विनी कुमार
कुछ वेदों में ये स्थान २ अश्विनी कुमार को भी दिया गया है , ये दोनों जुड़वा भाई है | जिसमें एक का नाम है "नासत्य" और दुसरे का नाम "दस्त्र" है |