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चौपाई 

भावार्थ : मैं श्रीरघुनाथजी के नाम 'राम' की वन्दना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात् 'र' 'आ' और 'म' रूपसे बीज है। वह 'राम' नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। वह वेदों का प्राण है; निर्गुण, उपमारहित और गुणों का भण्डार है ॥ १ ॥

भावार्थ : जो महामन्त्र है, जिसे महेश्वर श्रीशिवजी जपते हैं और उनके द्वारा जिसका उपदेश काशी में मुक्ति का कारण है, तथा जिसकी महिमा को गणेशजी जानते हैं, जो इस 'राम' नाम के प्रभाव से ही सबसे पहले पूजे जाते हैं ॥ २ ॥

भावार्थ : आदिकवि श्रीवाल्मीकि जी रामनाम के प्रताप को जानते हैं, जो उलटा नाम ('मरा', 'मरा') जपकर पवित्र हो गये। श्रीशिवजी के इस वचन को सुनकर कि एक राम-नाम सहस्त्र नाम के समान है, पार्वती जी सदा अपने पति (श्रीशिवजी) के साथ रामनाम का जप करती रहती हैं ॥ ३ ॥

भावार्थ : नाम के प्रति पार्वतीजी के हृदय की ऐसी प्रीति देखकर श्रीशिव जी हर्षित हो गये और उन्होंने स्त्रियों में भूषणरूप (पतिव्रताओं में शिरोमणि) पार्वतीजी को अपना भूषण बना लिया (अर्थात् उन्हें अपने अङ्ग में धारण करके अर्द्धाङ्गिनी बना लिया)। नामके प्रभाव को श्रीशिवजी भलीभाँति जानते हैं, जिस (प्रभाव) के कारण कालकूट जहर ने उनको अमृतका फल दिया ॥ ४॥

दोहा

भावार्थ : श्रीरघुनाथजी की भक्ति वर्षा-ऋतु है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उत्तम सेवकगण धान हैं और 'राम' नाम के दो सुन्दर अक्षर सावन-भादों के महीने हैं ॥ १९ ॥

चौपाई

भावार्थ : दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं, जो वर्णमाला रूपी शरीर के नेत्र हैं, भक्तों के जीवन हैं तथा स्मरण करने में सबके लिये सुलभ और सुख देनेवाले हैं, और जो इस लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह करते हैं (अर्थात् भगवान्‌ के दिव्य धाम में दिव्य देह से सदा भगवत्सेवा में नियुक्त रखते हैं) ॥ १ ॥

भावार्थ : ये कहने, सुनने और स्मरण करने में बहुत ही अच्छे (सुन्दर और मधुर) हैं; तुलसीदास को तो श्रीराम-लक्ष्मण के समान प्यारे हैं। इनका ('र' और 'म' का) अलग-अलग वर्णन करने में प्रीति बिलगाती है (अर्थात् बीजमन्त्र की दृष्टि से इनके उच्चारण, अर्थ और फल में भिन्नता दीख पड़ती है) परन्तु हैं ये जीव और ब्रह्मके समान स्वभाव से ही साथ रहनेवाले (सदा एकरूप और एकरस) ॥ २॥

भावार्थ : ये दोनों अक्षर नर-नारायण के समान सुन्दर भाई हैं, ये जगत्‌ का पालन और विशेषरूपसे भक्तों की रक्षा करनेवाले हैं। ये भक्तिरूपिणी सुन्दर स्त्री के कानों के सुन्दर आभूषण (कर्णफूल) हैं और जगत्‌ के हित के लिये निर्मल चन्द्रमा और सूर्य हैं ॥ ३॥

भावार्थ : ये सुन्दर गति (मोक्ष) रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति के समान हैं, कच्छप और शेषजी के समान पृथ्वी के धारण करनेवाले हैं, भक्तों के मनरूपी सुन्दर कमल में विहार करनेवाले भौंरे के समान हैं और जीभरूपो यशोदाजीके लिये श्रीकृष्ण और बलरामजी के समान (आनन्द देनेवाले) हैं॥ ४॥

दोहा

भावार्थ : तुलसीदासजी कहते हैं- श्रीरघुनाथजी के नाम के दोनों अक्षर बड़ी शोभा देते हैं, जिनमें से एक (रकार) छत्ररूप (रेफ) से और दूसरा (मकार) मुकुटमणि (अनुस्वार) रूप से सब अक्षरों के ऊपर हैं ॥ २० ॥

चौपाई

भावार्थ : समझने में नाम और नामी दोनों एक-से हैं, किन्तु दोनों में परस्पर स्वामी और सेवक के समान प्रीति है (अर्थात् नाम और नामी में पूर्ण एकता होने पर भी जैसे स्वामी के पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नाम के पीछे नामी चलते हैं। प्रभु श्रीरामजी अपने 'राम' नाम का ही अनुगमन करते हैं, नाम लेते ही वहाँ आ जाते हैं)। नाम और रूप दोनों ईश्वर की उपाधि हैं; ये (भगवान्‌ के नाम और रूप) दोनों अनिर्वचनीय हैं। अनादि हैं और सुन्दर (शुद्ध भक्तियुक्त) बुद्धि से ही इनका [दिव्य अविनाशी] स्वरूप जानने में आता है ॥ १॥

भावार्थ : इन (नाम और रूप) में कौन बड़ा है, कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है। इनके गुणोंका तारतम्य (कमी-बेशी) सुनकर साधु पुरुष स्वयं ही समझ लेंगे। रूप नामके अधीन देखे जाते हैं, नामके बिना रूपका ज्ञान नहीं हो सकता ॥ २॥

भावार्थ : कोई-सा विशेष रूप बिना उसका नाम जाने हथेली पर रखा हुआ भी पहचाना नहीं जा सकता और रूप के बिना देखे भी नाम का स्मरण किया जाय तो विशेष प्रेम के साथ वह रूप हृदय में आ जाता है ॥ ३ ॥

भावार्थ : नाम और रूपकी गति की कहानी (विशेषता की कथा) अकथनीय है। वह समझने में सुखदायक है, परन्तु उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। निर्गुण और सगुणके बीच में नाम सुन्दर साक्षी है और दोनों का यथार्थ ज्ञान करानेवाला चतुर दुभाषिया है ॥ ४॥ 

दोहा

भावार्थ : तुलसीदासजी कहते हैं, यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है तो मुखरूपी द्वार की जीभरूपी देहली पर रामनामरूपी मणि दीपक को रख ॥ २१ ॥

चौपाई

भावार्थ : ब्रह्माके बनाये हुए इस प्रपञ्च (दृश्य जगत्) से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान् मुक्त योगी पुरुष इस नाम को ही जीभ से जपते हुए [तत्त्वज्ञानरूपी दिन में] जागते हैं और नाम तथा रूप से रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुखका अनुभव करते हैं॥ १॥

भावार्थ : जो परमात्मा के गूढ़ रहस्य को (यथार्थ महिमा को) जानना चाहते हैं, वे (जिज्ञासु) भी नाम को जीभ से जपकर उसे जान लेते हैं। [लौकिक सिद्धियों के चाहनेवाले अर्थार्थी] साधक लौ लगाकर नाम का जप करते हैं और अणिमादि [आठों] सिद्धियों को पाकर सिद्ध हो जाते हैं ॥ २ ॥

भावार्थ : [संकट से घबराये हुए] आर्त भक्त नाम जप करते हैं तो उनके बड़े भारी बुरे-बुरे संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं। जगत्में चार प्रकारके (१-अर्थार्थी- धनादिकी चाहसे भजनेवाले, २-आर्त- संकटकी निवृत्तिके लिये भजनेवाले, ३-जिज्ञासु - भगवान्‌को जाननेकी इच्छासे भजनेवाले, ४-ज्ञानी - भगवान्‌को तत्त्वसे जानकर स्वाभाविक ही प्रेमसे भजनेवाले) रामभक्त हैं और चारों ही पुण्यात्मा, पापरहित और उदार हैं॥ ३ ॥

भावार्थ : चारों ही चतुर भक्तों को नाम का ही आधार है; इनमें ज्ञानी भक्त प्रभुको विशेषरूप से प्रिय है। यों तो चारों युगों में और चारों ही वेदों में नाम का प्रभाव है, परन्तु कलियुग में विशेषरूप से है। इसमें तो [नाम को छोड़कर] दूसरा कोई उपाय ही नहीं है ॥४॥

दोहा

भावार्थ : जो सब प्रकार की (भोग और मोक्ष की भी) कामनाओं से रहित और श्रीरामभक्ति के रस में लीन हैं, उन्होंने भी नाम के सुन्दर प्रेमरूपी अमृत के सरोवर में अपने मनको मछली बना रखा है (अर्थात् वे नामरूपी सुधा का निरन्तर आस्वादन करते रहते हैं, क्षणभर भी उससे अलग होना नहीं चाहते) ॥ २२ ॥

चौपाई 

भावार्थ : निर्गुण और सगुण- ब्रह्मके दो स्वरूप हैं। ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। मेरी सम्मति में नाम इन दोनों से बड़ा है, जिसने अपने बल से दोनों को अपने वश में कर रखा है॥ १ ॥

भावार्थ : सज्जनगण इस बातको मुझ दासकी ढिठाई या केवल काव्योक्ति न समझें। मैं अपने मनके विश्वास, प्रेम और रुचिकी बात कहता हूँ। [निर्गुण और सगुण] दोनों प्रकारके ब्रह्मका ज्ञान अग्निके समान है। निर्गुण उस अप्रकट अग्निके समान है जो काठके अंदर है, परन्तु दीखती नहीं; और सगुण उस प्रकट अग्निके समान है जो प्रत्यक्ष दीखती है। [तत्त्वतः दोनों एक ही हैं; केवल प्रकट-अप्रकटके भेदसे भिन्न मालूम होती हैं। इसी प्रकार निर्गुण और सगुण तत्त्वतः एक ही हैं। इतना होनेपर भी] दोनों ही जानने में बड़े कठिन हैं, परन्तु नामसे दोनों सुगम हो जाते हैं। इसी से मैंने नाम को [निर्गुण] ब्रह्मसे और [सगुण] राम से बड़ा कहा है, ब्रह्म व्यापक है, एक है, अविनाशी है; सत्ता, चैतन्य और आनन्दकी घनराशि है ॥ २-३ ॥

भावार्थ : ऐसे विकाररहित प्रभुके हृदयमें रहते भी जगत्‌के सब जीव दीन और दुखी हैं। नामका निरूपण करके (नामके यथार्थ स्वरूप, महिमा, रहस्य और प्रभावको जानकर) नामका जतन करनेसे (श्रद्धापूर्वक नामजपरूपी साधन करनेसे) वही ब्रह्म ऐसे प्रकट हो जाता है जैसे रत्नके जाननेसे उसका मूल्य ॥ ४ ॥

दोहा 

भावार्थ : इस प्रकार निर्गुणसे नामका प्रभाव अत्यन्त बड़ा है। अब अपने विचारके अनुसार कहता हूँ कि नाम [सगुण] रामसे भी बड़ा है ॥ २३ ॥

चौपाई

भावार्थ : श्रीरामचन्द्रजीने भक्तोंके हितके लिये मनुष्य शरीर धारण करके स्वयं कष्ट सहकर साधुओंको सुखी किया; परन्तु भक्तगण प्रेमके साथ नामका जप करते हुए सहज ही में आनन्द और कल्याण के घर हो जाते हैं॥ १॥

भावार्थ : श्रीरामजीने एक तपस्वीकी स्त्री (अहल्या) को ही तारा, परन्तु नामने करोड़ों दुष्टोंकी बिगड़ी बुद्धिको सुधार दिया। श्रीरामजीने ऋषि विश्वामित्रके हितके लिये एक सुकेतु यक्षकी कन्या ताड़काकी सेना और पुत्र (सुबाहु) सहित समाप्ति की; परन्तु नाम अपने भक्तोंके दोष, दुःख और दुराशाओंका इस तरह नाश कर देता है जैसे सूर्य रात्रिका। श्रीरामजीने तो स्वयं शिवजीके धनुषको तोड़ा, परन्तु नामका प्रताप ही संसारके सब भयोंका नाश करनेवाला है ॥ २-३ ॥

भावार्थ : प्रभु श्रीरामजीने [भयानक] दण्डक वनको सुहावना बनाया, परन्तु नामने असंख्य मनुष्योंके मनोंको पवित्र कर दिया। श्रीरघुनाथजीने राक्षसोंके समूहको मारा, परन्तु नाम तो कलियुगके सारे पापोंकी जड़ उखाड़नेवाला है ॥ ४ ॥

दोहा  

भावार्थ : श्रीरघुनाथजीने तो शबरी, जटायु आदि उत्तम सेवकोंको ही मुक्ति दी; परन्तु नामने अगनित दुष्टोंका उद्धार किया। नामके गुणोंकी कथा वेदोंमें प्रसिद्ध है ॥ २४॥

चौपाई 

भावार्थ : श्रीरामजीने सुग्रीव और विभीषण दोनों को ही अपने शरणमें रखा, यह सब कोई जानते हैं; परंत नामने अनेक गरीबोंपर कृपा की है। नामका यह सुन्दर विरद लोक और वेदमें विशेषरूपस प्रकाशित है ॥ १ ॥

भावार्थ : श्रीरामजीने तो भालू और बन्दरोंकी सेना बटोरी और समुद्रपर पुल बाँधनेके लिये थोड़ा परिश्रम नहीं किया; परंतु नाम लेते ही संसार-समुद्र सूख जाता है। सज्जनगण! मन में विचार कीजिये [कि दोनों में कौन बड़ा है] ॥२॥

भावार्थ :  श्रीरामचन्द्रजी ने कुटुम्बसहित रावणको युद्धमें मारा, तब सीतासहित उन्होंने अपने नगर (अयोध्या) में प्रवेश किया। राम राजा हुए, अवध उनकी राजधानी हुई, देवता और मुनि सुन्दर वाणीसे जिनके गुण गाते हैं। परंतु सेवक (भक्त) प्रेमपूर्वक नामके स्मरणमात्रसे बिना परिश्रम मोहकी प्रबल सेनाको जीतकर प्रेममें मग्न हुए अपने ही सुखमें विचरते हैं, नामके प्रसादसे उन्हें सपनेमें भी कोई चिन्ता नहीं सताती ॥ ३-४ ॥

दोहा

भावार्थ : इस प्रकार नाम [निर्गुण] ब्रह्म और [सगुण] राम दोनोंसे बड़ा है। यह वरदान देनेवालोंको भी वर देनेवाला है। श्रीशिवजीने अपने हृदयमें यह जानकर ही सौ करोड़ रामचरित्रमेंसे इस 'राम' नामको [साररूपसे चुनकर] ग्रहण किया है॥ २५ ॥

मासपारायण, पहला विश्राम

 

चौपाई 

भावार्थ : नामहीके प्रसादसे शिवजी अविनाशी हैं और अमङ्गल वेषवाले होनेपर भी मङ्गलकी राशि हैं। शुकदेवजी और सनकादि सिद्ध, मुनि, योगीगण नामके ही प्रसाद से ब्रह्मानन्द को भोगते हैं॥ १॥

भावार्थ : नारदजीने नामके प्रतापको जाना है। हरि सारे संसारको प्यारे हैं, [हरिको हर प्यारे हैं] और आप (श्रीनारदजी) हरि और हर दोनोंको प्रिय हैं। नामके जपनेसे प्रभुने कृपा की, जिससे प्रह्लाद भक्तशिरोमणि हो गये ॥ २ ॥

भावार्थ : ध्रुवजीने ग्लानिसे (विमाताके वचनोंसे दुखी होकर सकामभावसे) हरिनामको जपा और उसके प्रतापसे अचल अनुपम स्थान (ध्रुवलोक) प्राप्त किया। हनुमान्जीने पवित्र नामका स्मरण करके श्रीरामजीको अपने वशमें कर रखा है॥ ३॥

भावार्थ : नीच अजामिल, गज और गणिका (वेश्या) भी श्रीहरिके नामके प्रभावसे मुक्त हो गये। मैं नामकी बड़ाई कहाँतक कहूँ, राम भी नामके गुणोंको नहीं गा सकते ॥ ४॥ 

दोहा

भावार्थ : कलियुगमें रामका नाम कल्पतरु (मनचाहा पदार्थ देनेवाला) और कल्याणका निवास (मुक्तिका घर) है, जिसको स्मरण करनेसे भाँग-सा (निकृष्ट) तुलसीदास तुलसीके समान (पवित्र) हो गया ॥ २६ ॥

चौपाई

भावार्थ : [केवल कलियुगकी ही बात नहीं है, चारों युगोंमें, तीनों कालोंमें और तीनों लोकोंमें नामको जपकर जीव शोकरहित हुए हैं। वेद, पुराण और संतों का मत यही है कि समस्त पुण्योंका फल श्रीरामजी में [या रामनाममें] प्रेम होना है ॥ १ ॥

भावार्थ : पहले (सत्य) युगमें ध्यानसे, दूसरे (त्रेता) युगमें यज्ञसे और द्वापरमें पूजनसे भगवान् प्रसन्न होते हैं; परंतु कलियुग केवल पापकी जड़ और मलिन है, इसमें मनुष्योंका मन पापरूपी समुद्रमें मछली बना हुआ है (अर्थात् पापसे कभी अलग होना ही नहीं चाहता; इससे ध्यान, यज्ञ और पूजन नहीं बन सकते) ॥ २ ॥

भावार्थ : ऐसे कराल (कलियुग के) काल में तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसारके सब जंजालोंको नाश कर देनेवाला है। कलियुगमें यह रामनाम मनोवाञ्छित फल देनेवाला है, परलोकका परम हितैषी और इस लोकका माता-पिता है (अर्थात् परलोकमें भगवान्‌का परमधाम देता है और इस लोकमें माता-पिताके समान सब प्रकारसे पालन और रक्षण करता है) ॥ ३॥

भावार्थ : कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है; रामनाम ही एक आधार है। कपट की खान कलियुग रूपी कालनेमि के [मारने के] लिये रामनाम ही बुद्धिमान् और समर्थ श्रीहनुमान्‌जी हैं ॥ ४ ॥

दोहा

भावार्थ : रामनाम श्रीनृसिंह भगवान है, कलियुग हिरण्यकशिप है और जप करनेवाले जन प्रह्लादके समान हैं: यह रामनाम देवताओंके शत्रु (कलियुगरूपी दैत्य) को मारकर जप करनेवालोंकी रक्षा करेगा ॥ २७॥

चौपाई

भावार्थ : अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (वैर) से, क्रोधसे या आलस्यसे, किसी तरहसे भी नाम जपनेसे दसों दिशाओंमें कल्याण होता है। उसी (परम कल्याणकारी) रामनाम का स्मरण करके और श्रीरघुनाथजी को मस्तक नवाकर मैं रामजी के गुणों का वर्णन करता हूँ ॥ १॥

चौपाई 

भावार्थ : वे (श्रीरामजी) मेरी [बिगड़ी] सब तरह से सुधार लेंगे; जिनकी कृपा कृपा करने से नहीं अघाती। राम-से उत्तम स्वामी और मुझ सरीखा बुरा सेवक! इतने पर भी उन दयानिधि ने अपनी ओर देखकर मेरा पालन किया है॥ २ ॥

भावार्थ : लोक और वेदमें भी अच्छे स्वामी की यही रीति प्रसिद्ध है कि वह विनय सुनते ही प्रेम को पहचान लेता है। अमीर-गरीब, गँवार-नगरनिवासी, पण्डित मूर्ख, बदनाम-यशस्वी, ॥ ३ ॥

भावार्थ : सुकवि-कुकवि, सभी नर-नारी अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार राजा की सराहना करते हैं। और साधु, बुद्धिमान्, सुशील, ईश्वरके अंशसे उत्पन्न कृपालु राजा ॥४॥

भावार्थ : सबकी सुनकर और उनकी वाणी, भक्ति, विनय और चालको पहचानकर सुन्दर (मीठी) वाणीसे सबका यथायोग्य सम्मान करते हैं। यह स्वभाव तो संसारी राजाओं का है, कोसलनाथ श्रीरामचन्द्रजी तो चतुरशिरोमणि हैं ॥ ५ ॥

भावार्थ : श्रीरामजी तो विशुद्ध प्रेम से ही रीझते हैं, पर जगत्में मुझसे बढ़कर मूर्ख और मलिनबुद्धि और कौन होगा ? ॥ ६ ॥

दोहा

भावार्थ : तथापि कृपालु श्रीरामचन्द्रजी मुझ दुष्ट सेवक की प्रीति और रुचि को अवश्य रखेंगे, जिन्होंने पत्थरों को जहाज और बन्दर-भालुओं को बुद्धिमान् मन्त्री बना लिया ॥ २८ (क) ॥

भावार्थ : सब लोग मुझे श्रीरामजी का सेवक कहते हैं और मैं भी [बिना लज्जा संकोच के] कहलाता हूँ (कहनेवालोंका विरोध नहीं करता); कृपालु श्रीरामजी इस निन्दाको सहते हैं कि श्रीसीतानाथजी-जैसे स्वामी का तुलसीदास सा सेवक है ॥ २८ (ख) ॥

चौपाई

भावार्थ : यह मेरी बहुत बड़ी ढिठाई और दोष है, मेरे पापको सुनकर नरक ने भी नाक सिकोड़ ली है (अर्थात् नरकमें भी मेरे लिये ठौर नहीं है)। यह समझकर मुझे अपने ही कल्पित डरसे डर हो रहा है, किंतु भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ने तो स्वप्नमें भी इसपर (मेरी इस ढिठाई और दोषपर) ध्यान नहीं दिया ॥ १॥

भावार्थ : वरं मेरे प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने तो इस बातको सुनकर, देखकर और अपने सुचित्तरूपी चक्षु से निरीक्षण कर मेरी भक्ति और बुद्धि की [उलटे] सराहना की। क्योंकि कहने में चाहे बिगड़ जाय (अर्थात् मैं चाहे अपनेको भगवान्‌का सेवक कहता कहलाता रहूँ), परंतु हृदयमें अच्छापन होना चाहिये। (हृदयमें तो अपने को उनका सेवक बनने योग्य नहीं मानकर पापी और दीन ही मानता हूँ, यह अच्छापन है।) श्रीरामचन्द्रजी भी दासके हृदयकी [अच्छी] स्थिति जानकर रीझ जाते हैं ॥ २ ॥

भावार्थ : प्रभु के चित्त में अपने भक्तों की की हुई भूल-चूक याद नहीं रहती (वे उसे भूल जाते हैं) और उनके हृदय [की अच्छाई-नीकी को सौ-सौ बार याद करते रहते हैं। जिस पापके कारण उन्होंने बालि को व्याध की तरह मारा था, वैसी ही कुचाल फिर सुग्रीव ने चली ॥ ३ ॥

भावार्थ : वही करनी विभीषणकी थी, परन्तु श्रीरामचन्द्रजीने स्वप्रमें भी उसका मनमें विचार नहीं किया। उलटे भरतजीसे मिलनेके समय श्रीरघुनाथजी ने उनका सम्मान किया और राजसभा में भी उनके गुणों का बखान किया ॥ ४ ॥

दोहा

भावार्थ : प्रभु (श्रीरामचन्द्रजी) तो वृक्ष के नीचे और बंदर डाली पर (अर्थात् कहाँ मर्यादापुरुषोत्तम सच्चिदानन्दघन परमात्मा श्रीरामजी और कहाँ पेड़ों की शाखाओं पर कूदनेवाले बंदर)। परन्तु ऐसे बंदरोंको भी उन्होंने अपने समान बना लिया। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी-सरीखे शीलनिधान स्वामी कहीं भी नहीं हैं॥ २९ (क) ॥

भावार्थ : हे श्रीरामजी ! आपकी अच्छाईसे सभीका भला है (अर्थात् आपका कल्याणमय स्वभाव सभीका कल्याण करनेवाला है)। यदि यह बात सच है तो तुलसीदासका भी सदा कल्याण हो होगा ॥ २९ (ख) ॥

भावार्थ : इस प्रकार अपने गुण-दोषोंको कहकर और सबको फिर सिर नवाकर मैं श्रीरघुनाथजी का निर्मल यश वर्णन करता हूँ जिसके सुनने से कलियुग के पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ २९ (ग) ॥

चौपाई

भावार्थ :  मुनि याज्ञवल्क्यजी ने जो सुहावनी कथा मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजीको सुनायी थी, उसी संवाद को मैं बखानकर कहूँगा; सब सज्जन सुखका अनुभव करते हुए उसे सुनें ॥ १ ॥

भावार्थ : शिवजीने पहले इस सुहावने चरित्रको रचा, फिर कृपा करके पार्वतीजी को सुनाया। वही चरित्र शिवजी ने काकभुशुण्डिजी को रामभक्त और अधिकारी पहचानकर दिया ॥ २ ॥

भावार्थ : उन काकभुशुण्डिजीसे फिर याज्ञवल्क्यजी ने पाया और उन्होंने फिर उसे भरद्वाजजीको गाकर सुनाया। वे दोनों वक्ता और श्रोता (याज्ञवल्क्य और भरद्वाज) समान शीलवाले और समदर्शी हैं और श्रीहरिकी लीलाको जानते हैं ॥ ३ ॥

भावार्थ : वे अपने ज्ञानसे तीनों कालों की बातों को हथेली पर रखे हुए आँवलेके समान (प्रत्यक्ष) जानते हैं। और भी जो सुजान (भगवान्‌की लीलाओंका रहस्य जाननेवाले) हरिभक्त हैं, वे इस चरित्रको नाना प्रकारसे कहते, सुनते और समझते हैं ॥ ४॥

दोहा

भावार्थ : फिर वही कथा मैंने वाराह क्षेत्रमें अपने गुरुजीसे सुनी; परन्तु उस समय मैं लड़कपनके कारण बहुत बेसमझ था, इससे उसको उस प्रकार (अच्छी तरह) समझा नहीं ॥ ३० (क) ॥ 

भावार्थ : श्रीरामजीकी गूढ़ कथाके वक्ता (कहनेवाले) और श्रोता (सुननेवाले) दोनों ज्ञानके खजाने (पूरे ज्ञानी) होते हैं। मैं कलियुगके पापोंसे ग्रसा हुआ महामूढ़ जड़ जीव भला उसको कैसे समझ सकता था ? ॥ ३० (ख) ॥

चौपाई

भावार्थ : तो भी गुरुजीने जब बार-बार कथा कही, तब बुद्धिके अनुसार कुछ समझमें आयी। वहीं अब मेरेद्वारा भाषामें रची जायगी, जिससे मेरे मनको सन्तोष हो ॥ १॥

भावार्थ : जैसा कुछ मुझमें बुद्धि और विवेकका बल है, मैं हृदय में हरिकी प्रेरणासे उसीके अनुसार कहूँगा। मैं अपने सन्देह, अज्ञान और भ्रम को हरनेवाली कथा रचता हूँ, जो संसाररूपी नदी के पार करने के लिये नाव है ॥ २ ॥

भावार्थ : रामकथा पण्डितों को विश्राम देनेवाली, सब मनुष्योंको प्रसन्न करनेवाली और कलियुगके पापोंका नाश करनेवाली है। रामकथा कलियुगरूपी साँपके लिये मोरनी है और विवेकरूपी अग्निके प्रकट करनेके लिये अरणि (मन्थन की जानेवाली लकड़ी) है, (अर्थात् इस कथासे ज्ञानकी प्राप्ति होती है) ॥ ३ ॥

भावार्थ : रामकथा कलियुग में सब मनोरथों को पूर्ण करनेवाली कामधेनु गौ है और सज्जनोंके लिये सुन्दर सञ्जीवनी जड़ी है। पृथ्वीपर यही अमृत की नदी है, जन्म-मरण रूपी भय का नाश करनेवाली और भ्रमरूपी मेढकों को खाने के लिये सर्पिणी है ॥ ४॥

भावार्थ :  यह रामकथा असुरोंकी सेनाके समान नरकोंका नाश करनेवाली और साधुरूप देवताओं के कुल का हित करनेवाली पार्वती (दुर्गा) है। यह संत समाजरूपी क्षीरसमुद्र के लिये लक्ष्मीजी के समान है और सम्पूर्ण विश्वका भार उठानेमें अचल पृथ्वीके समान है ॥ ५ ॥

भावार्थ : यमदूतों के मुखपर कालिख लगानेके लिये यह जगत्में यमुनाजीके समान है और जीवोंको मुक्ति देनेके लिये मानो काशी ही है। यह श्रीरामजीको पवित्र तुलसीके समान प्रिय है और तुलसीदासके लिये हुलसी (तुलसीदासजीकी माता) के समान हृदयसे हित करनेवाली है॥ ६ ॥

भावार्थ : यह रामकथा शिवजीको नर्मदाजीके समान प्यारी है, यह सब सिद्धियों की तथा सुख-सम्पत्तिकी राशि है। सद्‌गुणरूपी देवताओंके उत्पन्न और पालन-पोषण करनेके लिये माता अदितिके समान है। श्रीरघुनाथजीकी भक्ति और प्रेम की परम सीमा-सी है॥७॥

दोहा

भावार्थ : तुलसीदासजी कहते हैं कि रामकथा मन्दाकिनी नदी है, सुन्दर (निर्मल) चित्त चित्रकूट है, और सुन्दर स्नेह ही वन है, जिसमें श्रीसीतारामजी विहार करते हैं॥ ३१ ॥

चौपाई

भावार्थ : श्रीरामचन्द्रजीका चरित्र सुन्दर चिन्तामणि है और संतोंकी सुबुद्धिरूपी स्त्रीका सुन्दर शृङ्गार है। श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूह जगत्‌का कल्याण करनेवाले और मुक्ति, धन, धर्म और परमधामके देनेवाले हैं ॥ १ ॥

भावार्थ : ज्ञान, वैराग्य और योगके लिये सद्‌गुरु हैं और संसाररूपी भयंकर रोगका नाश करनेके लिये देवताओंके वैद्य (अश्विनीकुमार) के समान हैं। ये श्रीसीतारामजीके प्रेमके उत्पन्न करनेके लिये माता-पिता हैं और सम्पूर्ण व्रत, धर्म और नियमोंके बीज हैं ॥ २ ॥

भावार्थ : पाप, सन्ताप और शोकका नाश करनेवाले तथा इस लोक और परलोक के प्रिय पालन करनेवाले हैं। विचार (ज्ञान) रूपी राजाके शूरवीर मन्त्री और लोभरूपी अपार समुद्रके सोखनेके लिये अगस्त्य मुनि हैं ॥ ३ ॥

भावार्थ : भक्तोंके मनरूपी वनमें बसनेवाले काम, क्रोध और कलियुगके पापरूपी हाथियोंके मारने के लिये सिंह के बच्चे हैं। शिवजीके पूज्य और प्रियतम अतिथि हैं और दरिद्रतारूपी दावानलके बुझानेके लिये कामना पूर्ण करनेवाले मेघ हैं ॥ ४॥

भावार्थ : विषयरूपी साँपका जहर उतारनेके लिये मन्त्र और महामणि हैं। ये ललाटपर लिखे हुए कठिनता से मिटनेवाले बुरे लेखों (मन्द प्रारब्ध) को मिटा देनेवाले हैं। अज्ञानरूपी अन्धकार के हरण करने के लिये सूर्यकिरणों के समान और सेवकरूपी धान के पालन करने में मेघ के समान हैं॥ ५॥

भावार्थ : मनोवाञ्छित वस्तु देनेमें श्रेष्ठ कल्पवृक्षके समान हैं और सेवा करनेमें हरि-हरके समान सुलभ और सुख देनेवाले हैं। सुकविरूपी शरद् ऋतुके मनरूपी आकाशको सुशोभित करनेके लिये तारागणके समान और श्रीरामजीके भक्तोंके तो जीवनधन ही हैं॥ ६ ॥

भावार्थ : सम्पूर्ण पुण्योंके फल महान् भोगोंके समान हैं। जगत्‌का छलरहित (यथार्थ) हित करनेमें साधु-संतोंके समान हैं। सेवकोंके मनरूपी मानसरोवर के लिये हंसके समान और पवित्र करनेमें गङ्गाजीकी तरंगमालाओं के समान हैं ॥ ७ ॥

दोहा

भावार्थ : श्रीरामजीके गुणोंके समूह कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल और कलियुगके कपट, दम्भ और पाखण्डके जलानेके लिये वैसे ही हैं जैसे ईंधनके लिये प्रचण्ड अग्नि ॥ ३२ (क) ॥

भावार्थ : रामचरित्र पूर्णिमा के चन्द्रमा की किरणों के समान सभीको सुख देनेवाले हैं, परन्तु सज्जनरूपी कुमुदिनी और चकोर के चित्त के लिये तो विशेष हितकारी और महान् लाभदायक हैं॥ ३२ (ख) ॥

चौपाई

भावार्थ : जिस प्रकार श्रीपार्वतीजीने श्रीशिवजीसे प्रश्न किया और जिस प्रकारसे श्रीशिवजीने विस्तारसे उसका उत्तर कहा, वह सब कारण मैं विचित्र कथाकी रचना करके गाकर कहूँगा ॥ १॥

भावार्थ : जिसने यह कथा पहले न सुनी हो, वह इसे सुनकर आश्चर्य न करे। जो ज्ञानी इस विचित्र कथाको सुनते हैं, वे यह जानकर आश्चर्य नहीं करते कि संसारमें रामकथाकी कोई सीमा नहीं है (रामकथा अनन्त है)। उनके मनमें ऐसा विश्वास रहता है। नाना प्रकारसे श्रीरामचन्द्रजीके अवतार हुए हैं और सौ करोड़ तथा अपार रामायण हैं ॥ २-३ ॥

भावार्थ : कल्पभेद के अनुसार श्रीहरि के सुन्दर चरित्रों को मुनीश्वरों ने अनेकों प्रकारसे गाया है। हृदयमें ऐसा विचारकर संदेह न कीजिये और आदरसहित प्रेमसे इस कथाको सुनिये ॥ ४ ॥

दोहा

भावार्थ : श्रीरामचन्द्रजी अनन्त हैं, उनके गुण भी अनन्त हैं और उनकी कथाओंका विस्तार भी असीम है। अतएव जिनके विचार निर्मल हैं, वे इस कथाको सुनकर आश्चर्य नहीं मानेंगे ॥ ३३ ॥

​चौपाई 

भावार्थ : इस प्रकार सब संदेहोंको दूर करके और श्रीगुरुजीके चरणकमलोंकी रजको सिरपर धारण करके मैं पुनः हाथ जोड़कर सबकी विनती करता हूँ, जिससे कथा की रचना में कोई दोष स्पर्श न करने पावे ॥ १॥

Topic 13 : The date of composition of the
Ramacharitamanasa

चौपाई

भावार्थ : अब मैं आदरपूर्वक श्रीशिवजीको सिर नवाकर श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी निर्मल कथा कहता हूँ। श्रीहरिके चरणोंपर सिर रखकर संवत् १६३१ में इस कथाका आरम्भ करता हूँ ॥ २॥

भावार्थ : चैत्र मास की नवमी तिथि मंगलवार को श्री अयोध्याजी में यह चरित्र प्रकाशित हुआ। जिस दिन श्रीरामजीका जन्म होता है, वेद कहते हैं कि उस दिन सारे तीर्थ वहाँ (श्रीअयोध्याजी में) चले आते हैं ॥ ३ ॥

भावार्थ : असुर, नाग, पक्षी, मनुष्य, मुनि और देवता सब अयोध्याजी में आकर श्रीरघुनाथजी की सेवा करते हैं। बुद्धिमान् लोग जन्म का महोत्सव मनाते हैं और श्रीरामजी की सुन्दर कीर्ति का गान करते हैं ॥ ४॥ 

दोहा 

भावार्थ : सज्जनों के बहुत-से समूह उस दिन श्रीसरयूजी के पवित्र जल में स्नान करते हैं और हृदय में सुन्दर श्यामशरीर श्रीरघुनाथजीका ध्यान करके उनके नाम का जप करते हैं ॥ ३४ ॥

चौपाई

भावार्थ : वेद-पुराण कहते हैं कि श्रीसरयूजी का दर्शन, स्पर्श, स्नान और जलपान पापों को हरता है। यह नदी बड़ी ही पवित्र है, इसकी महिमा अनन्त है, जिसे विमल बुद्धिवाली सरस्वतीजी भी नहीं कह सकतीं ॥ १॥

भावार्थ : यह शोभायमान अयोध्यापुरी श्रीरामचन्द्रजी के परमधाम की देनेवाली है, सब लोकों में प्रसिद्ध है और अत्यन्त पवित्र है। जगत्में [अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ञ्ज और जरायुज] चार खानि (प्रकार) के अनन्त जीव हैं, इनमेंसे जो कोई भी अयोध्याजीमें शरीर छोड़ते हैं वे फिर संसार में नहीं आते (जन्म-मृत्युके चक्करसे छूटकर भगवान्‌के परमधाममें निवास करते हैं) ॥ २ ॥

भावार्थ : इस अयोध्यापुरीको सब प्रकारसे मनोहर, सब सिद्धियों की देनेवाली और कल्याण की खान समझकर मैंने इस निर्मल कथा का आरम्भ किया, जिसके सुनने से काम, मद और दम्भ नष्ट हो जाते हैं ॥ ३॥

भावार्थ : इसका नाम रामचरितमानस है, जिसके कानों से सुनते ही शान्ति मिलती है। मनरूपी हाथी विषयरूपी दावानल में जल रहा है, वह यदि इस रामचरितमानसरूपी सरोवरमें आ पड़े तो सुखी हो जाय ॥ ४ ॥

भावार्थ : यह रामचरितमानस मुनियों का प्रिय है, इस सुहावने और पवित्र मानस की शिवजी ने रचना की। यह तीनों प्रकार के दोषों, दुःखों और दरिद्रता को तथा कलियुग की कुचालों और सब पापोंका नाश करनेवाला है ॥ ५ ॥

भावार्थ : श्रीमहादेवजी ने इसको रचकर अपने मन में रखा था और सुअवसर पाकर पार्वतीजीसे कहा। इसीसे शिवजीने इसको अपने हृदयमें देखकर और प्रसन्न होकर इसका सुन्दर 'रामचरितमानस' नाम रखा ॥ ६ ॥

भावार्थ : मैं उसी सुख देनेवाली सुहावनी रामकथाको कहता हूँ, हे सज्जनो! आदरपूर्वक मन लगाकर इसे सुनिये ॥ ७ ॥

Topic 14 : The metaphorical representation of
the Manasa as a lake and its glory

दोहा

भावार्थ : यह रामचरितमानस जैसा है, जिस प्रकार बना है और जिस हेतुसे जगत्‌में इसका प्रचार हुआ, अब वही सब कथा मैं श्रीउमा-महेश्वरका स्मरण करके कहता हूँ ॥ ३५ ॥

चौपाई

भावार्थ : श्रीशिवजी की कृपा से उसके हृदय में सुन्दर बुद्धि का विकास हुआ, जिससे यह तुलसीदास श्रीरामचरितमानस का कवि हुआ। अपनी बुद्धिके अनुसार तो वह इसे मनोहर ही बनाता है। किंतु फिर भी हे सज्जनो! सुन्दर चित्तसे सुनकर इसे आप सुधार लीजिये ॥ १ ॥

भावार्थ : सुन्दर (सात्त्विकी) बुद्धि भूमि है, हृदय ही उसमें गहरा स्थान है, वेद-पुराण समुद्र हैं और साधु-संत मेघ हैं। वे (साधुरूपी मेघ) श्रीरामजी के सुयशरूपी सुन्दर, मधुर, मनोहर और मङ्गलकारी जलकी वर्षा करते हैं ॥ २ ॥

भावार्थ : सगुण लीलाका जो विस्तारसे वर्णन करते हैं, वही राम-सुयशरूपी जलकी निर्मलता है, जो मलका नाश करती है; और जिस प्रेमाभक्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता, वही इस जल की मधुरता और सुन्दर शीतलता है॥ ३॥

भावार्थ : वह (राम-सुयशरूपी) जल सत्कर्मरूपी धान के लिये हितकर है और श्रीरामजीके भक्तोंका तो जीवन ही है। वह पवित्र जल बुद्धिरूपी पृथ्वी पर गिरा और सिमटकर सुहावने कानरूपी मार्गसे चला और मानस (हृदय) रूपी श्रेष्ठ स्थान में भरकर वहीं स्थिर हो गया। वही पुराना होकर सुन्दर, रुचिकर, शीतल और सुखदायी हो गया ॥ ४-५ ॥

दोहा

भावार्थ : इस कथा में बुद्धिसे विचारकर जो चार अत्यन्त सुन्दर और उत्तम संवाद (भुशुण्डि-गरुड़, शिव-पार्वती, याज्ञवल्क्य-भरद्वाज और तुलसीदास और संत) रचे हैं, वही इस पवित्र और सुन्दर सरोवर के चार मनोहर घाट हैं ॥ ३६ ॥

चौपाई

भावार्थ :सात काण्ड ही इस मानस सरोवरकी सुन्दर सात सीढ़ियाँ हैं, जिनको ज्ञानरूपी नेत्रों से देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है। श्रीरघुनाथजी की निर्गुण (प्राकृतिक गुणोंसे अतीत) और निर्बाध (एकरस) महिमा का जो वर्णन किया जायगा, वही इस सुन्दर जल की अथाह गहराई है॥ १ ॥

भावार्थ : श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीका यश अमृत के समान जल है। इसमें जो उपमाएँ दी गयी हैं वही तरंगोंका मनोहर विलास है। सुन्दर चौपाइयाँ हो इसमें घनी फैली हुई पुरइन (कमलिनी) हैं और कविता की युक्तियाँ सुन्दर मणि (मोती) उत्पन्न करनेवाली सुहावनी सीपियाँ हैं॥ २॥

भावार्थ : जो सुन्दर छन्द, सोरठे और दोहे हैं, वही इसमें बहुरंगे कमलों के समूह सुशोभित हैं। अनुपम अर्थ, ऊँचे भाव और सुन्दर भाषा ही पराग (पुष्परज), मकरन्द (पुष्परस) और सुगन्ध हैं ॥ ३॥ 

भावार्थ : सत्कमाँ (पुण्यों) के पुञ्ज भौरोंकी सुन्दर पंक्तियाँ हैं, ज्ञान, वैराग्य और विचार हंस हैं। कविताकी ध्वनि वक्रोक्ति, गुण और जाति ही अनेकों प्रकारकी मनोहर मछलियाँ हैं॥ ४

भावार्थ : अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष- ये चारों, ज्ञान-विज्ञान का विचार के कहना, काव्यके नौ रस, जप, तप, योग और वैराग्यके प्रसंग- ये सब इस सरोवरके सुन्दर जलचर जीव हैं ॥ ५॥

भावार्थ : सुकृती (पुण्यात्मा) जनों के, साधुओं के और श्रीरामनाम के गुणों का गान ही विचित्र जल-पक्षियोंके समान है। संतोंकी सभा ही इस सरोवर के चारों ओर की अमराई (आमकी बगीचियाँ) हैं और श्रद्धा वसन्त ऋतुके समान कही गयी है ॥ ६ ॥

भावार्थ : नाना प्रकार से भक्तिका निरूपण और क्षमा, दया तथा दम (इन्द्रियनिग्रह) लताओंके मण्डप हैं। मनका निग्रह, यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) ही उनके फूल हैं, ज्ञान फल है और श्रीहरिके चरणोंमें प्रेम ही इस ज्ञानरूपी फलका रस है। ऐसा वेदोंने कहा है॥ ७ ॥

भावार्थ : इस (रामचरितमानस) में और भी जो अनेक प्रसंगों की कथाएँ हैं, वे ही इसमें तोते, कोयल आदि रंग-बिरंगे पक्षी हैं ॥ ८ ॥

दोहा

भावार्थ : कथा में जो रोमाञ्च होता है वही वाटिका, बाग और वन हैं; और जो सुख होता है, वही सुन्दर पक्षियोंका विहार है। निर्मल मन ही माली है जो प्रेमरूपी जलसे सुन्दर नेत्रोंद्वारा उनको सींचता है ॥ ३७ ॥

चौपाई

भावार्थ : जो लोग इस चरित्रको सावधानीसे गाते हैं, वे ही इस तालाब के चतुर रखवाले हैं और जो स्त्री- पुरुष सदा आदरपूर्वक इसे सुनते हैं, वे ही इस सुन्दर मानसके अधिकारी उत्तम देवता हैं ॥ १॥

भावार्थ : जो अति दुष्ट और विषयी हैं वे अ भागे बगुले और कौवे हैं, जो इस सरोवर के समीप नहीं जाते। क्योंकि यहाँ (इस मानस सरोवरमें) घोंघे, मेढक और सेवार के समान विषय-रसकी नाना कथाएँ नहीं हैं ॥ २ ॥

भावार्थ : इसी कारण बेचारे कौवे और बगुलेरूपी विषयी लोग यहाँ आते हुए हृदय में हार मान जाते हैं। क्योंकि इस सरोवर तक आने में कठिनाइयाँ बहुत हैं। श्रीरामजी की कृपा बिना यहाँ नहीं आया जाता ॥ ३ ॥ 

भावार्थ :घोर कुसंग ही भयानक बुरा रास्ता है; उन कुसंगियों के वचन ही बाघ, सिंह और साँप हैं। घ रके काम-काज और गृहस्थीके भाँति-भाँतिके जंजाल ही अत्यन्त दुर्गम बड़े-बड़े पहाड़ हैं॥ ४॥

भावार्थ :मोह, मद और मान ही बहुत-से बीहड़ वन हैं और नाना प्रकारके कुतर्क ही भयानक नदियाँ हैं॥ ५ ॥

दोहा

भावार्थ : जिनके पास श्रद्धारूपी राह खर्च नहीं है और संतोंका साथ नहीं है और जिनको श्रीरघुनाथजी प्रिय नहीं हैं, उनके लिये यह मानस अत्यन्त ही अगम है। (अर्थात् श्रद्धा, सत्संग और भगवत्प्रेमके बिना कोई इसको नहीं पा सकता) ॥ ३८ ॥

चौपाई

भावार्थ :यदि कोई मनुष्य कष्ट उठाकर वहाँ तक पहुँच भी जाय, तो वहाँ जाते ही उसे नींदरूपी जूड़ी आ जाती है। हृदयमें मूर्खतारूपी बड़ा कड़ा जाड़ा लगने लगता है, जिससे वहाँ जाकर भी वह अभागा स्नान नहीं कर पाता ॥ १ ॥

भावार्थ : उससे उस सरोवरमें स्नान और उसका जलपान तो किया नहीं जाता, वह अभिमानसहित लौट आता है। फिर यदि कोई उससे [वहाँका हाल] पूछने आता है, तो वह [अपने अभाग्यकी बात न कहकर] सरोवरकी निन्दा करके उसे समझाता है ॥ २ ॥

भावार्थ : ये सारे विघ्न उसको नहीं व्यापते (बाधा नहीं देते) जिसे श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर कृपाकी दृष्टिसे देखते हैं। वही आदरपूर्वक इस सरोवरमें स्नान करता है और महान् भयानक त्रितापसे (आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक तापोंसे) नहीं जलता ॥ ३ ॥

भावार्थ :जिनके मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सुन्दर प्रेम है, वे इस सरोवरको कभी नहीं छोड़ते। हे भाई! जो इस सरोवर में स्नान करना चाहे वो मन लगाकर सतसंग करे ।।४ ।।

भावार्थ : ऐसे मानस सरोवरको हृदय के नेत्रों से देखकर और उसमें गोता लगाकर कवि की बुद्धि निर्मल हो गयी, हृदय में आनन्द और उत्साह भर गया और प्रेम तथा आनन्द का प्रवाह उमड़ आया ॥ ५॥

भावार्थ : उससे वह सुन्दर कवितारूपी नदी बह निकली, जिसमें श्रीरामजी का निर्मल यशरूपी जल भरा है। इस (कवितारूपिणी नदी) का नाम सरयू है, जो सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंकी जड़ है। लोकमत और वेदमत इसके दो सुन्दर किनारे हैं ॥ ६ ॥

भावार्थ : यह सुन्दर मानस-सरोवरकी कन्या सरयू नदी बड़ी पवित्र है और कलियुगके [छोटे-बड़े] पापरूपी तिनकों और वृक्षोंको जड़से उखाड़ फेंकनेवाली है॥ ७॥

दोहा 

भावार्थ : तीनों प्रकारके श्रोताओंका समाज ही इस नदीके दोनों किनारोंपर बसे हुए पुरवे, गाँव और नगर हैं; और संतोंकी सभा ही सब सुन्दर मङ्गलोंकी जड़ अनुपम अयोध्याजी है ॥ ३९ ॥

चौपाई

भावार्थ : सुन्दर कीर्तिरूपी सुहावनी सरयूजी रामभक्तिरूपी गङ्गाजीमें जा मिलीं। छोटे भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामजीके युद्धका पवित्र यशरूपी सुहावना महानद सोन उसमें आ मिला ॥ १ ॥

भावार्थ : दोनोंके बीचमें भक्तिरूपी गङ्गाजीकी धारा ज्ञान और वैराग्यके सहित शोभित हो रही है। ऐसी तीनों तापोंको डरानेवाली यह तिमुहानी नदी रामस्वरूपरूपी समुद्र की ओर जा रही है ॥ २ ॥

भावार्थ : इस (कीर्तिरूपी सरयू) का मूल मानस (श्रीरामचरित) है और यह [रामभक्तिरूपी] गङ्गाजीमें मिली है, इसलिये यह सुननेवाले सज्जनों के मन को पवित्र कर देगी। इसके बीच-बीचमें जो भिन्न-भिन्न प्रकार की विचित्र कथाएँ हैं वे ही मानो नदीतट के आस-पास के वन और बाग हैं ॥ ३ ॥

भावार्थ : श्रीपार्वतीजी और शिवजी के विवाह के बराती इस नदी में बहुत प्रकारके असंख्य जलचर जीव हैं। श्रीरघुनाथजीके जन्मकी आनन्द-बधाइयाँ ही इस नदीके भँवर और तरंगों की मनोहरता है ॥ ४ ॥ 

दोहा

भावार्थ : चारों भाइयोंके जो बालचरित हैं, वे ही इसमें खिले हुए रंग-बिरंगे बहुत-से कमल हैं। महाराज श्रीदशरथजी तथा उनकी रानियों और कुटुम्बियोंके सत्कर्म (पुण्य) ही भ्रमर और जल-पक्षी हैं ॥ ४० ॥

चौपाई

भावार्थ : श्रीसीताजी के स्वयंवरकी जो सुन्दर कथा है, वही इस नदीमें सुहावनी छबि छा रही है। अनेकों सुन्दर विचारपूर्ण प्रश्न ही इस नदीकी नावें हैं और उनके विवेकयुक्त उत्तर ही चतुर केवट हैं॥ १॥ 

भावार्थ : इस कथा को सुनकर पीछे जो आपसमें चर्चा होती है, वही इस नदीके सहारे-सहारे चलनेवाले यात्रियोंका समाज शोभा पा रहा है। परशुरामजी का क्रोध इस नदीकी भयानक धारा है और श्रीरामचन्द्रजी के श्रेष्ठ वचन ही सुन्दर बँधे हुए घाट हैं ॥ २॥

भावार्थ : भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजीके विवाहका उत्साह ही इस कथा नदीकी कल्याणकारिणी बाढ़ है, जो सभीको सुख देनेवाली है। इसके कहने-सुनने में जो हर्षित और पुलकित होते हैं, वे ही पुण्यात्मा पुरुष हैं, जो प्रसन्न मनसे इस नदी में नहाते हैं ॥ ३ ॥

भावार्थ :  श्रीरामचन्द्रजी के राजतिलक के लिये जो मङ्गल-साज सजाया गया, वही मानो पर्व के समय इस नदी पर यात्रियों के समूह इकट्ठे हुए हैं। कैकेयी की कुबुद्धि ही इस नदी में काई है, जिसके फलस्वरूप बड़ी भारी विपत्ति आ पड़ी ॥ ४॥

दोहा

भावार्थ : सम्पूर्ण अनगिनत उत्पातों को शान्त करनेवाला भरतजी का चरित्र नदी-तटपर किया जानेवाला जप-यज्ञ है। कलियुग के पापों और दुष्टों के अवगुणों के जो वर्णन हैं वे ही इस नदीके जलका कीचड़ और बगुले-कौए हैं॥ ४१ ॥

चौपाई

भावार्थ : यह कीर्तिरूपिणी नदी छहों त्रऋतुओं में सुन्दर है। सभी समय यह परम सुहावनी और अत्यन्त पवित्र है। इसमें शिव-पार्वती का विवाह हेमन्त ऋतु है। श्रीरामचन्द्रजी के जन्म का उत्सव सुखदायी शिशिर ऋतु है ॥ १॥

भावार्थ : श्रीरामचन्द्रजीके विवाह-समाजका वर्णन ही आनन्द-मङ्गलमय ऋतुराज वसंत है। श्रीरामजीका वनगमन दुःसह ग्रीष्म ऋतु है और मार्गकी कथा ही कड़ी धूप और लू है॥ २॥

भावार्थ : राक्षसों के साथ घोर युद्ध ही वर्षा ऋतु है, जो देवकुल रूपी धान के लिये सुन्दर कल्याण करनेवाली है। रामचन्द्रजी के राज्यकाल का जो सुख, विनम्रता और बड़ाई है वही निर्मल सुख देनेवाली सुहावनी शरद् ऋतु है ॥ ३ ॥

भावार्थ : सती-शिरोमणि श्रीसीताजी के गुणों की जो कथा है, वही इस जल का निर्मल और अनुपम गुण है। श्रीभरतजी का स्वभाव इस नदी की सुन्दर शीतलता है, जो सदा एक-सी रहती है और जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ४ ॥

दोहा

भावार्थ : चारों भाइयों का परस्पर देखना, बोलना, मिलना, एक दूसरेसे प्रेम करना, हँसना और सुन्दर भाईपन इस जलकी मधुरता और सुगन्ध हैं॥ ४२ ॥

चौपाई 

भावार्थ : मेरा आर्तभाव, विनय और दीनता इस सुन्दर और निर्मल जलका कम हलकापन नहीं है (अर्थात् अत्यन्त हलकापन है)। यह जल बड़ा ही अनोखा है, जो सुनने से ही गुण करता है और आशारूपी प्यासको और मनके मैल को दूर कर देता है॥ १॥

भावार्थ : यह जल श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर प्रेमको पुष्ट करता है, कलियुग के समस्त पापों और उनसे होनेवाली ग्लानि को हर लेता है। संसारके (जन्म-मृत्युरूप) श्रम को सोख लेता है, सन्तोष को भी सन्तुष्ट करता है और पाप, ताप, दरिद्रता और दोषों को नष्ट कर देता है॥ २॥

भावार्थ : यह जल काम, क्रोध, मद और मोहका नाश करनेवाला और निर्मल ज्ञान और वैराग्यका बढ़ानेवाला है। इसमें आदरपूर्वक स्नान करने से और इसे पीने से हृदयमें रहनेवाले सब पाप-ताप मिट जाते हैं ॥ ३ ॥

भावार्थ : जिन्होंने इस (राम-सुयशरूपी) जलसे अपने हृदयको नहीं धोया, वे कायर कलिकालके द्वारा ठगे गये। जैसे प्यासा हिरन सूर्यकी किरणों के रेत पर पड़ने से उत्पन्न हुए जल के भ्रम को वास्तविक जल समझकर पीने को दौड़ता है और जल न पाकर दुखी होता है, वैसे ही वे (कलियुग से उगे हुए) जीव भी [विषयोंके पीछे भटककर] दुखी होंगे ॥ ४॥

दोहा

भावार्थ : अपनी बुद्धिके अनुसार इस सुन्दर जलके गुणोंको विचारकर, उसमें अपने मनको स्नान कराकर और श्रीभवानी-शङ्कर को स्मरण करके कवि (तुलसीदास) सुन्दर कथा कहता है॥ ४३ (क) ॥ 

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