Topic 15 - Dialogue between the sages- Yagyavalkya and Bharadvaja and the greatness of Prayaga
दोहा
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद ।
कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद ॥ ४३ (ख) ॥
चौपाई
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा ॥
तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना। १
माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई ॥
देव दनुज किंनर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं ॥२
पूजहिं माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता ॥
भरद्वाज आश्रम अति पावन । परम रम्य मुनिबर मन भावन ॥३
तहाँ होड़ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथ राजा ॥
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा ॥ ४
दोहा
ब्रह्म निरूपन धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।
कहहिं भगति भगवंत कै संजत ग्यान बिराग ॥ ४४ ॥
चौपाई
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं ।।
प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा ।। १
एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए ।
जागबलिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी ।।२
सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे ।।
करि पूजा मुनि सुजसु बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी ।।३
नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्त्व सबु तोरें ॥
कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौं न कहउँ बड़ होड़ अकाजा ॥४
दोहा
संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।
होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव ॥ ४५ ॥
चौपाई
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू ॥
राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा ॥१
संतत जपत संभु अबिनासी । सिव भगवान ग्यान गुन रासी ॥
आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं ।।२
सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया ॥
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही॥३
एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा ॥
नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयउ रोषु रन रावनु मारा ॥ ४
दोहा
प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि।
सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि ॥ ४६ ॥
चौपाई
जैसें मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी ॥
जागबलिक बोले मुसुकाई । तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई ॥१
रामभगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारि मैं जानी ॥
चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा ॥२
तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम कै कथा सुहाई ॥
महामोहु महिषेसु बिसाला । रामकथा कालिका कराला ॥३
Topic 16 - Sati’s bewilderment, Shri Ram’s divine glory and Sati’s remorse
चौपाई
रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना ॥
ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी ॥ ४
दोहा
कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद।
भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद ॥ ४७ ॥
चौपाई
एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं ।।
संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी ॥१
रामकथा मुनिबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी ।।
रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई ॥ २
कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा ।।
मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी ।।३
तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा ॥
पिता बचन तजि राजु उदासी । दंडक बन बिचरत अबिनासी ॥४
दोहा
हृदयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ ।
गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोइ ॥ ४८ (क) ॥
सोरठा
संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।
तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची ॥ ४८ (ख) ॥
चौपाई
रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा ॥
जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा । करत बिचारु न बनत बनावा ।।१
एहि बिधि भए सोचबस ईसा । तेही समय जाइ दससीसा ॥
लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा ॥२
करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही ॥
मृग बधि बंधु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए ॥ ३
बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई ॥
कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुखु ताकें ॥४
दोहा
अति बिचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।
जे मतिमंद बिमोह बस हृदय धरहिं कछु आन ॥ ४९ ॥
चौपाई
संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरषु बिसेषा ॥
भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानि न कीन्हि चिन्हारी ॥१
जय सच्चिदानंद जग पावन । अस कहि चलेउ मनोज नसावन ॥
चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता ॥२
सतीं सो दसा संभु कै देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी ॥
संकरु जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा ॥ ३
तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधामा ॥
भए मगन छबि तासु बिलोकी । अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी ॥४
दोहा
ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद ॥ ५०॥
चौपाई
बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी ॥
खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी॥ १
संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई ॥
अस संसय मन भयउ अपारा। होड़ न हृदयं प्रबोध प्रचारा ॥२
जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी ॥
सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ ॥ ३
जासु कथा कुंभज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई ।।
सोड़ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा ॥४
छंद
मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं।
कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं ॥
सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी।
अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनी ।।
सोरठा
लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिवँ बार बहु।
बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियें ॥ ५१ ॥
चौपाई
जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू ॥
तब लगि बैठ अहउँ बटछाहीं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाहीं॥१
जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी ॥
चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं बिचारु करौं का भाई ॥२
इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना ।।
मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधि बिपरीत भलाई नाहीं ॥३
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥
अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा ॥४
दोहा
पुनि पुनि हृदयँ बिचारु करि धरि सीता कर रूप।
आगें होइ चलि पंथ तेहिं जेहिं आवत नरभूप ॥ ५२॥
चौपाई
लछिमन दीख उमाकृत बेषा। चकित भए भ्रम हृदयं बिसेषा ॥
कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा ॥ १
सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी ॥
सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना ।।२
सती कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊ। देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ ॥
निज माया बलु हृदय बखानी। बोले बिहसि रामु मृदु बानी ॥३
जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू ॥
कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू । बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू ॥ ४
दोहा
राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु ।
सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु ॥ ५३ ॥
चौपाई
मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना ॥
जाइ उतरु अब देहउँ काहा। उर उपजा अति दारुन दाहा ।।१
जाना राम सतीं दुखु पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा ॥
सतीं दीख कौतुकु मग जाता। आगें रामु सहित श्री भ्राता ॥२
फिरि चितवा पाछे प्रभु देखा। सहित बंधु सिय सुंदर बेषा ॥
जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना ।। ३
देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका ॥
बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा ॥४
दोहा
सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप।
जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप ॥ ५४॥
चौपाई
देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते ॥
जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा ।। १
पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा ॥
अवलोके रघुपति बहुतेरे । सीता सहित न बेष घनेरे ॥ २
सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भईं सभीता ॥
हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं ॥३
बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी ॥
पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा ॥ ४
दोहा
गईं समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात।
लीन्हि परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात ॥ ५५ ॥
मासपारायण, दूसरा विश्राम
Topic 17 - Disowning of Sati by Shiva and Shiva’s trance
चौपाई
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ । भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ ।
कछु न परीछा लीन्हि गोसाईं। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाईं ॥१
जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई ॥
तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सबु जाना ॥२
बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूठ कहावा ॥
हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदय बिचारत संभु सुजाना ॥३
सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा ।।
जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होड़ अनीती ।।४
दोहा
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।
प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदय अधिक संतापु ।॥ ५६ ॥
चौपाई
तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदय अस आवा ॥
एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं ॥१
अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा ॥
चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई ॥२
अस पन तुम्ह बिनु करड़ को आना। रामभगत समरथ भगवाना ।।
सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा ॥३
कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला । सत्यधाम प्रभु दीनदयाला ।।
जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती ॥ ४
दोहा
सतीं हृदयँ अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य।
कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य ॥ ५७ (क) ॥
सोरठा
जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।
बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि ॥५७ (ख) ॥
चौपाई
हृदयं सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहिं बरनी ॥
कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा ॥१
संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी ।।
निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई ॥२
सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुख हेतू ॥
बरनत पंथ बिबिध इतिहासा । बिस्वनाथ पहुँचें कैलासा ॥३
तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन ॥
संकर सहज सरूपु सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा ॥४
दोहा
सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं ॥ ५८ ॥
चौपाई
नित नव सोचु सती उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा ॥
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना ॥ १
सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा ॥
अब बिधि अस बुझिअ नहिं तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही ॥ २
कहि न जाइ कछु हृदय गलानी। मन महुँ रामहि सुमिर सयानी ।।
जौं प्रभु दीनदयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा ॥ ३
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी ।।
जौं मोरें सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू ॥४
दोहा
तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ।
होइ मरनु जेहिं बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ ॥ ५९ ॥
चौपाई
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी ॥
बीतें संबत सहस सतासी । तजी समाधि संभु अबिनासी ।।१
राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सतीं जगतपति जागे ॥
जाइ संभु पद बंदनु कीन्हा। सनमुख संकर आसनु दीन्हा ॥ २
लगे कहन हरि कथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला ॥
देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक ॥ ३
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदय तब आवा ॥
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥ ४
Topic 18 - Sati’s visit to Daksha’s sacrifice
दोहा
दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग।
नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग ॥ ६०॥
चौपाई
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्वा ॥
बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई ॥ १
सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना ॥
सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना ॥२
पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी ॥
जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं ॥३
पति परित्याग हृदयँ दुखु भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी ॥
बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी ॥४
दोहा
पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ।
तौ मैं जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ ॥ ६१ ॥
चौपाई
कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा ॥
दच्छ सकल निज सुता बोलाईं। हमरें बयर तुम्हउ बिसराईं ॥ १
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना ।।
जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी ॥२
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा ।।
तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई ॥ ३
भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा ॥
कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ ।४
दोहा
कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि।
दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि ॥ ६२ ॥
चौपाई
पिता भवन जब गई भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी ।।
सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता ॥ १
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता ।।
सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा ॥२
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ ॥
पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा ।।३
जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना ।।
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा ॥४
Topic 19 : Sati’s self-immolation through the fire of Yoga out of indignation at the slight offered to Her Spouse by Her father , destruction of Daksha’s sacrifice
दोहा
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध।
सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध ॥ ६३ ॥
चौपाई
सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा ॥
सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ ॥ १
संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा ॥
काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई ।।२
जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी ॥
पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही ॥३
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू ॥
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा ॥४
दोहा
सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस।
जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस ॥ ६४ ॥
चौपाई
समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए॥
जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा ॥ १
भै जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख कै होई ॥
यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी ॥ २
Topic 20 : Descent of Goddess Parvati and Her penance
सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा ॥
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई ॥ ३
जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपति तहँ छाईं ।
जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे ॥ ४
दोहा
सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति।
प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति ॥ ६५ ॥
चौपाई
सरिता सब पुनीत जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं ।।
सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा ॥१
सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ ।
नित नूतन मंगल गृह तासू । ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू ॥२
नारद समाचार सब पाए। कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए ।
सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा ॥ ३
नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा ।।
निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना ॥४
दोहा
त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।
कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदय बिचारि ॥ ६६ ॥
चौपाई
कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी ॥
सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी ॥१
सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी ॥
सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता ॥२
होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं ॥
एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़िहहिं पतिब्रत असिधारा ॥३
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी ॥
अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना ॥४
दोहा
जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख ॥ ६७ ॥
चौपाई
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी ॥
नारदहूँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना ॥१
सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना ॥
होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयं धरि राखा ॥२
उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू ॥
जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई ॥३
झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहिं दंपति सखीं सयानी ॥
उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ ॥ ४
दोहा
कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार ॥ ६८ ॥
चौपाई
तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होड़ करै जौं दैउ सहाई ॥
जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलिहि उमहि तस संसय नाहीं ।।१
जे जे बर के दोष बखाने । ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने ।।
जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषउ गुन सम कह सबु कोई ॥२
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं ।।
भानु कृसानु सर्व रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं ।।३
सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई ॥
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं ।॥४
दोहा
जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान।
परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान ॥ ६९ ॥
चौपाई
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना ।।
सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें ॥ १
संभु सहज समरथ भगवाना । एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना ।।
दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किएँ कलेसू ॥ २
जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी॥
जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं ॥३
बर दायक प्रनतारति भंजन । कृपासिंधु सेवक मन रंजन ॥
इच्छित फल बिनु सिव अवराधें। लहिअ न कोटि जोग जप साधें ॥४
दोहा
अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।
होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस ॥ ७० ॥
चौपाई
कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ ॥
पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना ॥ १
जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरूपा ॥
न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी ॥ २
जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू ॥
सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होड़ उर दाहू ॥३
अस कहि परी चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा ॥
बरु पावक प्रगटै ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं ॥ ४
दोहा
प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान।
पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोड़ करिहि कल्यान ॥ ७१ ॥
चौपाई
अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावनु देहू ॥
करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटिहि कलेसू ॥१
नारद बचन सगर्भ सहेतू । सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू ॥
अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका। सबहि भाँति संकरु अकलंका ॥२
सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं ॥
उमहि बिलोकि नयन भरे बारी। सहित सनेह गोद बैठारी।३
बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई ॥
जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी ॥४
दोहा
सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि।
सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि ॥ ७२ ॥
चौपाई
करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी ॥
मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा ।।१
तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता । तपबल बिष्नु सकल जग त्राता ।।
तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरड़ महिभारा ।।२
तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तपु अस जियँ जानी ।।
सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी ॥ ३
मातु पितहि बहुविधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाई॥
प्रिय परिवार पिता अरु माता। भए बिकल मुख आव न बाता ॥४
दोहा
बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ ।
पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ ॥ ७३ ॥
चौपाई
उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना ॥
अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू ॥१
नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा ॥
संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए ॥२
कछु दिन भोजनु बारि बतासा । किए कठिन कछु दिन उपबासा ।।
बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई ॥ ३
पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नामु तब भयउ अपरना।
देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा ॥४
दोहा
भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिराजकुमारि ।
परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि ॥ ७४ ॥
चौपाई
अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भए अनेक धीर मुनि ग्यानी ॥
अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी । सत्य सदा संतत सुचि जानी ।। १
आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं ॥
मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा ।। २
सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी ।।
उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा ॥ ३
जब तें सतीं जाइ तनु त्यागा। तब तें सिव मन भयउ बिरागा ।।
जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा ॥ ४
दोहा
चिदानंद सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम।
बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम ॥ ७५ ॥
चौपाई
कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना ।।
जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित सुजाना ॥ १
एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती ।।
नेमु प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदयं भगति कै रेखा ॥ २
प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला ।।
बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा ।। ३
बहुबिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा ॥
अति पुनीत गिरिजा कै करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी ॥४