Topic 15 - Dialogue between the sages- Yagyavalkya and Bharadvaja and the greatness of Prayaga
दोहा
भावार्थ : मैं अब श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों को हृदयमें धारणकर और उनका प्रसाद पाकर दोनों श्रेष्ठ मुनियोंके मिलनका सुन्दर संवाद वर्णन करता हूँ ॥ ४३ (ख) ॥
चौपाई
भावार्थ : भरद्वाज मुनि प्रयागमें बसते हैं, उनका श्रीरामजी के चरणों में अत्यन्त प्रेम है। वे तपस्वी, निगृहीतचित्त, जितेन्द्रिय, दयाके निधान और परमार्थके मार्गमें बड़े ही चतुर हैं ॥ १ ॥
भावार्थ : माघ में जब सूर्य मकर राशि पर जाते हैं तब सब लोग तीर्थराज प्रयाग को आते हैं। देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्यों के समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करते हैं ॥ २ ॥
भावार्थ : श्रीवेणीमाधवजी के चरणकमलों को पूजते हैं और अक्षयवट का स्पर्शकर उनके शरीर पुलकित होते हैं। भरद्वाजजीका आश्रम बहुत ही पवित्र, परम रमणीय और श्रेष्ठ मुनियों के मन को भानेवाला है ॥ ३॥
भावार्थ : तीर्थराज प्रयागमें जो स्नान करने जाते हैं उन ऋषि-मुनियों का समाज वहाँ (भरद्वाजके आश्रम में) जुटता है। प्रातःकाल सब उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और फिर परस्पर भगवान् के गुणों की कथाएँ कहते हैं ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : ब्रह्म का निरूपण, धर्म का विधान और तत्त्वों के विभाग का वर्णन करते हैं तथा ज्ञान-वैराग्यसे युक्त भगवान् की भक्ति का कथन करते हैं ॥ ४४॥
चौपाई
भावार्थ : इसी प्रकार माघके महीने भर स्नान करते हैं और फिर सब अपने-अपने आश्रमों को चले जाते हैं। हर साल वहाँ इसी तरह बड़ा आनन्द होता है। मकरमें स्नान करके मुनिगण चले जाते हैं ॥ १ ॥
भावार्थ : एक बार पूरे मकरभर स्नान करके सब मुनीश्वर अपने-अपने आश्रमोंको लौट गये। परम ज्ञानी याज्ञवल्क्य मुनिको चरण पकड़कर भरद्वाजजीने रख लिया ॥ २॥
भावार्थ : आदरपूर्वक उनके चरणकमल धोये और बड़े ही पवित्र आसन पर उन्हें बैठाया। पूजा करके मुनि याज्ञवल्क्यजी के सुयश का वर्णन किया और फिर अत्यन्त पवित्र और कोमल वाणीसे बोले - ॥ ३॥
भावार्थ : हे नाथ! मेरे मन में एक बड़ा सन्देह है; वेदों का तत्त्व सब आपकी मुट्ठीमें है (अर्थात् आप ही वेदका तत्त्व जाननेवाले होनेके कारण मेरा सन्देह निवारण कर सकते हैं) पर उस सन्देहको कहते मुझे भय और लाज आती है [भय इसलिये कि कहीं आप यह न समझें कि मेरी परीक्षा ले रहा है, लाज इसलिये कि इतनी आयु बीत गयी, अबतक ज्ञान न हुआ और यदि नहीं कहता तो बड़ी हानि होती है [क्योंकि अज्ञानी बना रहता हूँ] ॥४॥
दोहा
भावार्थ : हे प्रभो! संतलोग ऐसी नीति कहते हैं और वेद, पुराण तथा मुनिजन भी यही बतलाते हैं कि गुरुके साथ छिपाव करनेसे हृदयमें निर्मल ज्ञान नहीं होता ॥ ४५ ॥
चौपाई
भावार्थ : यही सोचकर मैं अपना अज्ञान प्रकट करता हूँ। हे नाथ! सेवकपर कृपा करके इस अज्ञानका नाश कीजिये। संतों, पुराणों और उपनिषदों ने रामनाम के असीम प्रभाव का गान किया है॥ १ ॥
भावार्थ : कल्याणस्वरूप, ज्ञान और गुणोंकी राशि, अविनाशी भगवान् शम्भु निरन्तर रामनाम का जप करते रहते हैं। संसार में चार जाति के जीव हैं, काशीमें मरनेसे सभी परमपदको प्राप्त करते हैं ॥ २ ॥
भावार्थ : हे मुनिराज ! वह भी राम [नाम] की ही महिमा है, क्योंकि शिवजी महाराज दया करके [काशीमें मरनेवाले जीवको] रामनामका ही उपदेश करते हैं [इसीसे उनको परमपद मिलता है)। हे प्रभो! मैं आपसे पूछता हूँ कि वे राम कौन हैं? हे कृपानिधान! मुझे समझाकर कहिये ॥ ३॥
भावार्थ : एक राम तो अवधनरेश दशरथजी के कुमार हैं, उनका चरित्र सारा संसार जानता है। उन्होंने स्त्रीके विरहमें अपार दुःख उठाया और क्रोध आनेपर युद्धमें रावणको मार डाला ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : हे प्रभो! वही राम हैं या और कोई दूसरे हैं, जिनको शिवजी जपते हैं? आप सत्य के धाम हैं और सब कुछ जानते हैं, ज्ञान विचारकर कहिये ॥ ४६ ॥
चौपाई
भावार्थ : हे नाथ! जिस प्रकार से मेरा यह भारी भ्रम मिट जाय, आप वही कथा विस्तारपूर्वक कहिये। इसपर याज्ञवल्क्यजी मुसकराकर बोले, श्रीरघुनाथजीकी प्रभुताको तुम जानते हो ॥ १ ॥
भावार्थ : तुम मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके भक्त हो। तुम्हारी चतुराईको मैं जान गया। तुम श्रीरामजी के रहस्यमय गुणोंको सुनना चाहते हो; इसीसे तुमने ऐसा प्रश्न किया है मानो बड़े ही मूढ़ हो ॥ २ ॥
भावार्थ : हे तात ! तुम आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो; मैं श्रीरामजीकी सुन्दर कथा कहता हूँ। बड़ा भारी अज्ञान विशाल महिषासुर है और श्रीरामजीकी कथा [उसे नष्ट कर देनेवाली] भयंकर कालीजी हैं ॥ ३॥
Topic 16 - Sati’s bewilderment, Shri Ram’s divine glory and Sati’s remorse
चौपाई
भावार्थ : श्रीरामजी की कथा चन्द्रमा की किरणों के समान है, जिसे संतरूपी चकोर सदा पान करते हैं। ऐसा ही सन्देह पार्वतीजी ने किया था, तब महादेवजी ने विस्तारसे उसका उत्तर दिया था ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : अब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वहीं उमा और शिवजी का संवाद कहता हूँ। वह जिस समय और जिस हेतु से हुआ, उसे हे मुनि ! तुम सुनो, तुम्हारा विषाद मिट जायगा ॥ ४७ ॥
चौपाई
भावार्थ : एक बार त्रेतायुगमें शिवजी अगस्त्य ऋषि के पास गये। उनके साथ जगज्जननी भवानी सतीजी भी थीं। ऋषिने सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर जानकर उनका पूजन किया ॥ १॥
भावार्थ : मुनिवर अगस्त्यजी ने रामकथा विस्तार से कही, जिसको महेश्वर ने परम सुख मानकर सुना। फिर ऋषि ने शिवजी से सुन्दर हरिभक्ति पूछी और शिवजीने उनको अधिकारी पाकर [रहस्यसहित] भक्तिका निरूपण किया ॥ २ ॥
भावार्थ : श्रीरघुनाथजीके गुणोंकी कथाएँ कहते-सुनते कुछ दिनोंतक शिवजी वहाँ रहे। फिर मुनिसे विदा माँगकर शिवजी दक्षकुमारी सतीजीके साथ घर (कैलास) को चले ॥ ३॥
भावार्थ : उन्हीं दिनों पृथ्वीका भार उतारनेके लिये श्रीहरिने रघुवंशमें अवतार लिया था। वे अविनाशी भगवान् उस समय पिता के वचन से राज्यका त्याग करके तपस्वी या साधुवेशमें दण्डकवनमें विचर रहे थे ॥ ४। ॥
दोहा
भावार्थ : शिवजी हृदयमें विचारते जा रहे थे कि भगवान्के दर्शन मुझे किस प्रकार हों। प्रभुने गुप्तरूपसे अवतार लिया है, मेरे जानेसे सब लोग जान जायँगे ॥ ४८ (क) ॥
सोरठा
भावार्थ : श्रीशङ्करजी के हृदय में इस बात को लेकर बड़ी खलबली उत्पन्न हो गयी, परन्तु सतीजी इस भेद को नहीं जानती थीं। तुलसीदासजी कहते हैं कि शिवजी के मनमें [भेद खुलनेका डर था, परन्तु दर्शनके लोभसे उनके नेत्र ललचा रहे थे ॥ ४८ (ख) ॥
चौपाई
भावार्थ : रावणने [ब्रह्माजीसे] अपनी मृत्यु मनुष्यके हाथसे माँगी थी। ब्रह्माजीके वचनोंको प्रभु सत्य करना चाहते हैं। मैं जो पास नहीं जाता हूँ तो बड़ा पछतावा रह जायगा। इस प्रकार शिवजी विचार करते थे, परन्तु कोई भी युक्ति ठीक नहीं बैठती थी ॥ १॥
भावार्थ : इस प्रकार महादेवजी चिन्ताके वश हो गये। उसी समय नीच रावणने जाकर मारीचको साथ लिया और वह (मारीच) तुरंत कपटमृग बन गया ॥ २॥
भावार्थ : मूर्ख (रावण) ने छल करके सीताजी को हर लिया। उसे श्रीरामचन्द्रजी के वास्तविक प्रभाव का कुछ भी पता न था। मृगको मारकर भाई लक्ष्मणसहित श्रीहरि आश्रममें आये और उसे खाली देखकर (अर्थात् वहाँ सीताजीको न पाकर) उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये ॥ ३॥
भावार्थ : श्रीरघुनाथजी मनुष्यों की भाँति विरह से व्याकुल हैं और दोनों भाई वन में सीताको खोजते हुए फिर रहे हैं। जिनके कभी कोई संयोग-वियोग नहीं है, उनमें प्रत्यक्ष विरह का दुःख देखा गया ॥ ४॥
दोहा
भावार्थ : श्रीरघुनाथजीका चरित्र बड़ा ही विचित्र है, उसको पहुँचे हुए ज्ञानीजन ही जानते हैं। जो मन्दबुद्धि हैं, वे तो विशेषरूप से मोह के वश होकर हृदयमें कुछ दूसरी ही बात समझ बैठते हैं ॥ ४९॥
चौपाई
भावार्थ : श्रीशिवजी ने उसी अवसर पर श्रीरामजी को देखा और उनके हृदय में बहुत भारी आनन्द उत्पन्न हुआ। उन शोभा के समुद्र (श्रीरामचन्द्रजी) को शिवजी ने नेत्र भरकर देखा, परन्तु अवसर ठीक न जानकर परिचय नहीं किया ॥ १॥
भावार्थ : जगत् के पवित्र करनेवाले सच्चिदानन्द की जय हो, इस प्रकार कहकर कामदेवका नाश करनेवाले श्रीशिवजी चल पड़े। कृपानिधान शिवजी बार-बार आनन्दसे पुलकित होते हुए सतीजीके साथ चले जा रहे थे ॥ २॥
भावार्थ : सतीजी ने शङ्करजीकी वह दशा देखी तो उनके मनमें बड़ा सन्देह उत्पन्न हो गया। [वे मन-ही-मन कहने लगीं कि] शङ्करजीकी सारा जगत् वन्दना करता है, वे जगत्के ईश्वर हैं; देवता, मनुष्य, मुनि सब उनके प्रति सिर नवाते हैं ॥ ३॥
भावार्थ : उन्होंने एक राजपुत्रको सच्चिदानन्द परमधाम कहकर प्रणाम किया और उसकी शोभा देखकर वे इतने प्रेममग्न हो गये कि अबतक उनके हृदयमें प्रीति रोकनेसे भी नहीं रुकती ॥ ४॥
दोहा
भावार्थ : जो ब्रह्म सर्वव्यापक, मायारहित, अजन्मा, अगोचर, इच्छारहित और भेदरहित है, और जिसे वेद भी नहीं जानते, क्या वह देह धारण करके मनुष्य हो सकता है?॥५०॥
चौपाई
भावार्थ : देवताओंके हितके लिये मनुष्यशरीर धारण करनेवाले जो विष्णु भगवान् हैं, वे भी शिवजीकी ही भाँति सर्वज्ञ हैं। वे ज्ञानके भण्डार, लक्ष्मीपति और असुरोंके शत्रु भगवान् विष्णु क्या अज्ञानीकी तरह स्त्रीको खोजेंगे ? ॥ १ ॥
भावार्थ : फिर शिवजीके वचन भी झूठे नहीं हो सकते। सब कोई जानते हैं कि शिवजी सर्वज्ञ हैं। सतीके मनमें इस प्रकारका अपार सन्देह उठ खड़ा हुआ, किसी तरह भी उनके हृदयमें ज्ञानका प्रादुर्भाव नहीं होता था ॥ २ ॥
भावार्थ : यद्यपि भवानीजीने प्रकट कुछ नहीं कहा, पर अन्तर्यामी शिवजी सब जान गये। वे बोले-हे सती ! सुनो, तुम्हारा स्त्रीस्वभाव है। ऐसा सन्देह मनमें कभी न रखना चाहिये ॥ ३ ॥
भावार्थ : जिनकी कथाका अगस्त्य ऋषिने गान किया और जिनकी भक्ति मैंने मुनिको सुनायी, ये वही मेरे इष्टदेव श्रीरघुवीरजी हैं, जिनकी सेवा ज्ञानी मुनि सदा किया करते हैं ॥ ४॥
छंद
भावार्थ : ज्ञानी मुनि, योगी और सिद्ध निरन्तर निर्मल चित्तसे जिनका ध्यान करते हैं तथा वेद, पुराण और शास्त्र 'नेति-नेति' कहकर जिनकी कीर्ति गाते हैं, उन्हीं सर्वव्यापक, समस्त ब्रह्माण्डोंके स्वामी, मायापति, नित्य परम स्वतन्त्र ब्रह्मरूप भगवान् श्रीरामजीने अपने भक्तोंके हितके लिये [अपनी इच्छासे] रघुकुलके मणिरूप में अवतार लिया है।
सोरठा
भावार्थ : यद्यपि शिवजीने बहुत बार समझाया, फिर भी सतीजी के हृदय में उनका उपदेश नहीं बैठा। तब महादेवजी मनमें भगवान्की मायाका बल जानकर मुसकराते हुए बोले- ॥ ५१ ॥
चौपाई
भावार्थ : जो तुम्हारे मनमें बहुत सन्देह है तो तुम जाकर परीक्षा क्यों नहीं लेती ? जबतक तुम मेरे पास लौट आओगी तबतक मैं इसी बड़ की छाँह में बैठा हूँ ॥ १ ॥
भावार्थ : जिस प्रकार तुम्हारा यह अज्ञानजनित भारी भ्रम दूर हो, [भलीभाँति] विवेकके द्वारा सोच-समझकर तुम वही करना। शिवजीकी आज्ञा पाकर सती चलीं और मनमें सोचने लगीं कि भाई ! क्या करूँ (कैसे परीक्षा लूँ) ? ॥ २ ॥
भावार्थ : इधर शिवजीने मनमें ऐसा अनुमान किया कि दक्षकन्या सतीका कल्याण नहीं है। जब मेरे समझानेसे भी सन्देह दूर नहीं होता तब [मालूम होता है] विधाता ही उलटे हैं, अब सतीका कुशल नहीं है॥ ३ ॥
भावार्थ : जो कुछ रामने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे। [मनमें] ऐसा कहकर शिवजी भगवान् श्रीहरिका नाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गयीं जहाँ सुखके धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : सती बार-बार मनमें विचारकर सीताजीका रूप धारण करके उस मार्गकी ओर आगे होकर चलीं, जिससे [सतीजी के विचारानुसार] मनुष्योंके राजा रामचन्द्रजी आ रहे थे ॥ ५२ ॥
चौपाई
भावार्थ : सतीजीके बनावटी वेष को देखकर लक्ष्मणजी चकित हो गये और उनके हृदयमें बड़ा भ्रम हो गया। वे बहुत गम्भीर हो गये, कुछ कह नहीं सके। धीरबुद्धि लक्ष्मण प्रभु रघुनाथजी के प्रभाव को जानते थे ॥ १ ॥
भावार्थ : सब कुछ देखनेवाले और सबके हृदयकी जाननेवाले देवताओंके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी सतीके कपटको जान गये, जिनके स्मरणमात्रसे अज्ञानका नाश हो जाता है, वही सर्वज्ञ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी हैं ॥ २॥
भावार्थ : स्त्रीस्वभाव का असर तो देखो कि वहाँ (उन सर्वज्ञ भगवान् के सामने) भी सतीजी छिपाव करना चाहती हैं। अपनी मायाके बलको हृदय में बखानकर, श्रीरामचन्द्रजी हँसकर कोमल वाणीसे बोले ॥ ३ ॥
भावार्थ : पहले प्रभुने हाथ जोड़कर सतीको प्रणाम किया और पिता सहित अपना नाम बताया। फिर कहा कि वृषकेतु शिवजी कहाँ हैं? आप यहाँ वनमें अकेली किसलिये फिर रही हैं? ॥४॥
दोहा
भावार्थ : श्रीरामचन्द्रजीके कोमल और रहस्यभरे वचन सुनकर सतीजी को बड़ा संकोच हुआ। वे डरती हुई (चुपचाप) शिवजीके पास चलीं, उनके हृदयमें बड़ी चिन्ता हो गयी ॥ ५३ ॥
चौपाई
भावार्थ : कि मैंने शङ्करजी का कहना न माना और अपने अज्ञान का श्रीरामचन्द्रजीपर आरोप किया। अब जाकर मैं शिवजीको क्या उत्तर दूँगी? [यों सोचते-सोचते] सतीजी के हृदय में अत्यन्त भयानक जलन पैदा हो गयी ॥ १ ॥
भावार्थ : श्रीरामचन्द्रजी ने जान लिया कि सतीजी को दुःख हुआ; तब उन्होंने अपना कुछ प्रभाव प्रकट करके उन्हें दिखलाया। सतीजी ने मार्ग में जाते हुए यह कौतुक देखा कि श्रीरामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजीसहित आगे चले जा रहे हैं। [इस अवसरपर सीताजीको इसलिये दिखाया कि सतीजी श्रीराम के सच्चिदानन्दमय रूप को देखें, वियोग और दुःखकी कल्पना जो उन्हें हुई थी वह दूर हो जाय तथा वे प्रकृतिस्थ हों] ॥ २ ॥
भावार्थ : [तब उन्होंने] पीछे की ओर फिरकर देखा, तो वहाँ भी भाई लक्ष्मणजी और सीताजीके साथ श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर वेषमें दिखायी दिये। वे जिधर देखती हैं, उधर ही प्रभु श्रीरामचन्द्रजी विराजमान हैं और सुचतुर सिद्ध मुनीश्वर उनकी सेवा कर रहे हैं॥ ३॥
भावार्थ : सतीजीने अनेक शिव, ब्रह्मा और विष्णु देखे, जो एक से एक बढ़कर असीम प्रभाववाले थे। [उन्होंने देखा कि] भाँति-भाँतिके वेष धारण किये सभी देवता श्रीरामचन्द्रजीको चरणवन्दना और सेवा कर रहे हैं॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : उन्होंने अनगिनत अनुपम सती, ब्रह्माणी और लक्ष्मी देखीं। जिस-जिस रूपमें ब्रह्मा आदि देवता थे, उसीके अनुकूल रूपमें [उनकी] ये सब [शक्तियाँ] भी थीं ॥ ५४॥
चौपाई
भावार्थ : सतीजीने जहाँ-तहाँ जितने रघुनाथजी देखे, शक्तियोंसहित वहाँ उतने ही सारे देवताओंको भी देखा। संसारमें जो चराचर जीव हैं, वे भी अनेक प्रकारसे सब देखे ॥ १ ॥
भावार्थ :[उन्होंने देखा कि] अनेकों वेष धारण करके देवता प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की पूजा कर रहे हैं। परन्तु श्रीरामचन्द्रजी का दूसरा रूप कहीं नहीं देखा। सीतासहित श्रीरघुनाथजी बहुत-से देखे, परन्तु उनके वेष अनेक नहीं थे ॥ २ ॥
भावार्थ : [सब जगह] वही रघुनाथजी, वही लक्ष्मण और वही सीताजी- सती ऐसा देखकर बहुत ही डर गयीं। उनका हृदय काँपने लगा और देहकी सारी सुध-बुध जाती रही। वे आँख मूँदकर मार्गमें बैठ गयीं ॥ ३॥
भावार्थ : फिर आँख खोलकर देखा, तो वहाँ दक्षकुमारी (सतीजी) को कुछ भी न दीख पड़ा। तब वे बार-बार श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सिर नवाकर वहाँ चलीं जहाँ श्रीशिवजी थे ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : जब पास पहुंचीं, तब श्रीशिवजीने हँसकर कुशल प्रश्न करके कहा कि तुमने रामजीकी किस प्रकार परीक्षा ली, सारी बात सच-सच कहो ॥ ५५ ॥
मासपारायण, दूसरा विश्राम
Topic 17 - Disowning of Sati by Shiva and Shiva’s trance
चौपाई
भावार्थ : सतीजी ने श्रीरघुनाथजी के प्रभाव को समझकर डरके मारे शिवजी से छिपाव किया और कहा- हे स्वामिन् ! मैंने कुछ भी परीक्षा नहीं ली, [वहाँ जाकर] आपकी ही तरह प्रणाम किया ॥ १॥
भावार्थ : आपने जो कहा वह झूठ नहीं हो सकता, मेरे मन में यह बड़ा (पूरा) विश्वास है। तब शिवजी ने ध्यान करके देखा और सतीजीने जो चरित्र किया था, सब जान लिया ॥ २ ॥
भावार्थ : फिर श्रीरामचन्द्रजी की माया को सिर नवाया, जिसने प्रेरणा करके सती के मुँह से भी झूठ कहला दिया। सुजान शिवजी ने मन में विचार किया कि हरिकी इच्छारूपी भावी प्रबल है॥ ३॥
भावार्थ : सतीजी ने सीताजी का वेष धारण किया, यह जानकर शिवजी के हृदय में बड़ा विषाद हुआ। उन्होंने सोचा कि यदि मैं अब सतीसे प्रीति करता हूँ तो भक्तिमार्ग लुप्त हो जाता है और बड़ा अन्याय होता है ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : सती परम पवित्र हैं, इसलिये इन्हें छोड़ते भी नहीं बनता और प्रेम करने में बड़ा पाप है। प्रकट करके महादेवजी कुछ भी नहीं कहते, परन्तु उनके हृदय में बड़ा सन्ताप है॥ ५६ ॥
चौपाई
भावार्थ : तब शिवजी ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों में सिर नवाया और श्रीरामजीका स्मरण करते ही उनके मनमें यह आया कि सतीके इस शरीर से मेरी [पति-पत्नीरूपमें] भेंट नहीं हो सकती और शिवजीने अपने मनमें यह सङ्कल्प कर लिया ॥ १ ॥
भावार्थ : स्थिरबुद्धि शङ्करजी ऐसा विचारकर श्रीरघुनाथजी का स्मरण करते हुए अपने घर (कैलास) को चले। चलते समय सुन्दर आकाशवाणी हुई कि हे महेश! आपकी जय हो। आपने भक्ति की अच्छी दृढ़ता की ॥ २ ॥
भावार्थ : आपको छोड़कर दूसरा कौन ऐसी प्रतिज्ञा कर सकता है? आप श्रीरामचन्द्रजी के भक्त हैं, समर्थ हैं और भगवान् हैं। इस आकाशवाणीको सुनकर सतीजीके मनमें चिन्ता हुई और उन्होंने सकुचाते हुए शिवजीसे पूछा- ॥३॥
भावार्थ : हे कृपालु ! कहिये, आपने कौन-सी प्रतिज्ञा की है? हे प्रभो! आप सत्यके धाम और दीनदयालु हैं। यद्यपि सतीजीने बहुत प्रकारसे पूछा, परन्तु त्रिपुरारि शिवजीने कुछ न कहा ॥ ४॥
दोहा
भावार्थ : सतीजी ने हृदय में अनुमान किया कि सर्वज्ञ शिवजी सब जान गये। मैंने शिवजीसे कपट किया, स्त्री स्वभाव से ही मूर्ख और बेसमझ होती हैं ॥ ५७ (क) ॥
सोरठा
भावार्थ : प्रीति की सुन्दर रीति देखिये कि जल भी [दूधके साथ मिलकर] दूध के समान भाव बिकता है; परन्तु फिर कपटरूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है (दूध फट जाता है) और स्वाद [प्रेम] जाता रहता है॥ ५७ (ख) ॥
चौपाई
भावार्थ : अपनी करनी को याद करके सतीजी के हृदयमें इतना सोच है और इतनी अपार चिन्ता है कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। [उन्होंने समझ लिया कि] शिवजी कृपाके परम अथाह सागर हैं, इससे प्रकट में उन्होंने मेरा अपराध नहीं कहा ॥ १ ॥
भावार्थ : शिवजीका रुख देखकर सतीजीने जान लिया कि स्वामी ने मेरा त्याग कर दिया और वे हृदय में व्याकुल हो उठीं। अपना पाप समझकर कुछ कहते नहीं बनता, परन्तु हृदय [भीतर-ही-भीतर] कुम्हारके आँवेके समान अत्यन्त जलने लगा ॥ २ ॥
भावार्थ : वृषकेतु शिवजीने सतीको चिन्तायुक्त जानकर उन्हें सुख देनेके लिये सुन्दर कथाएँ कहीं। इस प्रकार मार्गमें विविध प्रकारके इतिहासोंको कहते हुए विश्वनाथ कैलास जा पहुँचे ॥ ३ ॥
भावार्थ : वहाँ फिर शिवजी अपनी प्रतिज्ञाको याद करके बड़के पेड़के नीचे पद्मासन लगाकर बैठ गये। शिवजी ने अपना स्वाभाविक रूप सँभाला। उनकी अखण्ड और अपार समाधि लग गयी ॥ ४॥
दोहा
भावार्थ : तब सतीजी कैलासपर रहने लगीं। उनके मनमें बड़ा दुःख था। इस रहस्यको कोई कुछ भी नहीं जानता था। उनका एक-एक दिन युगके समान बीत रहा था ॥ ५८॥
चौपाई
भावार्थ : सतीजीके हृदय में नित्य नया और भारी सोच हो रहा था कि मैं इस दुःख समुद्रके पार कब जाऊँगी। मैंने जो श्रीरघुनाथजीका अपमान किया और फिर पति के वचनों को झूठ जाना- ॥१॥
भावार्थ : उसका फल विधाता ने मुझको दिया, जो उचित था वह किया; परन्तु हे विधाता। अब तुझे यह उचित नहीं है जो शङ्करसे विमुख होनेपर भी मुझे जिला रहा है॥ २॥
भावार्थ : सतीजी के हृदय की ग्लानि कुछ कही नहीं जाती। बुद्धिमती सतीजी ने मनमें श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण किया और कहा- हे प्रभो! यदि आप दीनदयालु कहलाते हैं और वेदों ने आपका यह यश गाया है कि आप दुःखको हरनेवाले हैं, ॥ ३॥
भावार्थ : तो मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरी यह देह जल्दी छूट जाय। यदि मेरा शिवजी के चरणोंमें प्रेम है और मेरा यह [प्रेमका] व्रत मन, वचन और कर्म (आचरण) से सत्य है, ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : तो हे सर्वदर्शी प्रभो! सुनिये और शीघ्र वह उपाय कीजिये जिससे मेरा मरण हो और बिना ही परिश्रम यह [पति-परित्यागरूपी] असह्य विपत्ति दूर हो जाय ॥ ५९ ॥
चौपाई
भावार्थ : दक्षसुता सतीजी इस प्रकार बहुत दुःखित थीं, उनको इतना दारुण दुःख था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सत्तासी हजार वर्ष बीत जानेपर अविनाशी शिवजीने समाधि खोली ॥ १ ॥
भावार्थ : शिवजी रामनामका स्मरण करने लगे, तब सतीजीने जाना कि अब जगत्के स्वामी (शिवजी) जागे। उन्होंने जाकर शिवजीके चरणोंमें प्रणाम किया। शिवजीने उनको बैठनेके लिये सामने आसन दिया ॥ २ ॥
भावार्थ : शिवजी भगवान् हरिकी रसमयी कथाएँ कहने लगे। उसी समय दक्ष प्रजापति हुए। ब्रह्माजी ने सब प्रकार से योग्य देख-समझकर दक्ष को प्रजापतियों का नायक बना दिया ॥ ३॥
भावार्थ : जब दक्षने इतना बड़ा अधिकार पाया तब उनके हृदयमें अत्यन्त अभिमान आ गया। जगत्में ऐसा कोई नहीं पैदा हुआ जिसको प्रभुता पाकर मद न हो ॥ ४॥
Topic 18 - Sati’s visit to Daksha’s sacrifice
दोहा
भावार्थ : दक्षने सब मुनियोंको बुला लिया और वे बड़ा यज्ञ करने लगे। जो देवता यज्ञ का भाग पाते हैं, दक्षने उन सबको आदरसहित निमन्त्रित किया ॥ ६० ॥
चौपाई
भावार्थ : [दक्षका निमन्त्रण पाकर] किन्नर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व और सब देवता अपनी-अपनी स्त्रियों सहित चले। विष्णु, ब्रह्मा और महादेवजी को छोड़कर सभी देवता अपना-अपना विमान सजाकर चले ॥ १ ॥
भावार्थ : सतीजीने देखा अनेकों प्रकारके सुन्दर विमान आकाशमें चले जा रहे हैं। देवसुन्दरियाँ मधुर गान कर रही हैं, जिन्हें सुनकर मुनियोंका ध्यान छूट जाता है ॥ २ ॥
भावार्थ : सतीजीने [विमानोंमें देवताओंके जानेका कारण] पूछा, तब शिवजीने सब बातें बतलायीं। पिताके यज्ञकी बात सुनकर सती कुछ प्रसन्न हुईं और सोचने लगीं कि यदि महादेवजी मुझे आज्ञा दें, तो इसी बहाने कुछ दिन पिताके घर जाकर रहूँ ॥ ३॥
भावार्थ : क्योंकि उनके हृदयमें पतिद्वारा त्यागी जानेका बड़ा भारी दुःख था, पर अपना अपराध समझकर वे कुछ कहती न थीं। आखिर सतीजी भय, संकोच और प्रेमरस में सनी हुई मनोहर वाणीसे बोलीं- ॥४॥
दोहा
भावार्थ : हे प्रभो! मेरे पिता के घर बहुत बड़ा उत्सव है। यदि आपकी आज्ञा हो तो हे कृपाधाम ! मैं आदरसहित उसे देखने जाऊँ ॥ ६१ ॥
चौपाई
भावार्थ : शिवजीने कहा- तुमने बात तो अच्छी कही, यह मेरे मन को भी पसंद आयी। पर उन्होंने न्यौता नहीं भेजा, यह अनुचित है। दक्षने अपनी सब लड़कियों को बुलाया है; किन्तु हमारे वैर के कारण उन्होंने तुमको भी भुला दिया ॥ १॥
भावार्थ : एक बार ब्रह्मा की सभामें हमसे अप्रसन्न हो गये थे, उसीसे वे अब भी हमारा अपमान करते हैं। हे भवानी! जो तुम बिना बुलाये जाओगी तो न शील-स्नेह ही रहेगा और न मान-मर्यादा हो रहेगी ॥ २॥
भावार्थ : यद्यपि इसमें सन्देह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाये भी जाना चाहिये तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जानेसे कल्याण नहीं होता ॥ ३॥
भावार्थ : शिवजीने बहुत प्रकारसे समझाया, पर होनहारवश सतीके हृदयमें बोध नहीं हुआ। फिर शिवजीने कहा कि यदि बिना बुलाये जाओगी, तो हमारी समझ में अच्छी बात न होगी ॥ ४॥
दोहा
भावार्थ : शिवजीने बहुत प्रकारसे कहकर देख लिया, किन्तु जब सती किसी प्रकार भी नहीं रुकीं, तब त्रिपुरारि महादेवजीने अपने मुख्य गणोंको साथ देकर उनको विदा कर दिया ॥ ६२ ॥
चौपाई
भावार्थ : भवानी जब पिता (दक्ष) के घर पहुँचीं, तब दक्षके डरके मारे किसीने उनकी आवभगत नहीं की, केवल एक माता भले ही आदरसे मिली। बहिनें बहुत मुसकराती हुई मिलीं ॥ १॥
भावार्थ : दक्षने तो उनकी कुछ कुशलतक नहीं पूछी, सतीजी को देखकर उलटे उनके सारे अङ्ग जल उठे। तब सतीने जाकर यज्ञ देखा तो वहाँ कहीं शिवजीका भाग दिखायी नहीं दिया ॥ २ ॥
भावार्थ : तब शिवजीने जो कहा था वह उनकी समझमें आया। स्वामी का अपमान समझकर सती का हृदय जल उठा। पिछला (पतिपरित्यागका) दुःख उनके हृदयमें उतना नहीं व्यापा था, जितना महान् दुःख इस समय (पति-अपमानके कारण) हुआ ॥ ३ ॥
भावार्थ : यद्यपि जगत्में अनेक प्रकारके दारुण दुःख हैं, तथापि जाति-अपमान सबसे बढ़कर कठिन है। यह समझकर सतीजी को बड़ा क्रोध हो आया। माताने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया-बुझाया ॥ ४ ॥
Topic 19 : Sati’s self-immolation through the fire of Yoga out of indignation at the slight offered to Her Spouse by Her father , destruction of Daksha’s sacrifice
दोहा
भावार्थ : परन्तु उनसे शिवजीका अपमान सहा नहीं गया, इससे उनके हृदयमें कुछ भी प्रबोध नहीं हुआ। तब वे सारी सभाको हठपूर्वक डाँटकर क्रोधभरे वचन बोलीं- ॥ ६३ ॥
चौपाई
भावार्थ : हे सभासदो और सब मुनीश्वरो! सुनो। जिन लोगों ने यहाँ शिवजी की निन्दा की या सुनी है, उन सबको उसका फल तुरंत ही मिलेगा और मेरे पिता दक्ष भी भलीभाँति पछतायँगे ॥ १ ॥
भावार्थ : जहाँ संत, शिवजी और लक्ष्मीपति विष्णुभगवान् की निन्दा सुनी जाय वहाँ ऐसी मर्यादा है कि यदि अपना वश चले तो उस (निन्दा करनेवाले) की जीभ काट ले और नहीं तो कान मूंदकर वहाँ से भाग जाय ॥ २॥
भावार्थ : त्रिपुर दैत्यको मारनेवाले भगवान् महेश्वर सम्पूर्ण जगत्के आत्मा हैं, वे जगत्पिता और सबका हित करनेवाले हैं। मेरा मन्दबुद्धि पिता उनकी निन्दा करता है; और मेरा यह शरीर दक्षही के वीर्य से उत्पन्न है ॥ ३ ॥
भावार्थ : इसलिये चन्द्रमाको ललाटपर धारण करनेवाले वृषकेतु शिवजी को हृदयमें धारण करके मैं इस शरीरको तुरंत ही त्याग दूँगी। ऐसा कहकर सतीजीने योगाग्निमें अपना शरीर भस्म कर डाला। सारी यज्ञशालामें हाहाकार मच गया ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : सतीका मरण सुनकर शिवजीके गण यज्ञ विध्वंस करने लगे। यज्ञ विध्वंस होते देखकर मुनीश्वर भृगुजीने उसकी रक्षा की ॥ ६४ ॥
चौपाई
भावार्थ : ये सब समाचार शिवजीको मिले, तब उन्होंने क्रोध करके वीरभद्रको भेजा। उन्होंने वहाँ जाकर यज्ञ विध्वंस कर डाला और सब देवताओंको यथोचित फल (दण्ड) दिया ॥ १॥
भावार्थ : दक्ष को जगत्प्रसिद्ध वही गति हुई जो शिवद्रोही की हुआ करती है। यह इतिहास सारा संसार जानता है, इसलिये मैंने संक्षेपमें वर्णन किया ॥ २ ॥
Topic 20 : Descent of Goddess Parvati and Her penance
भावार्थ : सतीने मरते समय भगवान् हरिसे यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्ममें शिवजीके चरणोंमें अनुराग रहे। इसी कारण उन्होंने हिमाचल के घर जाकर पार्वती के शरीर से जन्म लिया ॥३॥
भावार्थ : जब से उमाजी हिमाचल के घर जन्मीं तबसे वहाँ सारी सिद्धियाँ और सम्पत्तियाँ छा गयीं। मुनियों ने जहाँ-तहाँ सुन्दर आश्रम बना लिये और हिमाचलने उनको उचित स्थान दिये ॥४॥
दोहा
भावार्थ : उस सुन्दर पर्वत पर बहुत प्रकार के सब नये-नये वृक्ष सदा पुष्प फलयुक्त हो गये और वहाँ बहुत तरह की मणियों की खानें प्रकट हो गयीं ॥ ६५ ॥
चौपाई
भावार्थ : सारी नदियों में पवित्र जल बहता है और पक्षी, पशु, भ्रमर सभी सुखी रहते हैं। सब जीवों ने अपना स्वाभाविक वैर छोड़ दिया और पर्वत पर सभी परस्पर प्रेम करते हैं ॥ १॥
भावार्थ : पार्वतीजीके घर आ जाने से पर्वत ऐसा शोभायमान हो रहा है जैसा रामभक्ति को पाकर भक्त शोभायमान होता है। उस (पर्वतराज) के घर नित्य नये-नये मङ्गलोत्सव होते हैं, जिसका ब्रह्मादि यश गाते हैं ॥ २ ॥
भावार्थ : जब नारदजीने ये सब समाचार सुने तो वे कौतुकही से हिमाचल के घर पधारे। पर्वतराज ने उनका बड़ा आदर किया और चरण धोकर उनको उत्तम आसन दिया ॥ ३॥
भावार्थ : फिर अपनी स्त्रीसहित मुनि के चरणों में सिर नवाया और उनके चरणोदक को सारे घर में छिड़काया। हिमाचल ने अपने सौभाग्य का बहुत बखान किया और पुत्रीको बुलाकर मुनि के चरणों पर डाल दिया ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : [और कहा] हे मुनिवर! आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, आपकी सर्वत्र पहुँच है। अतः आप हृदय में विचारकर कन्या के दोष-गुण कहिये ॥ ६६ ॥
चौपाई
भावार्थ : नारद मुनि ने हँसकर रहस्ययुक्त कोमल वाणीसे कहा- तुम्हारी कन्या सब गुणोंकी खान है। यह स्वभावसे ही सुन्दर, सुशील और समझदार है। उमा, अम्बिका और भवानी इसके नाम हैं ॥ १॥
भावार्थ : कन्या सब सुलक्षणों से सम्पन्न है, यह अपने पति को सदा प्यारी होगी। इसका सुहाग सदा अचल रहेगा और इससे इसके माता-पिता यश पावेंगे ॥ २ ॥
भावार्थ : यह सारे जगत् में पूज्य होगी और इसकी सेवा करने से कुछ भी दुर्लभ न होगा। संसारमें स्त्रियाँ इसका नाम स्मरण करके पतिव्रतरूपी तलवारकी धारपर चढ़ जायँगी ॥ ३॥
भावार्थ : हे पर्वतराज ! तुम्हारी कन्या सुलच्छनी है। अब इसमें जो दो-चार अवगुण हैं, उन्हें भी सुन लो। गुणहीन, मानहीन, माता-पिता-विहीन, उदासीन, संशयहीन (लापरवाह), ॥ ४॥
दोहा
भावार्थ : योगी, जटाधारी, निष्कामहृदय, नंगा और अमङ्गल वेषवाला, ऐसा पति इसको मिलेगा। इसके हाथ में ऐसी ही रेखा पड़ी है ॥ ६७ ॥
चौपाई
भावार्थ : नारद मुनिकी वाणी सुनकर और उसको हृदयमें सत्य जानकर पति-पत्नी (हिमवान् और मैना) को दुःख हुआ और पार्वतीजी प्रसन्न हुईं। नारदजीने भी इस रहस्यको नहीं जाना, क्योंकि सबकी बाहरी दशा एक-सी होनेपर भी भीतरी समझ भिन्न-भिन्न थी ॥ १ ॥
भावार्थ : सारी सखियाँ, पार्वती, पर्वतराज हिमवान् और मैना सभी के शरीर पुलकित थे और सभी के नेत्रों में जल भरा था। देवर्षिके वचन असत्य नहीं हो सकते, [यह विचारकर] पार्वतीने उन वचनोंको हृदयमें धारण कर लिया ॥ २॥
भावार्थ : उन्हें शिवजी के चरणकमलों में स्नेह उत्पन्न हो आया, परन्तु मन में यह सन्देह हुआ कि उनका मिलना कठिन है। अवसर ठीक न जानकर उमाने अपने प्रेमको छिपा लिया और फिर वे सखी की गोदमें जाकर बैठ गयीं ॥ ३ ॥
भावार्थ : देवर्षि की वाणी झूठी न होगी, यह विचारकर हिमवान्, मैना और सारी चतुर सखियाँ चिन्ता करने लगीं। फिर हृदयमें धीरज धरकर पर्वतराजने कहा- हे नाथ! कहिये, अब क्या उपाय किया जाय ? ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : मुनीश्वर ने कहा- हे हिमवान् ! सुनो, विधाता ने ललाट पर जो कुछ लिख दिया है, उसको देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि कोई भी नहीं मिटा सकते ॥ ६८ ॥
चौपाई
भावार्थ : तो भी एक उपाय मैं बताता हूँ। यदि दैव सहायता करें तो वह सिद्ध हो सकता है। उमा को वर तो निःसन्देह वैसा ही मिलेगा जैसा मैंने तुम्हारे सामने वर्णन किया है॥ १॥
भावार्थ : परन्तु मैंने वरके जो-जो दोष बतलाये हैं, मेरे अनुमानसे वे सभी शिवजीमें हैं। यदि शिवजीके साथ विवाह हो जाय तो दोषों को भी सब लोग गुणों के समान ही कहेंगे ॥२॥
भावार्थ : जैसे विष्णुभगवान् शेषनागकी शय्यापर सोते हैं, तो भी पण्डित लोग उनको कोई दोष नहीं लगाते। सूर्य और अग्निदेव अच्छे-बुरे सभी रसोंका भक्षण करते हैं, परन्तु उनको कोई बुरा नहीं कहता ॥ ३ ॥
भावार्थ : गङ्गाजी में शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कहता। सूर्य, अग्नि और गङ्गाजी की भाँति समर्थ को कुछ दोष नहीं लगता ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : यदि मूर्ख मनुष्य ज्ञान के अभिमानसे इस प्रकार होड़ करते हैं तो वे कल्पभरके लिये नरकमें पड़ते हैं। भला, कहीं जीव भी ईश्वरके समान (सर्वथा स्वतन्त्र) हो सकता है? ॥ ६९ ॥
चौपाई
भावार्थ : गङ्गाजल से भी बनायी हुई मदिरा को जानकर संत लोग कभी उसका पान नहीं करते। पर वही गङ्गाजी में मिल जानेपर जैसे पवित्र हो जाती है, ईश्वर और जीव में भी वैसा ही भेद है॥ १॥
भावार्थ : शिवजी सहज ही समर्थ हैं, क्योंकि वे भगवान् हैं। इसलिये इस विवाह में सब प्रकार कल्याण है। परन्तु महादेवजी की आराधना बड़ी कठिन है, फिर भी क्लेश (तप) करने से वे बहुत जल्द सन्तुष्ट हो जाते हैं॥ २ ॥
भावार्थ : यदि तुम्हारी कन्या तप करे, तो त्रिपुरारि महादेवजी होनहार को मिटा सकते हैं। यद्यपि संसार में वर अनेक हैं, पर इसके लिये शिवजी को छोड़कर दूसरा वर नहीं है॥ ३॥
भावार्थ : शिवजी वर देनेवाले, शरणागतों के दुःखों का नाश करनेवाले, कृपाके समुद्र और सेवकोंके मनको प्रसन्न करनेवाले हैं। शिवजीकी आराधना किये बिना करोड़ों योग और जप करनेपर भी वाञ्छित फल नहीं मिलता ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : ऐसा कहकर भगवान् का स्मरण करके नारदजी ने पार्वती को आशीर्वाद दिया। [और कहा कि] हे पर्वतराज ! तुम सन्देहका त्याग कर दो, अब यह कल्याण ही होगा ॥ ७० ॥
चौपाई
भावार्थ : यों कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोक को चले गये। अब आगे जो चरित्र हुआ उसे सुनो। पति को एकान्त में पाकर मैना ने कहा- हे नाथ! मैंने मुनिके वचनोंका अर्थ नहीं समझा ॥ १ ॥
भावार्थ : जो हमारी कन्याके अनुकूल घर, वर और कुल उत्तम हो तो विवाह कीजिये। नहीं तो लड़की चाहे कुमारी ही रहे (मैं अयोग्य वरके साथ उसका विवाह नहीं करना चाहती); क्योंकि हे स्वामिन् ! पार्वती मुझ को प्राणों के समान प्यारी है॥ २॥
भावार्थ : यदि पार्वती के योग्य वर न मिला तो सब लोग कहेंगे कि पर्वत स्वभाव से ही जड (मूर्ख) होते हैं। हे स्वामी। इस बात को विचारकर ही विवाह कीजियेगा, जिसमें फिर पीछे हृदय में सन्ताप न हो ॥ ३ ॥
भावार्थ : इस प्रकार कहकर मैना पतिके चरणोंपर मस्तक रखकर गिर पड़ीं। तब हिमवान्ने प्रेमसे कहा चाहे चन्द्रमामें अग्नि प्रकट हो जाय, पर नारदजीके वचन झूठे नहीं हो सकते ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : हे प्रिये! सब सोच छोड़कर श्रीभगवान् का स्मरण करो। जिन्होंने पार्वती को रचा है, वे ही कल्याण करेंगे ॥ ७१ ॥
चौपाई
भावार्थ : अब यदि तुम्हें कन्यापर प्रेम है तो जाकर उसे यह शिक्षा दो कि वह ऐसा तप करे जिससे शिवजी मिल जाय। दूसरे उपाय से यह क्लेश नहीं मिटेगा ॥ १॥
भावार्थ : नारदजी के वचन रहस्य से युक्त और सकारण हैं और शिवजी समस्त सुन्दर गुणों के भण्डार हैं। यह विचारकर तुम [मिथ्या] सन्देहको छोड़ दो। शिवजी सभी तरहसे निष्कलङ्क हैं॥ २॥
भावार्थ : पतिके वचन सुन मनमें प्रसन्न होकर मैना उठकर तुरंत पार्वतीके पास गयीं। पार्वतीको देखकर उनकी आँखोंमें आँसू भर आये। उसे स्नेहके साथ गोदमें बैठा लिया ॥ ३॥
भावार्थ : फिर बार-बार उसे हृदयसे लगाने लगीं। प्रेम से मैना का गला भर आया, कुछ कहा नहीं जाता। जगज्जननी भवानीजी तो सर्वज्ञ ठहरीं। [माताके मनकी दशाको जानकर वे माताको सुख देनेवाली कोमल वाणीसे बोलीं- ॥ ४॥
दोहा
भावार्थ : मा! सुन, मैं तुझे सुनाती हूँ; मैंने ऐसा स्वप्र देखा है कि मुझे एक सुन्दर गौरवर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मणने ऐसा उपदेश दिया है- ॥ ७२ ॥
चौपाई
भावार्थ : हे पार्वती! नारदजी ने जो कहा है, उसे सत्य समझकर तू जाकर तप कर। फिर यह बात तेरे माता-पिता को भी अच्छी लगी है। तप सुख देनेवाला और दुःख-दोषका नाश करनेवाला है॥ १॥
भावार्थ : तप के बल से ही ब्रह्मा संसारको रचते हैं और तप के बलसे ही विष्णु सारे जगत्का पालन करते हैं। तपके बलसे ही शम्भु [रुद्ररूप से जगत् का] संहार करते हैं और तपके बलसे ही शेषजी पृथ्वीका भार धारण करते हैं॥ २॥
भावार्थ : हे भवानी! सारी सृष्टि तप के ही आधारपर है। ऐसा जी में जानकर तू जाकर तप कर। यह बात सुनकर माता को बड़ा अचरज हुआ और उसने हिमवान् को बुलाकर वह स्वप्न सुनाया ॥ ३॥
भावार्थ : माता-पिता को बहुत तर हसे समझाकर बड़े हर्षके साथ पार्वतीजी तप करने के लिये चलीं। प्यारे कुटुम्बी, पिता और माता सव व्याकुल हो गये। किसी के मुँहसे बात नहीं निकलती ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : तब वेदशिरा मुनिने आकर सबको समझाकर कहा। पार्वतीजी की महिमा सुनकर सबको समाधान हो गया ॥ ७३ ॥
चौपाई
भावार्थ : प्राणपति (शिवजी) के चरणोंको हृदयमें धारण करके पार्वतीजी वनमें जाकर तप करने लगीं। पार्वतीजी का अत्यन्त सुकुमार शरीर तपके योग्य नहीं था, तो भी पतिके चरणों का स्मरण करके उन्होंने सब भोगोंको तज दिया ॥ १॥
भावार्थ : स्वामीके चरणोंमें नित्य नया अनुराग उत्पन्न होने लगा और तप में ऐसा मन लगा कि शरीरकी सारी सुध बिसर गयी। एक हजार वर्ष तक उन्होंने मूल और फल खाये, फिर सौ वर्ष साग खाकर बिताये ॥ २॥
भावार्थ : कुछ दिन जल और वायु का भोजन किया और फिर कुछ दिन कठोर उपवास किये। जो बेलपत्र सूखकर पृथ्वी पर गिरते थे, तीन हजार वर्षतक उन्हीं को खाया ॥ ३॥
भावार्थ : फिर सूखे पर्ण (पत्ते) भी छोड़ दिये, तभी पार्वतीका नाम 'अपर्णा' हुआ। तपसे उमाका शरीर क्षीण देखकर आकाशसे गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई ॥४॥
दोहा
भावार्थ : हे पर्वतराजकी कुमारी। सुन, तेरा मनोरथ सफल हुआ। तू अब सारे असह्य क्लेशोंको (कठिन तपको) त्याग दे। अब तुझे शिवजी मिलेंगे ॥ ७४ ॥
चौपाई
भावार्थ : हे भवानी! धीर, मुनि और ज्ञानी बहुत हुए हैं, पर ऐसा (कठोर) तप किसीने नहीं किया। अब तू इस श्रेष्ठ ब्रह्माकी वाणीको सदा सत्य और निरन्तर पवित्र जानकर अपने हृदयमें धारण कर ॥ १॥
भावार्थ : जब तेरे पिता बुलानेको आवें, तब हठ छोड़कर घर चली जाना और जब तुम्हें सप्तर्षि मिलें तब इस वाणीको ठीक समझना ॥ २ ॥
भावार्थ : [इस प्रकार ] आकाशसे कही हुई ब्रह्मा की वाणी को सुनते ही पार्वतीजी प्रसन्न हो गयीं और [हर्षके मारे] उनका शरीर पुलकित हो गया। [याज्ञवल्क्यजी भरद्वाजजी से बोले कि] मैंने पार्वतीका सुन्दर चरित्र सुनाया, अब शिवजीका सुहावना चरित्र सुनो ॥ ३ ॥
भावार्थ : जब से सती ने जाकर शरीरत्याग किया, तबसे शिवजीके मनमें वैराग्य हो गया। वे सदा श्रीरघुनाथजी का नाम जपने लगे और जहाँ-तहाँ श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी कथाएँ सुनने लगे ॥ ४ ॥
दोहा
भावार्थ : चिदानन्द, सुखके धाम, मोह, मद और काम से रहित शिवजी सम्पूर्ण लोकों को आनन्द देनेवाले भगवान् श्रीहरि (श्रीरामचन्द्रजी) को हृदयमें धारण कर (भगवान्के ध्यानमें मस्त हुए) पृथ्वीपर विचरने लगे ॥ ७५ ॥
चौपाई
भावार्थ : वे कहीं मुनियोंको ज्ञानका उपदेश करते और कहीं श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करते थे। यद्यपि सुजान शिवजी निष्काम हैं, तो भी वे भगवान् अपने भक्त (सती) के वियोग के दुःख से दुःखी हैं ॥ १ ॥
भावार्थ : इस प्रकार बहुत समय बीत गया। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें नित नयी प्रीति हो रही है। शिवजी के [कठोर] नियम, [अनन्य] प्रेम और उनके हृदयमें भक्तिकी अटल टेकको [जब श्रीरामचन्द्रजीने] देखा, ॥ २ ॥
भावार्थ : तब कृतज्ञ (उपकार माननेवाले), कृपालु, रूप और शीलके भण्डार, महान् तेजपुञ्ज भगवान् श्रीरामचन्द्रजी प्रकट हुए। उन्होंने बहुत तरहसे शिवजीकी सराहना की और कहा कि आपके बिना ऐसा (कठिन) व्रत कौन निबाह सकता है ॥ ३॥
भावार्थ : श्रीरामचन्द्रजीने बहुत प्रकारसे शिवजीको समझाया और पार्वतीजीका जन्म सुनाया। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने विस्तारपूर्वक पार्वतीजीकी अत्यन्त पवित्र करनीका वर्णन किया ॥ ४॥