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Topic 6 : Salutations to all living beings as so many images of Shri Rama

दोहा 

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।

बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि ॥ ७ (ग)॥

देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब।

बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्व ॥ ७ (घ)

चौपाई 

आकर चारि लाख चौरासी । जाति जीव जल थल नभ बासी ॥ 

सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी ॥१ 

विषय ७ : तुलसीदास की दीनता और राम भक्तिमयी कविता कि महिमा 

Topic 6 : Tulsidasa's humility and the glory of poetry describing Shri Rama's greatness

जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू ॥ 

निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाहीं ॥२ 

करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा ।। 

सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ ॥३ 

मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी ।। 

छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई ॥४ 

 

जौं बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता ॥ 

हँसिहहिं कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी ॥५ 

निज कबित्त केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका ।। 

जे पर भनिति सुनत हरषाहीं। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं ॥ ६ 

जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई ॥ 

सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़ड़ जोई ॥ ७ 

दोहा 

 

भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास। 

पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करिहहिं उपहास ॥ ८ ॥

चौपाई 

 

खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा ॥ 

हंसहिं बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही ।।१ 

 

कबित रसिक न राम पद नेहू। तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू ॥

भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी ॥२ 

 

प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी। तिन्हहि कथा सुनि लागिहि फीकी ।। 

हरि हर पद रति मति न कुतरकी। तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुबर की ।।३ 

 

राम भगति भूषित जिय जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी ।।

कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू । सकल कला सब बिद्या हीनू ॥ ४ 

 

आखर अरथ अलंकृति नाना। छंद प्रबंध अनेक बिधाना ॥

भाव भेद रस भेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा॥ ५ 

कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें ॥ ६ 

दोहा

 

भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक। 

सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिबेक ॥ ९ ॥

चौपाई

 

एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा ॥ 

मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी ॥१ 
 

भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ ॥ 

बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोह न बसन बिना बर नारी ॥२ 

 

सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी ॥ 

सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही ॥३ 

जदपि कबित रस एकउ नाहीं। राम प्रताप प्रगट एहि माहीं ॥ 

सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बड़प्पनु पावा ॥४ 

 

धूमउ तजड़ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई ॥ 

भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी ॥ ५ 

छंद 

मंगल करनि कलिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की। 

गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की ॥ 

प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी। 

भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी ॥

दोहा 

 

प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग।

दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग ॥ १० (क) ॥

 

स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान।

गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान ॥ १० (ख)॥

चौपाई 

 

मनि मानिक मुकुता छबि जैसी । अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी ।। 

नृप किरीट तरुनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई ॥१ 

तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं । उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं ।। 

भगति हेतु बिधि भवन बिहाई । सुमिरत सारद आवति धाई ॥२ 

राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ ॥ 

कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं हरि जस कलि मल हारी ॥३ 

 

कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत पछिताना ॥ 

हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना ॥ ४ 

जौं बरषद् बर बारि बिचारू । होहिं कबित मुकुतामनि चारू ॥ ५ 

दोहा

 

जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।

पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग ॥ ११ ॥

चौपाई 

 

जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला ।। 

चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़े ॥१ 

 

बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के ॥

तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरमध्वज धंधक धोरी ॥२ 

 

जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़ड़ कथा पार नहिं लहऊँ ।। 

ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने ॥३ 

समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी ।।

एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका ॥ ४ 

 

कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ । मति अनुरूप राम गुन गावउँ । 

कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा ॥५ 

 

जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं ॥ 

समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई ।।६ 

दोहा

 

सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान। 

नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान ॥ १२ ॥

चौपाई 

 

सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई ॥ 

तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा ॥१ 

एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानंद पर धामा ॥ 

ब्यापक बिस्वरूप भगवाना । तेहिं धरि देह चरित कृत नाना ।।२ 

 

सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी ॥ 

जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू ॥३ 

 

गई बहोर गरीब नेवाजू । सरल सबल साहिब रघुराजू ॥ 

बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहिं पुनीत सुफल निज बानी ॥४ 

 

तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा ॥ 

मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई ॥ ५ 

दोहा

 

अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं। 

चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं ॥ १३॥ 

चौपाई 

 

एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई ॥

ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना ।। 

विषय ८ : कवि वंदना

Topic 8 : Salutations to the immortal bards

चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे ॥ 

कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा ॥२ 

 

जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने ॥ 

भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें। प्रनवउँ सबहि कपट सब त्यागें ॥३ 

 

होहु प्रसन्न देहु बरदानू । साधु समाज भनिति सनमानू ॥ 

जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं ।।४ 

कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई ॥ 

राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा ॥५ 

 

तुम्हरी कृपाँ सुलभ सोउ मोरे। सिअनि सुहावनि टाट पटोरे ।। ६ 

दोहा 

 

सरल कबित कीरति बिमल सोड़ आदरहिं सुजान। 

सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान ॥ १४ (क) ॥

 

सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर। 

करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर ॥ १४ (ख) ॥

 

कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल।

बालबिनय सुनि सुरुचि लखि मो पर होहु कृपाल ॥ १४ (ग) ॥ 

विषय ९ : वाल्मीकि , वेद , ब्रह्मा , देवता , शिव , पार्वती आदि की वंदना

Topic 9 : Salutations to the sage Valmiki, the Vedas, Brahma, Shiva, Parvati and other gods and goddesses

सोरठा 

 

बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ। 

सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित ॥ १४ (घ) ॥

 

बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस ।

जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु ॥ १४ (ङ) ॥

 

बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहिं कीन्ह जहँ।

संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी ॥ १४ (च) ॥

 

दोहा 

 

बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि।

होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि ॥ १४ (छ) ॥ 

 

चौपाई 

 

पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता ।। 

मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका ॥१ 

 

गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी ॥ 

सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के ॥२ 

 

कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा । साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा ॥ 

अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू ॥३ 

 

सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला ॥

सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ। बरनउँ रामचरित चित चाऊ ॥४ 

 

भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती ॥

जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता ॥ 

होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी ॥ ५-६ 

 

दोहा 

 

सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ। 

तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ ॥ १५ ॥

विषय १० : श्री सीताराम धाम परिकर वंदना

Topic 10 : Salutations to the abode and
companions of Sita and Rama

चौपाई 

 

बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि ।। 

प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी ।। १

सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए । 

बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची ॥२ 

प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू । बिस्व सुखद खल कमल तुसारू ।।

दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी ।। 

करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी ॥ 

जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता ॥ ३-४ ॥

सोरठा 

 

बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद।

बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ ॥ १६ ॥

चौपाई

 

प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू ॥ 

जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई ॥१ 

प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना ।। 

राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू ॥ २

बंदउँ लछिमन पद जल जाता। सीतल सुभग भगत सुख दाता ॥ 

रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड समान भयउ जस जाका ॥३

सेष सहस्त्रसीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन ॥ 

सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर ॥४ 

रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी ॥ 

महाबीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना ॥ ५ 

सोरठा

 

प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन।

जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर ॥ १७॥

चौपाई 

 

कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा ॥ 

बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए॥१

रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते ॥

बंदउँ पद सरोज सब केरे । जे बिनु काम राम के चेरे ॥ २ 

सुक सनकादि भगत मुनि नारद । जे मुनिबर बिग्यान बिसारद ।।

प्रनवउँ सबहि धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा ॥ ३

जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की ।। 

ताके जुग पद कमल मनावउँ । जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ ।४

पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक ।। 

राजिवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक ।।५ 

दोहा

 

गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। 

बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न ॥ १८ ॥

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