JAI SHRI RAM
HARTALIKA VRAT KATHA
हरितालिका व्रत कथा

।। हरतालिका व्रत कथा पूजन सामग्री ।।
१) कदली त्तभ्भ (२) आम्रपल्लव (३) पंचपल्लव (४) कलश (५) यज्ञोपवीत (६) पंचरानानि (७) वस्त्रोपवस्त्र (८) तन्दुल (६) कुम्कुम (रोली) (१०) अबीर (११) गुलाल (१२) धूप (१३) दीप (१४) पुष्प (१५) नारियल (१६) ताँबूल (१७) पुंगीफल (१५) मृदुफल (१६) पुष्पमाला (२०) पुणयहवन (२१) रागयल्यार्थ (२३) नैवेद्य दक्षिणा प्रसादादि ।
।। अथ संकल्प ।।
ओम अधोहेत्यादिदेशकालो स्मृतवासर्ब पपक्षय पूर्वक सप्तजन्यराज्यर्तिप्सौभाग्य अवैधष्य पुत्रधौत्रादिवृद्धिपकल भोगान्तर शिवलोक महत्वकामन्या सोपवास हरतालिका व्रत निमित्तक यथाशक्ति जागरण पूर्वक उमामहेश्वर पूजन महः करिस्यते ।
इति संकल्पः अथ ध्यानम् ।
मन्दारमालाकुलितालिकाये कपालमाला कतमेखराय । दिव्यांवरागै च दिगम्बरनमः शिवाये च नमः शिवाये ।। अथ आवाहन ।।
आगच्छ देवि सर्वेसे सर्वदेवेश्च संस्तुस्ते । अतस्त्याँ पूज्यष्यामि प्रसन्नोभव पारवति ।। अथ आसनम ।।
शिवे शिव प्रिये देवि मंगले च जगन्मये । शिवेकल्याणादे देवि शिवरूपे नमोस्तुते ।। शिवाये सतत नमः ।।
शिव प्रीति यतौनित्यं पाद्य में प्रतिग्रहयाताम ।। अथार्थ्य ।।
संसार तापविच्छेदम् कुरु मे सिंहवाहिनी सर्वकामप्रदे देवि अर्ध्य में प्रति ग्रहताम अथाचमन ।
राज्य सौभाग्य दे देवि प्रसन्नाभवपारवति । मन्त्रणानेनदेवि त्वंपूज्यामि महेश्वरि ।
लोका नाम तुष्टिकत्री च मुक्तदा च सदा तृणा वांछितं देहि से नित्य देरति च विनाशय ।
अतः पंचामृतस्नानम मन्दाकिनी गोमती च काबेरी च सरस्वती कृष्णा च तुंग भद्रा च सर्वास्नानार्थ मांगतः । अथ वस्त्रम ।
वस्त्रयुग्म ग्रहणेद देवि देवस्य बल्लभे । सर्व सिद्ध प्रदे देवि मंगल कुरू में सद। अथ चन्दनम ।
चन्दनम सुगन्धेन कपूरा गुरू कुमकुमः लेपयेत्सवगात्राणिप्रिय । च हरिप्रिये । अथ अक्ष नाम ।।
हजिताम कुमकुमने वमक्षेतश्च सुशोभने पुज्यपेद्वधिना देवि प्रसन्नां च पार्वतीम । अथ पुष्पम ।
याल्यादीनि सुगन्धैन मालियादीनवैप्रभो । माया दत्तादि पूजाये पुष्पाणि प्रतिग्रहयताम । अथ धूपम ।
द्वः गुरू कस्तूरी कम्कुमादया सुमनोहरा भूक्तया दत्तोमयादेवि धुपोअय प्रतिग्रहयताम ।
अथ दीपेम त्वं ज्यतिसर्वदेवतां तेजस तेज उत्तम आत्मज्योतिपर ध्यान दीपायं गुति ग्रहयताम । अथ नैवेद्यम ।
ग्रहयताम देवि भक्ति में मिश्चलां कुरू पस्मितं च वरदेहि वस्त्र च परांगतिम। अथ फलं ।
इदं फल कायादेवि स्थापित पुबरतवा तस्मे भवतु हे देवि पदहत्रेह च शर्मणे । अथ तांबूल ।
पुंगीफलम मपदूदिव्यग नागेवल्ली दलेर्युतम । कपूरेणा । समायुक्त तांबूल प्रति ग्रहयताम । अथ प्रार्थना।
सौमायं चाप्मैवैधव्यं सुखम । बहू पुणय फलम सर्वमतः शान्त । देरिमे ।
गन्धहीन किंकाहीन किंक्राहीनं भक्तिहीनं हीमस्वरी पूज्ययासमहादेवि सम्पूर्ण च ददस्त्र में।
।। इति समाप्त ।।
।। पूजा विधि प्रारम्भ ।।
हरतालिका व्रत करने वाला प्राणी सूर्योदय से पहले उठे और भगवान शंकर जी का स्मरण करे फिर शौचादि नित्य कर्म से निवृत होकर स्नान ध्यान करके शिवालय में जाय जहाँ पर कथा सुननी हो तथा पूजन करना हो अगर हो सके तो वह अपने आप ही मन्दिर में शिव पार्वती पूजन के लिए केले के बन्दनबार इत्यादि अनेक पुष्प मालाओं से सुसजिज्त एक सुन्दर मण्डप तैयार करे जिसमें स्वयं बन्धु बान्धुवों सहित बैठ श्रद्धा सहित अपने आचार्य अथवा विद्वान पंडित को बुला कर उन्हें आसन पर बिठाये तब हाथ में कुशा और जल लेकर ओम अद्योहं इत्यादि से यथा विधि संकल्प कर इसके बाद अक्षत फल लेकर मन्दार माला मन्त्र से श्री शिव पार्वती जी का ध्यान करे ।
१. आगच्छ देवि मन्त्र द्वारा आवाहन करके
२. शिवे शिव प्रिये मन्त्र से पाद्य दे
३. संसार ताप मन्त्र से अर्ध्य दे ।
४. राज सौभाग्य के मन्त्र द्वारा आचमन करावे ।
५. तत्पश्चात स्वर्ण की बनी बाती पार्वती की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करावे और फिर मन्दाकिनी मन्त्र से शुद्ध जल से स्नान करावे ।
६. ७. ८. ब्रह्मा युग्म मंत्र द्वारा वस्त्रों का जोड़ा अर्पण करे । चन्देन मन्त्र द्वारा चन्दन लगाये ।
१०. रजिते मन्त्र से अक्षत (चावल) चढ़ादे ।
११. माल्यादीन मन्त्र से फूल माला चढ़ा कर
१२. चन्दना गुरु मन्त्र से धूप दे ।
१३. त्यां त्वं ज्याति मन्त्र पढ़ कर दीपक जलाये ।
१४. नैवेद्य मन्त्र से नैवेद्य अर्पण करे । १५ इदं फलं मंत्र से फल अर्पण करे ।
१६. पुंगी फलं आदि मन्त्र को पढ़ कर पान का बीड़ा अर्पण करे ।
१७. सौभाग्य मन्त्र के द्वारा प्रार्थना करे ।
श्री हरतालिका व्रत कथा
अथ हरतालिका व्रत कथा सुनी जो इस तरह है जिसके दिव्य वेश राशि पर मन्दार (आक) के पुष्प की माला शोभा देती है जिस भगवान चन्द्रशेखर के कण्ठ में मुण्डों की मालाये पड़ी हुई है जो माता पार्वती दिव्य वस्त्रों से (भगवान शंकर) दिगम्बर वेष धारण किए हैं उन दोनों भगवती तथा शंकर को नमस्कार करता हूँ कैलाश पर्वत के शिखर पर माता पार्वती ने महादेव से पूछा हे महेश्वर अब हमसे आप गुप्त से गुप्त वार्ता कहिए।
२. जो सबके लिए सव धरमों से सरल हो अथवा महान फल देने वाली हो । हे नाथ! अब आप हमसे भली भांति प्रसन्न होकर आप मेरे सम्मुख प्रकट कीजिए !
३. हे नाथ आप यदि मन्य और अन्त रहित हैं आपकी माया का कोई पार नहीं हैं अब हम आपको किस प्रकार से प्राप्त करें और कौन-कौन से दान पुण्य फल से आप हमें वर के रूप में मिलें ।
४. तब महादेव जी बोले हे देवी सुनो मैं उस व्रत को कहता हूँ जो परम गुप्त है मेरा सर्वस्व है।
५. जैसे तारागणों में चन्द्रमा ग्रहों में सूर्य वर्णों में ब्राह्मण और देवताओं में गंगा पुराणों में महाभारत वेदों में शाम इन्द्रियों में मन श्रेष्ठ है।
६. ७. वैसे पुराण वेद में इसका वर्णन आया है।
८. जिसके प्रभाव से तुमको मेरा आसन प्राप्त हुआ है। हे प्रिये ! यही मैं तुमसे वर्णन करता हूँ।
९. अब सुनो भादों मास के शुक्ल पक्ष को हस्त नक्षत्र तृतीया तीज के दिन को इस व्रत का अनुष्ठान करने से सब पापों का नाश हो जाता है ।
१०. हे देवि सुनो तुमने पहले हिमालय पर्वत पर इस व्रत को किया था जो मैं सुनाता हूँ।
११. पार्वती जी बोलो हे प्रभु इस व्रत को मैंने किस लिए किया था वह सुनने की इच्छा है सो कहिए।
१२. शंकर जी बोले आर्यावर्त में हिमान्चल नामक एक पर्वत है जहां अनेक प्रकार की भूमि अनेक प्रकार के वृक्षों से सुशोभित है ।
१३. जिन पर अनेक प्रकार के पक्षीगण रहते हैं अनेक प्रकार के मृग आदि जहां विचरण करते हैं जहां देवता गंधर्वों सहित किन्नर आदि सिद्धजन रहते हैं ।
१४. गंधर्व गण प्रसन्नता पूर्वक गान करते हैं पहाड़ों के शिखर कंचन मणि बैंदर्य आदि से सुशोभित रहते हैं।
१५. वह गिरिराज आकाश को अपना मित्र जान कर अपने शिखर रूपी हाथ से छूता रहता है जो सदैव बर्फ से ढका हुआ गंगा जी की कलकल ध्वनि से शब्दायमान रखते हैं।
१६. हे गिरजे तुमने बाल्यकाल में इसी स्थान पर तप किया था बारह साल नीचे को मुख करके धुम्रपान किया । तब फिर चौंसठ वर्ष तुमने बेल के पत्ते भोजन करके ही तप किया। माघ के महीने में जल में रह कर तथा वैशाख में अग्नि में प्रवेश करके तप किया ।
१८. श्रावण के महीने में बाहर खुले में निवास कर अन्न जल त्याग तप करती रहीं तुम्हारे कष्ट को देख तुम्हारे पिता को चिन्ता हुई
१९. वें चिन्तातुर होकर सोचने लगे कि मैं इस कन्या को किसके साय बरण करूँ । तव इस अवसर पर देवयोग से ब्रह्मा जी के पुत्र देवर्षि नारद जी वहां आये ।
२०. देवर्षि नारद जी तुमको (शैल पुत्री) को देखा । तो तुम्हारे पिता हिमांचल ने देवर्षि को अध्य पदम आसन देकर सम्मान सहित बिठाया और कहा
२१. हे मुनिवर ! आज आपने यहाँ तक आने का कैसे कष्ट किया? आज मेरा अहोभाग्य है कि आपका शुभागमन यहां पर हुआ कहिये क्या आज्ञा है?
२२. तव नारद जी बोले-हे गिरिराज मैं विष्णु का भेजा हुआ आया हूँ, तुम मेरी बात सुनो आप अपनी लड़की को उत्तम वरदान करें।
२३. ब्रह्मा, इन्द्र, शिव आदि देवताओं में विष्णु के समान कोई नहीं है। इसलिए तुम मेरे मत से आप अपनी पुत्री का दान विष्णु भगवान को दें ।
२४. हिमान्चल बोले यदि भगवान वासुदेव स्वयं ही पुत्री को ग्रहण करना चाहते हैं तो फिर इसी कार्य के लिए ही आपका आगमन हुआ है तो यह मेरे गौरव की बात है मैं, अवश्य उनको ही दूंगा ।
२५. हिमान्चल की यह कथा सुनते ही देवर्षि नारद जी आकाश में अन्तर्ध्यान हो गए और शंख हाथ जोड़कर विष्णु से कहा हे प्रभो आपका विवाह कार्य निश्चित हो गया ।
२७. यहां हिमान्चल ने प्रसन्नता पूर्वक कहा हे पुत्री मैंने तुमको गरुणध्वज भगवान विष्णु को अर्पण कर दिया है।
२८. पिता के वाक्यों को सुनते ही पार्वती जी अपनी सहेली के घर गई और पृथ्वी पर गिर कर अत्यन्त दुखित होकर विलाप करने लगी ।
२९. उनको विलाप करते हुए देख कर सखी बोली हे देवी तुम किस कारण से दुःख पाती हो मुझे बताओ ।
३०. मैं अवश्य तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूंगी । तब पार्वती बोली हे सखी सुन मेरी जो मन की अभिलाषा है अब वह मैं सुनाती हूँ।
३१. मैं महादेवजी को वरणा चाहती हूँ इसमें संदेह नहीं मेरे इस कार्य को पिताजी ने बिगाड़ना चाहा है ।
३२. इसलिए मैं अपने शरीर का त्याग करूंगी तब पार्वती के इन वचनों को सुनकर सखी ने कहा ।
३३. हे देवि जिस वन को पिताजी ने देखा न हो तुम वहां चली जाओ। तब हे देवि पार्वती जी तुम उस अपनी सखी का यह वचन सुनकर ऐसे वन को चली गई ।
३४. पिता हिमान्चल तुमको घर पर ढूंढने लगे और सोचा कि मेरी पुत्री को या तो कोई देव दानव अथवा किन्नर हरण कर ले गया है ।
३५. मैंने नारद जी को यह वचन दिया था कि मैं अपनी पुत्री को गरुणध्वज भगवान के साथ वरण करूंगा। हाय अब यह किस तरह पूरा होगा। ऐसा सोच कर बहुत चिन्तातुर हो मूर्छित हो गए।
३६. तब सब लोग हाहाकार करते हुए दौड़े आए और मूर्छा नष्ट हाने पर गिरिराज से बोले हमें अपनी मूर्छा का कारण बताओ ।
३७. हिमान्चल बोले मेरे दुःख का कारण यह है कि मेरी रत्न रूपी कन्या का कोई हरण कर ले गया है या सर्प डस गया अथवा किसी सिंह या व्याघ्र ने मार डाला है ।
३८. न जाने वह कहां चली गई या उसे किसी राक्षस ने मार डाला है। इस प्रकार कह कर गिरिराज दुखित होकर इस तरह कांपने लगे जैसे तीव्र वायु चलने पर कोई वृक्ष कांपता हे ।
३६. तत्पश्चात है पार्वती जी तुमको गिरिराज सखियों सहित घने जंगल में ढूंढने निकले सिंह व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओं के कारण बन महा भयानक प्रतीत होता था ।
४०. तुम भी सखी के साथ जंगल में घूमती हुई भयानक जंगल में एक नदी के तट पर एक गुफा में पहुंचीं ।
४१. उस गुफा में तुम अपनी सखी के साथ प्रवेश कर गयीं जहां तुम अन्नदान का त्याग करके बालू का लिंग बना कर मेरी आराधना करती रहीं ।
४२. उसी स्थान पर भाद्र मास की हस्त नक्षत्र युक्त तृतीया के दिन तुमने मेरा विधि विधान से पूजन किया तब रात्रि को मेरा आसन डोलने लगा में उस स्थान पर आ गया जहां तुम और तुम्हारी सखी दोनों या ।
४४. मन आकर तुमसे कहा मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे वरदान मांगो । तब तुमने कहा हे देव यदि आप प्रसन्न हैं तो आप महादेव जो मेरे पति हो ।
४५. मैं तथास्तु ऐसा ही होगा कह कर कैलाश पर्वत को चला गया। तुमने प्रभात होते ही उस बालू की प्रतिमा को नदी मे विसर्जित कर दिया ।
४६ हे शुभे तुमने वहाँ अपनी सखी सहित व्रत का परायण किया इतने में हिमवान भी तुम्हें ढूंढ़ते हुए उसी वन में आ पहुँचे ।
४७. वह चारों ओर तुम्हें न देख कर मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़े उस समय नदी के तट पर दो कन्याओं को देखा।
४८. तो वे तुम्हारे पास आ गए तुम्हें हृदय से लगा कर रोने लगे और बोले तुम इस सिंह व्याघ्रादि युक्त घने जंगल में क्यों चली आई ।
४९. पार्वती जी बोलीं (तुमने कहा) हे पिता सुनिए मैंने पहले ही अपना शरीर शंकर जी को समर्पित कर दिया था किन्तु आपने इसके विपरीत कार्य किया इसलिए मैं वन में चली आई ।
५०. ऐसा सुन कर हिमवान ने फिर तुमसे कहा कि मैं तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध यह कार्य नहीं करूंगा। तब वे तुमको लेकर घर पर आये और तुम्हारा विवाह हमारे साथ कर दिया।
५१ हे प्रिये उसी व्रत के प्रभाव से तुमको यह मेरा अर्द्धासन प्राप्त हुआ है। इस व्रत राज को मैंने अभी तक किसी के सम्मुख वर्णन नहीं किया है।
५२. हे देवि ! अब मैं तुमको बताता हूँ सो मन लगाकर सुनो इस व्रत का नाम व्रतराज क्यों पड़ा? तुमको सखी हरण करके ले गई थी। इसलिए इस व्रत का हरतालिका नाम पड़ा ।
५३. पार्वती जी बोलीं हे स्वामी आपने इस व्रतराज का नाम तो बताया किन्तु मुझे इसकी विधि एंव फल भी बताइये इसके करने से किस फल कि प्राप्ति होती है ।
५४. तब शंकर जी बोले कि स्त्री जाति के अत्युत्तम व्रत की विधि सुनिए । सौभाग्य की इच्छा रखने वाली स्त्री इस व्रत का विधिपूर्वक करे ।
५५. उसमें केले के खम्भों से मण्डप बना कर वन्दनवारों से सुशोभित करें। उसमें विविध रंगों से रेशमी वस्त्र की चांदनी तान देवें
५६. फिर चन्दन आदि सुगन्धित द्रव्यों से लेपन करके स्त्रियां एकत्र हो शंख भेरखी मृदग बजावें ।
५७. विधिपूर्वक मंगलाचार (गीतवाद्य) करके गौरा और शंकर स्वर्ण निर्मित प्रतिमा को स्थापित करें ।
५८. फिर शिवजी व पार्वती जी का गन्ध धूप, दीप, पुष्प आदि से विधि सहित पूजन कर अनेक प्रकार के नैवेद्य (मिठाइयों) का भोग लगा दें। और रात को जागरण करें ।
५९. नारियल सुपारी, जवारी, नीबू, लौंग, अनार, नारंगी आदि फलों को एकत्रित करके धूप, दीप आदि मन्त्रों द्वारा पूजन करें ।
६०. ६१ फिर मन्त्रो-उच्चारण करें। शिवाये से लेकर उमयास तक के मन्त्रों में प्रार्थना कर अथ प्रार्थना मन्त्रार्थ है कल्याण स्वरूप शिव है मंगल रूप महेश्वरा हे शिवे ! आप हमें सब कामनाओं को देने वाली देवी कल्याण रूपे तुम को नमस्कार है।
६२. कल्याण स्वरूप माता पार्वती जी हम आपको नमस्कार करते हैं और श्री शंकर जी को सदैव नमस्कार करते हैं ब्रह्म फपणी जगत का पालन करने वाली माता जी आपको नमस्कार है ।
६३. हे सिंहवाहिनी संसारिक भय से व्याकुल हूँ मेरी रक्षा करे। हे महेश्वरी मैंने इसी अभिलाषा से आपका पूजन किया ।
६४. हे पार्वती माता आप हमारे ऊपर प्रसन्न होकर मुझे सुख और सौभाग्य प्रदान कीजिए इस प्रकार मन्त्रों द्वारा उमा सहित शंकर जी का पूजन करें तथा विधि विधान सहित कथा सुन कर गौ वस्त्र तथा आभूषण ब्राह्मणों को दान करें। इस प्रकार से पति तथा पत्नी दोनों को एकाग्र चित्त होकर पूजन करें। वस्त्र आभूषण आदि संकल्प द्वारा ब्राह्मण को दक्षिणा दें ।
६७. हे देवि इस प्रकार व्रत करने वालों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं फिर वह सात जन्म तक राज्य सुख और सौभाग्य को भोगती है ।
६८. जो स्त्री इस तृतीया के दिन अन्नाहार करती हैं व्रत को नहीं करतीं वह सात जन्म तक वन्ध्या एवं विधवा होती हैं ।
६९. जो स्त्री इस व्रत को नहीं करती वह धन और पुत्र के शोक से अधिक दुःख को भोगती हैं तथा वह घोर नरक में जाकर कष्ट पाती हैं ।
७०. इस दिन अन्नाहार करने वाली शूकरी, फल खाने वाली बानरी तथा जल पीने टिटहरी, शर्वत पीने वाली जोंक दूध पीने वाली सर्पिनी
७१. मांस खाने वाली बाघिनी, दही खानी वाली बिलारी, मिठाई खाने वाली चींटी, सब चीजें खाने वाली मक्खी का जन्म पाती हैं।
७२. सोने वाली अजगरी, पति को धोखा देने वाली मुर्गी का जन्म पाती है। स्त्रियों को परलोक सुधारने के लिए व्रत करना चाहिए।
७३. व्रत के दूसरे दिन व्रत का परायण करने के पश्चात चांदी सोना, तांबे या कांसे के पात्र में ब्राह्मण को अन्न दान करना चाहिए ।
७४. इस व्रत को करने वाली स्त्रियां मेरे समान पति को पाती हैं। मृत्युकाल में पार्वती जैसे रूप को प्राप्त करती हैं जीवन संसारिक सुख को भोग कर परलोक में मुक्ति पाती हैं।
७५. हजारों अश्वमेध यज्ञों के करने से जो फल प्राप्त होता है वही मनुष्य का इस कथा के सुनने से मिलता है
७६. हे देवि ! मैंने तुम्हारे सम्मुख यह सब व्रतों में उत्तम व्रत को वर्णन किया है जिसके करने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश हो जाता है।
।। श्री शिव जी की आरती ।।
ओम जय शिव ओंकारा, भज पार्वती ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्धांगीधारा । ओम ।
एकानन चतुरानन पंचाननराजे हँसानन वृषवाहन छाजे ।
दो भुज चार चतुरभुज दशभुज ते सोहे ।
शिव दश भुजते सोहे शिवजी को रूप निरखता त्रिभुवन मनमोहे अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी शिव मुण्डमाला धारी त्रिपुरारी च मुरारी करकमला धारी ।
श्वेताम्बर पीतांबर बाघम्बर अंगे सनकादिक देवतादिक भूतादिक संगे लक्ष्मीवर सावित्री पार्वतीसंगे शिव पार्वतीसंगे अर्धांगी शिवगंगे शिव लहरी गंगे करमध्ये कमण्डल चक्र त्रिशूला धरता सुख करता दुःख हरता सुख में नित रहता प्रभु जी हृदय कमल में बास तिहारी वसिया रघुराया सेवक का संकट काटो भक्तन को संकट काट कर अपनी छाया आम लख चौरासी फंद छुड़ायो मेटे यामत्रासा निशिदिन प्रभु मोय राखो अपने संग साथा ओम कानो मुद्रा मोह गल बिच रुण्डमाला शिवगल मुतियन माला शीश चन्द्रमा राजे भाल चन्द्रमाराजे जटाबिच गंगेधारा कनकसमान कलेवर रक्तांबर राजे शिव श्वेतांबर राजे रक्तपुष्प की माला कंठन में छाजे बाबन भैरव चौंसठ योगिराय नृत्यकरत भैरव वाजत तालमृदंगा बाजत डमरू ओम ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अन्तर नहीं करना तीनों घर-२ व्यापे भौसागर तरना काशी में एक विश्वंभर शिवजी कैलाशी प्रभु हरिजा केलाशा शिवगौरी हरिकाला शिवदर्शनदेवा भोला ओम काशी में विश्वनाथ विराजे नन्दा ब्रह्मचारी २ नित उठ भोग लगावें नित ही दर्शन पावे महिमा अतिभारी ओम त्रिगुण स्वामी जी की आरती जी नर गावे पाप जर जावे ताके घर लक्ष्मी आहे दरिद्रता जावे सुख सम्पति से आनन्द हो जावे कहत महादेव स्वामी इच्छा फल पावेओ जैशिव ओंकार भज पार्वती प्यारा शिव ऊपर जलधारा शिव ओढ़त मृगछाला फहरत रुण्डमाला दर्शन देवो भोला प्रसन्न होवे प्यारा भरदे भण्डारा करदे निस्तारा कर विजय अहारा धूल जटा वाला शिव गलभुजंग काला भस्मी रमणी वाला वरसो जलधारा शिव पार्वती प्यारा ब्रह्मा विष्णु सदाशिव ब्रह्मा विष्णु महादेव ईश्वर ओंकारा । ओम०
।। समाप्त ।।
।। आरती ॐ जय जगदीश हरे ।।
ॐ जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे । भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे।।
ॐ जो ध्यावे फल पावे दुःख विनशे मन का । सुख सम्पति घर आवे कष्ट मिटे तन का।।
ॐ मात-पिता तुम मेरे शरण गहूँ किसकी । तुम बिन और न दूजा आस करूँ जिसकी ।।
ॐतुम पूरण परमात्मा तुम अन्तर्यामी । पारब्रह्म परमेश्वर तुम सबके स्वामी ।।
ॐ तुम करुणा के सागर तुम पालन कर्ता । मैं मुरख खल कामी कृपा करो भर्ता ।।
ॐ तुम हो एक अगोचर सबके प्राणपति । किस विधि मिलूं दयामय तुमको में कुमति । ।
ॐदीन बन्धु दुःख हर्ता तुम ठाकुर मेरे। करुणा हस्त बढ़ाओ द्वार पड़ा तेरे ।।
ॐ विषय विकार मिटाओ पाप हरो देवा । श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ सन्तन की सेवा ।।
ॐ श्यामसुन्दर जी की आरती जो कोई नर गावे । कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावै ।।
