JAI SHRI RAM
SHANI STROT OF DASHRATH
दशरथ कृत शनि स्त्रोत (हिन्दी अर्थ सहि त)
नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च ।
नमः कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नमः ॥1॥
नमो निर्मास् देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भैयाकृते ॥2॥
नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नमः ।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ॥3॥
नमस्ते कोट्रराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नमः ।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥4॥
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते ।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ॥5॥
अधोदृष्टः नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते ।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ॥6॥
तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः ॥7॥
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥
देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगाः ।
त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः ॥9॥
प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे ।
एवं स्तुतस्तदा सौरिग्रहराजो महाबलः ॥10॥
हिन्दी अर्थ सहित
नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च ।
नमः कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नमः ॥1॥
भावार्थ : जिनके शरीर का वर्ण कृष्ण के समान नीले रंग का तथा गला भगवान् शंकर के समान है, उन शनि देव को नमस्कार है। जो जगत् के लिए कालाग्नि (जो पूरी सृष्टि का नाश करने वाली के समान) एवं कृतान्त रुप (यमराज के समान) हैं, उन शनैश्चर को बार-बार नमस्कार है।
नमो निर्मास् देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भैयाकृते ॥2॥
भावार्थ : जिनका शरीर कंकाल जैसा मांस-हीन तथा जिनकी दाढ़ी-मूंछ और जटा बढ़ी हुई है, उन शनिदेव को नमस्कार है। जिनके बड़े-बड़े नेत्र, पीठ में सटा हुआ पेट और भयानक आकार है, उन शनैश्चर देव को नमस्कार है।।
नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नमः ।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ॥3॥
भावार्थ : जिनके (गात्राय) शरीर का ढांचा (पुष्कल) फैला हुआ है, जिनके रोएं (शरीर के बाल) बहुत (स्थूल) मोटे हैं, जो लम्बे-चौड़े किन्तु सूके शरीर वाले हैं तथा जिनकी दाढ़ कालरुप हैं, उन शनिदेव को बार-बार प्रणाम है।
नमस्ते कोट्रराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नमः ।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥4॥
भावार्थ : हे शने ! आपके नेत्र कोटर के समान (पेड़ के खोखले भाग के सामान) गहरे हैं, आपकी ओर देखना कठिन है, आप घोर रौद्र, भीषण और विकराल हैं, आपको नमस्कार है.
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते ।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ॥5॥
भावार्थ : वलीमूख (वानर के समान मुख वाले) ! आप सब कुछ भक्षण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है। सूर्यनन्दन ! भास्कर-पुत्र ! अभय देने वाले देवता ! आपको प्रणाम है।
अधोदृष्टः नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते ।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ॥6॥
भावार्थ : नीचे की ओर दृष्टि रखने वाले शनिदेव ! आपको नमस्कार है। सब कुछ नाश करने वाले ! आपको प्रणाम है। मन्दगति से चलने वाले शनैश्चर ! आपका प्रतीक तलवार के समान है, आपको पुनः-पुनः प्रणाम है।
तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः ॥7॥
भावार्थ :आपने तपस्या से अपनी देह को दग्ध कर लिया है, आप सदा योगाभ्यास में तत्पर, भूख से आतुर और अतृप्त रहते हैं। आपको सदा सर्वदा नमस्कार है।
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥
भावार्थ : मैं अपने ज्ञान और नेत्र से आपको प्रणाम करता हूँ !। हे काश्यप के नन्दन , सूर्यपुत्र शनिदेव आपको नमस्कार है। आप सन्तुष्ट होने पर राज्य दे देते हैं और रुष्ट होने पर उसे एक ही क्षण में नष्ट कर देते हैं।
देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगाः ।
त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः ॥9॥
भावार्थ : वो देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर और नाग ही क्यों न हो - जिनकी दुर्बुद्धि होती है , उनपर आपकी दृष्टि पड़ते ही उनका पूरा मूल नष्ट हो जाते हैं।
प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे ।
एवं स्तुतस्तदा सौरिग्रहराजो महाबलः ॥10॥
भावार्थ : देव मुझ पर प्रसन्न होइए। मैं वर पाने के योग्य हूँ और आपकी शरण में आया हूँ, मुझे वरदान दीजिये । आप अपने पूज्य चरणों में मेरा नमन स्वीकार कीजिये , और हे सारे ग्रहों के स्वामी , बजरंग भक्त के गण को दुनिया में अभय कीये ।।