Topic 21 - Shri Rama's intercession with Bhagawan Shiva for marriage
दोहा
अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु ।
जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु ॥ ७६ ॥
चौपाई
कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं ॥
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा ॥१
मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी ॥
तुम्ह सब भाँति परम हितकारी । अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी ॥२
प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना ॥
कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ ॥३
अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी ॥
तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए ।४
दोहा
पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु।
गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु ॥ ७७ ॥
चौपाई
रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी ॥
बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी ॥१
केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू ॥
कहत बचन मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई ।। २
मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा ॥
नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना ।।३
देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा ॥४
दोहा
सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह।
नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह ॥ ७८ ॥
चौपाई
दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई ॥
चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला ।।१
नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी ।।
मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा ॥२
तेहि कें बचन मानि बिस्वासा । तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा ।।
निर्गुन निलज कुबेस कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली ।।३
कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ ॥
पंच कहें सिवं सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही ॥४
दोहा
अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं।
सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं ॥ ७९ ॥
चौपाई
अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा ॥
अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला ॥१
दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी ॥
अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी ॥२
सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा ॥
कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई ॥३
नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ ॥
गुर के बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही ॥४
दोहा
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम ॥ ८० ॥
चौपाई
जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा ॥
अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा ॥ हे मुनीश्वरो !१
जौं तुम्हरे हठ हृदयं बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी ॥
तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं ॥२
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी ॥
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू ॥३
मैं पा परउँ कहइ जगदंबा । तुम्ह गृह गवनहुँ भयउ बिलंबा ।।
देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी ॥४
दोहा
तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु।
नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु ॥ ८१ ॥
चौपाई
जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए । करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए ।।
बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई ॥ १
भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा ॥
मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना ॥ २
तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला ॥
तेहिं सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते ॥३
अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई ॥
तब बिरंचि सन जाइ पुकारे । देखे बिधि सब देव दुखारे ॥ ४
दोहा
सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ।
संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ ॥ ८२ ॥
चौपाई
मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइही ईस्वर करिही सहाई ।।
सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा॥ १
तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी ॥
जदपि अहड़ असमंजस भारी । तदपि बात एक सुनहु हमारी ॥२
पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं॥
तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई ॥३
एहि बिधि भलेहिं देवहित होई । मत अति नीक कहइ सबु कोई ॥
अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू । प्रगटेड बिषमबान झषकेतू ॥ ४
Topic 22 - Kaamdev's departure on the errand of the gods and his being burnt to death
दोहा
सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार।
संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार ॥ ८३ ॥
चौपाई
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा । श्रुति कह परम धरम उपकारा ॥
पर हित लागि तजड़ जो देही । संतत संत प्रसंसहिं तेही ॥ १
अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई। सुमन धनुष कर सहित सहाई ॥
चलत मार अस हृदयं बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा ॥२
तब आपन प्रभाउ बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा ॥
कोपेउ जबहिं बारिचरकेतू । छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू ॥ ३
ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम सदाचार जप नाना। धीरज धरम ग्यान बिग्याना ।।
सदाचार जप जोग बिरागा। सभय बिबेक कटकु सबु भागा ॥ ४
छंद
भागेउ बिबेकु सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे।
सदग्रंथ पर्बत कंदरन्हि महुँ जाइ तेहि अवसर दुरे ॥
होनिहार का करतार को रखवार जग खरभरु परा।
दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुँ कोपि कर धनु सरु धरा ॥
दोहा
जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम।
ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम ॥ ८४॥
चौपाई
सब के हृदय मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा ॥
नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाईं। संगम करहिं तलाव तलाईं ।।१
जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी ॥
पसु पच्छी नभ जल थल चारी। भए काम बस समय बिसारी ॥२
मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका ।।
देव दनुज नर किंनर ब्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला ॥ ३
इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी। सदा काम के चेरे जानी ॥
सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस भए बियोगी ॥४
छंद
भए कामबस जोगीस तापस पावँरन्हि की को कहै।
देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे ॥
अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं ।
दुइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं ॥
सोरठा
धरी न काहूँ धीर सब के मन मनसिज हरे।।
जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ ॥ ८५ ॥
चौपाई
उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ ॥
सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू । भयउ जथाथिति सबु संसारू ॥१
भए तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गएँ मतवारे ॥
रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना ॥२
फिरत लाज कछु करि नहिं जाई। मरनु ठानि मन रचेसि उपाई ॥
प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित नव तरु राजि बिराजा ॥३
बन उपबन बापिका तड़ागा। परम सुभग सब दिसा बिभागा ॥
जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा ॥४
छंद
जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही।
सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही ॥
बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा।
कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा ॥
दोहा
सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत ।
चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत ॥ ८६ ॥
चौपाई
देखि रसाल बिटप बर साखा । तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा ।।
सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने ।।१
छाड़े बिषम बिसिख उर लागे। छूटि समाधि संभु तब जागे ॥
भयउ ईस मन छोभु बिसेषी। नयन उघारि सकल दिसि देखी ॥२
सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका ॥
तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवत कामु भयउ जरि छारा ॥३
हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर सुखारी ॥
समुझि कामसुख सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी ॥४
छंद
जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई।
रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई ॥
अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही।
प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही ॥५
Topic 23 - Shiva's boon to Rati
(Kaamdev's wife)
दोहा
अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु।
बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु ॥ ८७ ॥
चौपाई
जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा ॥
कृष्न तनय होइहि पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न मोरा ॥ १
रति गवनी सुनि संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी ॥
देवन्ह समाचार सब पाए । ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए । २
सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता। गए जहाँ सिव कृपानिकेता ॥
पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा । भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा ॥३
बोले कृपासिंधु बृषकेतू । कहहु अमर आए केहि हेतू ॥
कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी। तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी ॥ ४
Topic 24 : The god's prayer to Shiva for marriage; the seven sages visit to Parvati
दोहा
सकल सुरन्ह के हृदय अस संकर परम उछाहु।
निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु ॥ ८८ ॥
चौपाई
यह उत्सव देखिअ भरि लोचन । सोइ कछु करहु मदन मद मोचन ॥
कामु जारि रति कहुँ बरु दीन्हा। कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा ॥ १
सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ ॥
पारबतीं तपु कीन्ह अपारा। करहु तासु अब अंगीकारा । २
सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेड़ होउ कहा सुखु मानी ॥
तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि सुमन जय जय सुर साईं ॥ ३
अवसरु जानि सप्तरिषि आए। तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए ।
प्रथम गए जहँ रहीं भवानी। बोले मधुर बचन छल सानी ॥ ४
दोहा
कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस।
अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस ॥ ८९॥
मासपारायण, तीसरा विश्राम
चौपाई
सुनि बोलीं मुसुकाइ भवानी । उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी ॥
तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा ॥१
हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी ॥
जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म मन बानी ।। २
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा ॥
तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा। सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा ।। ३
तात अनल कर सहज सुभाऊ । हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ ॥
गएँ समीप सो अवसि नसाई। असि मन्मथ महेस की नाई ॥४
दोहा
हिय हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास।
चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास ॥ ९० ॥
चौपाई
सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा। मदन दहन सुनि अति दुखु पावा ॥
बहुरि कहेउ रति कर बरदाना। सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना ॥१
हृदय बिचारि संभु प्रभुताई। सादर मुनिबर लिए बोलाई ॥
सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई। बेगि बेदबिधि लगन धराई ॥२
पत्री सप्तरिषिन्ह सोइ दीन्ही। गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही ॥
जाइ बिधिहि तिन्ह दीन्हि सो पाती। बाचत प्रीति न हृदयँ समाती ॥३
लगन बाचि अज सबहि सुनाई। हरषे मुनि सब सुर समुदाई ॥
सुमन वृष्टि नभ बाजन बाजे । मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे ॥ ४
Topic 25 : Shiva's peculiar marriage procession
and preparations for the wedding
दोहा
लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान ।
होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान ॥ ९१ ॥
चौपाई
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा ॥
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला । तन बिभति पट केहरि छाला ॥ १
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा ॥
गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला ॥ २
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा ।।
देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं ॥३
बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता । चढ़ि चढ़ि बाहन चले बराता ॥
सुर समाज सब भाँति अनूपा। नहिं बरात दूलह अनुरूपा ।। ४
दोहा
बिष्नु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज ।
बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित समाज ॥ ९२ ॥
चौपाई
बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई ॥
बिष्नु बचन सुनि सुर मुसुकाने । निज निज सेन सहित बिलगाने ।।१
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं । हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं ॥
अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे ॥ २
सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए ॥
नाना बाहन नाना बेषा । बिहसे सिव समाज निज देखा ॥३
कोउ मुख हीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू॥
बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना ॥४
छंद
तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।
भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें ॥
खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै।
बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै ॥
सोरठा
नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब ।
देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि ॥ ९३॥
चौपाई
जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता ॥
इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना ॥१
सैल सकल जहँ लगि जग माहीं। लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं ॥
बन सागर सब नदीं तलावा। हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा ॥२
कामरूप सुंदर तन धारी । सहित समाज सहित बर नारी ॥
गए सकल तुहिनाचल गेहा। गावहिं मंगल सहित सनेहा ।।३
प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए। जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए ॥
पुर सोभा अवलोकि सुहाई। लागइ लघु बिरंचि निपुनाई ।।४
छंद
लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही।
बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही ॥
मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं।
बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं ॥
दोहा
जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ।
रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ ॥९४॥
चौपाई
नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा अधिकाई ।।
करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना ।।१
हिय हरषे सुर सेन निहारी। हरिहि देखि अति भए सुखारी ॥
सिव समाज जब देखन लागे। बिडरि चले बाहन सब भागे ॥२
धरि धीरजु तहँ रहे सयाने। बालक सब लै जीव पराने ॥
गएँ भवन पूछहिं पितु माता। कहहिं बचन भय कंपित गाता ॥३
कहिअ काह कहि जाइ न बाता। जम कर धार किधौं बरिआता ॥
बरु बौराह बसहँ असवारा। ब्याल कपाल बिभूषन छारा ॥ ४
छंद
तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा।
सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा ॥
जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही।
देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही ॥
दोहा
समुझि महेस समाज सब जननि जनक मुसुकाहिं ।
बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु डरु नाहिं ॥ ९५ ॥
चौपाई
लै अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए ॥
मैनाँ सुभ आरती सँवारी। संग सुमंगल गावहिं नारी ॥१
कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी ॥
बिकट बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा ॥२
भागि भवन पैठीं अति त्रासा। गए महेसु जहाँ जनवासा ॥
मैना हृदयं भयउ दुखु भारी। लीन्ही बोलि गिरीसकुमारी ।।३
अधिक सनेहँ गोद बैठारी। स्याम सरोज नयन भरे बारी ॥
जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा। तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा ॥४
छंद
कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।
जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई ॥
"तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।
घरु जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हाँ करौं ॥
दोहा
भईं बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि।
करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि ॥ ९६ ॥
चौपाई
नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा ॥
अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लागि तपु कीन्हा ॥१
साचेहुँ उन्ह कें मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया ॥
पर घर घालक लाज न भीरा। बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा ॥२
जननिहि बिकल बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी ॥
अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरड़ जो रचइ बिधाता ॥ ३
करम लिखा जौं बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू ॥
तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका ॥४
छंद
जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं।
दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं ॥
सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं।
बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं ॥
दोहा
तेहि अवसर नारद सहित अरु रिषि सप्त समेत ।
समाचार सुनि तुहिनगिरि गवने तुरत निकेत ॥ ९७ ॥
चौपाई
तब नारद सबही समुझावा। पूरुब कथाप्रसंगु सुनावा ॥
मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता भवानी ॥१
अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि । सदा संभु अरधंग निवासिनि ॥
जग संभव पालन लय कारिनि। निज इच्छा लीला बपु धारिनि ॥२
जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई। नामु सती सुंदर तनु पाई ॥
तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं। कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं ॥३
एक बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा ॥
भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा ॥४
छंद
सिय बेषु सतीं जो कीन्ह तेहिं अपराध संकर परिहरीं।
हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं ॥
अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया।
अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकरप्रिया ॥
दोहा
सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद।
छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह संबाद ॥ ९८ ॥
चौपाई
तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे ॥
नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने । नगर लोग सब अति हरषाने ॥१
लगे होन पुर मंगल गाना । सजे सबहिं हाटक घट नाना ॥
भाँति अनेक भई जेवनारा। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा ।। २
सो जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी ॥
सादर बोले सकल बराती । बिष्नु बिरंचि देव सब जाती ।।३
बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परुसन निपुन सुआरा ॥
नारिबूंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी ॥ ४
छंद
गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं।
भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं ॥
जेवँत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कहह्यो।
अचवाँइ दीन्हें पान गवने बास जहँ जाको रहयो ॥ ॥
दोहा
बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ।
समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ ॥ ९९ ॥
चौपाई
बोलि सकल सुर सादर लीन्हे । सबहि जथोचित आसन दीन्हे ॥
बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभग सुमंगल गावहिं नारी ॥१
सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा ॥
बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयं सुमिरि निज प्रभु रघुराई ॥२
बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाईं। करि सिंगारु सखीं लै आईं।
देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है।३
जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा ॥
सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी ॥४
छंद
कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा।
सकुचहिं कहत श्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा ॥
छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ।
अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ ॥
Topic 26 : Shiva's Nuptials
दोहा
मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि ।
कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि ॥ १०० ॥
चौपाई
जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई ॥
गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी ॥१
पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हिय हरषे तब सकल सुरेसा ॥
बेदमंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं ॥ २
बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना ॥
हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू । सकल भुवन भरि रहा उछाहू ॥३
दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा ।।
अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना ॥४
छंद
दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो।
का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो ।
सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो।
पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो ॥
दोहा
नाथ उमा मम प्रान सम गृहकिंकरी करेहु ।
छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु ॥ १०१
चौपाई
बहु बिधि संभु सासु समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई ।।
जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही ॥ १
करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा ॥
बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी ॥ २
कत बिधि सृर्जी नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं ।।
भै अति प्रेम बिकल महतारी । धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी ॥३
पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेमु कछु जाइ न बरना ॥
सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी ॥४
छंद
जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दई।
फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गईं ॥
जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले।
सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले ॥
दोहा
चले संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु ।
बिबिध भाँति परितोषु करि बिदा कीन्ह बृषकेतु ॥ १०२ ॥
चौपाई
तुरत भवन आए गिरिराई । सकल सैल सर लिए बोलाई ॥
आदर दान बिनय बहुमाना । सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना।१
जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए ॥
जगत मातु पितु संभु भवानी। तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी ॥२
करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा ॥
हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ ॥३
तब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुरु समर जेहिं मारा ॥
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना । षन्मुख जन्मु सकल जग जाना ॥४
छंद
जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा।
तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा ॥
यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं।
कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं ॥
दोहा
चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु।
बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु ॥ १०३ ॥
चौपाई
संभु चरित सुनि सरस सुहावा । भरद्वाज मुनि अति सुखु पावा ॥
बहु लालसा कथा पर बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी ॥१
प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी ।।
अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा । तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा ॥२
सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं ।।
बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू ॥३
सिव सम को रघुपति व्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी ॥
पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई ॥४
दोहा
प्रथमहिं मैं कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार।
सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार ॥ १०४ ॥
चौपाई
मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला ॥
सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें ॥१
राम चरित अति अमित मुनीसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा ॥
तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी ॥ २
सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी ॥
जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी ॥३
प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा ॥
परम रम्य गिरिबरु कैलासू । सदा जहाँ सिव उमा निवासू ॥४
दोहा
सिद्ध तपोधन जोगिजन सुर किंनर मुनिबूंद ।
बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिव सुखकंद ॥ १०५ ॥
चौपाई
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं ॥
तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला ॥ १
त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया ॥
एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ ।।२
निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठे सहजहिं संभु कृपाला ।।
कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा ॥ ३
तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना ।।
भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी ।।४