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दोहा

 

अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु । 

जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु ॥ ७६ ॥

​

चौपाई

 

कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं ॥ 

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा ॥१

​

मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी ॥ 

तुम्ह सब भाँति परम हितकारी । अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी ॥२ 

​

प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना ॥

कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ ॥३ 

​

अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी ॥

तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए ।४ 

​

दोहा 

 

पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु। 

गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु ॥ ७७ ॥

​

चौपाई 

​

रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी ॥ 

बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी ॥१ 

​

केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू ॥ 

कहत बचन मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई ।। २ 

​

मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा ॥ 

नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना ।।३ 

​

देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा ॥४ 

​

दोहा

 

सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह।

नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह ॥ ७८ ॥

​

चौपाई 

 

दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई ॥ 

चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला ।।१ 

​

नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी ।। 

मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा ॥२ 

​

तेहि कें बचन मानि बिस्वासा । तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा ।।

निर्गुन निलज कुबेस कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली ।।३ 

​

कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ ॥ 

पंच कहें सिवं सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही ॥४ 

​

दोहा

 

अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं। 

सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं ॥ ७९ ॥

​

चौपाई

 

अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा ॥ 

अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला ॥१ 

​

दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी ॥ 

अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी ॥२ 

​

सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा ॥ 

कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई ॥३ 

​

नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ ॥ 

गुर के बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही ॥४ 

​

दोहा 

 

 महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।

जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम ॥ ८० ॥

​

चौपाई

 

जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा ॥

अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा ॥ हे मुनीश्वरो !१ 

​

जौं तुम्हरे हठ हृदयं बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी ॥ 

तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं ॥२ 

​

जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी ॥ 

तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू ॥३ 

​

मैं पा परउँ कहइ जगदंबा । तुम्ह गृह गवनहुँ भयउ बिलंबा ।। 

देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी ॥४ 

​

दोहा  

 

तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु।

नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु ॥ ८१ ॥

​

चौपाई

 

जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए । करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए ।।

बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई ॥ १ 

​

भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा ॥

मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना ॥ २ 

​

तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला ॥ 

तेहिं सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते ॥३ 

​

अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई ॥

तब बिरंचि सन जाइ पुकारे । देखे बिधि सब देव दुखारे ॥ ४ 

​

दोहा 

 

सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ।

संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ ॥ ८२ ॥

​

चौपाई 

 

मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइही ईस्वर करिही सहाई ।।

सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा॥ १ 

​

तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी ॥ 

जदपि अहड़ असमंजस भारी । तदपि बात एक सुनहु हमारी ॥२ 

​

पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं॥ 

तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई ॥३ 

​

एहि बिधि भलेहिं देवहित होई । मत अति नीक कहइ सबु कोई ॥ 

अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू । प्रगटेड बिषमबान झषकेतू ॥ ४ 

​

दोहा 

 

सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार।

संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार ॥ ८३ ॥

​

चौपाई 

 

तदपि करब मैं काजु तुम्हारा । श्रुति कह परम धरम उपकारा ॥

पर हित लागि तजड़ जो देही । संतत संत प्रसंसहिं तेही ॥ १ 

​

अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई। सुमन धनुष कर सहित सहाई ॥

चलत मार अस हृदयं बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा ॥२ 

​

तब आपन प्रभाउ बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा ॥ 

कोपेउ जबहिं बारिचरकेतू । छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू ॥ ३ 

​

ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम सदाचार जप नाना। धीरज धरम ग्यान बिग्याना ।। 

सदाचार जप जोग बिरागा। सभय बिबेक कटकु सबु भागा ॥ ४ 

​

छंद

 

भागेउ बिबेकु सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे। 

सदग्रंथ पर्बत कंदरन्हि महुँ जाइ तेहि अवसर दुरे ॥ 

होनिहार का करतार को रखवार जग खरभरु परा। 

दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुँ कोपि कर धनु सरु धरा ॥

​

दोहा

 

जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम।

ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम ॥ ८४॥ 

​

चौपाई

 

सब के हृदय मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा ॥ 

नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाईं। संगम करहिं तलाव तलाईं ।।१ 

​

जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी ॥ 

पसु पच्छी नभ जल थल चारी। भए काम बस समय बिसारी ॥२ 

​

मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका ।। 

देव दनुज नर किंनर ब्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला ॥ ३ 

​

इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी। सदा काम के चेरे जानी ॥ 

सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस भए बियोगी ॥४ 

​

छंद 

 

भए कामबस जोगीस तापस पावँरन्हि की को कहै। 

देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे ॥ 

अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं । 

दुइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं ॥ 

​

सोरठा

 

धरी न काहूँ धीर सब के मन मनसिज हरे।।

जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ ॥ ८५ ॥

​

चौपाई 

 

उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ ॥ 

सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू । भयउ जथाथिति सबु संसारू ॥१ 

​

भए तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गएँ मतवारे ॥ 

रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना ॥२ 

​

फिरत लाज कछु करि नहिं जाई। मरनु ठानि मन रचेसि उपाई ॥ 

प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित नव तरु राजि बिराजा ॥३ 

​

बन उपबन बापिका तड़ागा। परम सुभग सब दिसा बिभागा ॥

जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा ॥४ 

​

छंद 

 

जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही। 

सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही ॥ 

बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा। 

कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा ॥

​

दोहा

 

सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत ।

चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत ॥ ८६ ॥

​

चौपाई 

 

देखि रसाल बिटप बर साखा । तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा ।। 

 सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने ।।१ 

​

छाड़े बिषम बिसिख उर लागे। छूटि समाधि संभु तब जागे ॥

भयउ ईस मन छोभु बिसेषी। नयन उघारि सकल दिसि देखी ॥२ 

​

सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका ॥

तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवत कामु भयउ जरि छारा ॥३ 

​

हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर सुखारी ॥

समुझि कामसुख सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी ॥४ 

​

छंद

 

जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई। 

रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई ॥

अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही। 

प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही ॥५

​

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Topic 23 - Shiva's boon to Rati
(Kaamdev's wife)

दोहा

 

अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु। 

बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु ॥ ८७ ॥

​

चौपाई

 

जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा ॥

कृष्न तनय होइहि पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न मोरा ॥ १ 

​

रति गवनी सुनि संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी ॥

देवन्ह समाचार सब पाए । ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए । २ 

​

सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता। गए जहाँ सिव कृपानिकेता ॥ 

पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा । भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा ॥३ 

​

बोले कृपासिंधु बृषकेतू । कहहु अमर आए केहि हेतू ॥

कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी। तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी ॥ ४ 

दोहा 

 

सकल सुरन्ह के हृदय अस संकर परम उछाहु। 

निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु ॥ ८८ ॥

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चौपाई 

 

यह उत्सव देखिअ भरि लोचन । सोइ कछु करहु मदन मद मोचन ॥ 

कामु जारि रति कहुँ बरु दीन्हा। कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा ॥ १ 

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सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ ॥ 

पारबतीं तपु कीन्ह अपारा। करहु तासु अब अंगीकारा । २ 

​

सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेड़ होउ कहा सुखु मानी ॥ 

तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि सुमन जय जय सुर साईं ॥ ३ 

​

अवसरु जानि सप्तरिषि आए। तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए । 

प्रथम गए जहँ रहीं भवानी। बोले मधुर बचन छल सानी ॥ ४ 

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दोहा

 

कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस।

अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस ॥ ८९॥

​

मासपारायण, तीसरा विश्राम

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चौपाई 

 

सुनि बोलीं मुसुकाइ भवानी । उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी ॥ 

तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा ॥१ 

​

हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी ॥ 

 जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म मन बानी ।। २ 

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तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा ॥ 

तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा। सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा ।। ३ 

​

तात अनल कर सहज सुभाऊ । हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ ॥ 

गएँ समीप सो अवसि नसाई। असि मन्मथ महेस की नाई ॥४ 

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दोहा  

 

हिय हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास। 

चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास ॥ ९० ॥

​

चौपाई 

 

सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा। मदन दहन सुनि अति दुखु पावा ॥ 

बहुरि कहेउ रति कर बरदाना। सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना ॥१ 

​

हृदय बिचारि संभु प्रभुताई। सादर मुनिबर लिए बोलाई ॥ 

सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई। बेगि बेदबिधि लगन धराई ॥२ 

​

पत्री सप्तरिषिन्ह सोइ दीन्ही। गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही ॥ 

जाइ बिधिहि तिन्ह दीन्हि सो पाती। बाचत प्रीति न हृदयँ समाती ॥३ 

​

लगन बाचि अज सबहि सुनाई। हरषे मुनि सब सुर समुदाई ॥ 

सुमन वृष्टि नभ बाजन बाजे । मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे ॥ ४ 

दोहा

​

लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान । 

होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान ॥ ९१ ॥

​

चौपाई 

 

सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा ॥ 

कुंडल कंकन पहिरे ब्याला । तन बिभति पट केहरि छाला ॥ १ 

​

ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा ॥ 

गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला ॥ २

​

कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा ।। 

देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं ॥३ 

​

बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता । चढ़ि चढ़ि बाहन चले बराता ॥ 

सुर समाज सब भाँति अनूपा। नहिं बरात दूलह अनुरूपा ।। ४ 

​

दोहा

 

बिष्नु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज । 

बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित समाज ॥ ९२ ॥

​

चौपाई 

 

बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई ॥ 

बिष्नु बचन सुनि सुर मुसुकाने । निज निज सेन सहित बिलगाने ।।१ 

​

मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं । हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं ॥

अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे ॥ २ 

​

सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए ॥ 

नाना बाहन नाना बेषा । बिहसे सिव समाज निज देखा ॥३ 

​

कोउ मुख हीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू॥ 

बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना ॥४ 

​

छंद

 

तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें। 

भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें ॥ 

खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै। 

बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै ॥

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सोरठा

 

नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब ।

देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि ॥ ९३॥

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चौपाई 

 

जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता ॥ 

इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना ॥१ 

​

सैल सकल जहँ लगि जग माहीं। लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं ॥ 

बन सागर सब नदीं तलावा। हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा ॥२

​

कामरूप सुंदर तन धारी । सहित समाज सहित बर नारी ॥ 

गए सकल तुहिनाचल गेहा। गावहिं मंगल सहित सनेहा ।।३ 

​

प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए। जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए ॥ 

पुर सोभा अवलोकि सुहाई। लागइ लघु बिरंचि निपुनाई ।।४

​

छंद

 

लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही। 

बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही ॥ 

मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं। 

बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं ॥

​

दोहा

 

जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ। 

रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ ॥९४॥

​

चौपाई 

 

नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा अधिकाई ।। 

करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना ।।१ 

​

हिय हरषे सुर सेन निहारी। हरिहि देखि अति भए सुखारी ॥ 

सिव समाज जब देखन लागे। बिडरि चले बाहन सब भागे ॥२ 

​

धरि धीरजु तहँ रहे सयाने। बालक सब लै जीव पराने ॥ 

गएँ भवन पूछहिं पितु माता। कहहिं बचन भय कंपित गाता ॥३ 

​

कहिअ काह कहि जाइ न बाता। जम कर धार किधौं बरिआता ॥ 

बरु बौराह बसहँ असवारा। ब्याल कपाल बिभूषन छारा ॥ ४ 

​

छंद

 

तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा। 

सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा ॥

जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही। 

देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही ॥

​

दोहा 

 

समुझि महेस समाज सब जननि जनक मुसुकाहिं । 

बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु डरु नाहिं ॥ ९५ ॥

​

चौपाई 

 

लै अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए ॥ 

मैनाँ सुभ आरती सँवारी। संग सुमंगल गावहिं नारी ॥१ 

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कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी ॥ 

बिकट बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा ॥२ 

​

भागि भवन पैठीं अति त्रासा। गए महेसु जहाँ जनवासा ॥ 

मैना हृदयं भयउ दुखु भारी। लीन्ही बोलि गिरीसकुमारी ।।३ 

​

अधिक सनेहँ गोद बैठारी। स्याम सरोज नयन भरे बारी ॥ 

जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा। तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा ॥४ 

​

छंद

 

कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।

जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई ॥ 

"तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।

घरु जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हाँ करौं ॥

​

दोहा

 

भईं बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि। 

करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि ॥ ९६ ॥

​

चौपाई 

 

नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा ॥ 

अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लागि तपु कीन्हा ॥१ 

​

साचेहुँ उन्ह कें मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया ॥ 

पर घर घालक लाज न भीरा। बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा ॥२ 

​

जननिहि बिकल बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी ॥ 

अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरड़ जो रचइ बिधाता ॥ ३

​

करम लिखा जौं बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू ॥ 

तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका ॥४ 

​

छंद

 

जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं।

दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं ॥ 

सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं।

बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं ॥

​

दोहा 

 

तेहि अवसर नारद सहित अरु रिषि सप्त समेत ।

समाचार सुनि तुहिनगिरि गवने तुरत निकेत ॥ ९७ ॥

​

चौपाई 

 

तब नारद सबही समुझावा। पूरुब कथाप्रसंगु सुनावा ॥

मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता भवानी ॥१ 

​

अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि । सदा संभु अरधंग निवासिनि ॥ 

जग संभव पालन लय कारिनि। निज इच्छा लीला बपु धारिनि ॥२ 

​

जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई। नामु सती सुंदर तनु पाई ॥ 

तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं। कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं ॥३ 

​

एक बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा ॥ 

भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा ॥४ 

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छंद

 

सिय बेषु सतीं जो कीन्ह तेहिं अपराध संकर परिहरीं।

हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं ॥ 

अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया।

अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकरप्रिया ॥

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दोहा

 

सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद।

छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह संबाद ॥ ९८ ॥

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चौपाई

 

तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे ॥ 

नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने । नगर लोग सब अति हरषाने ॥१ 

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लगे होन पुर मंगल गाना । सजे सबहिं हाटक घट नाना ॥ 

भाँति अनेक भई जेवनारा। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा ।। २ 

​

सो जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी ॥

सादर बोले सकल बराती । बिष्नु बिरंचि देव सब जाती ।।३ 

​

बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परुसन निपुन सुआरा ॥ 

नारिबूंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी ॥ ४ 

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छंद

 

गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं। 

भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं ॥ 

जेवँत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कहह्यो। 

अचवाँइ दीन्हें पान गवने बास जहँ जाको रहयो ॥ ॥

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दोहा

 

बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ।

समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ ॥ ९९ ॥ 

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चौपाई 

 

बोलि सकल सुर सादर लीन्हे । सबहि जथोचित आसन दीन्हे ॥ 

बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभग सुमंगल गावहिं नारी ॥१ 

​

सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा ॥ 

बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयं सुमिरि निज प्रभु रघुराई ॥२

​

बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाईं। करि सिंगारु सखीं लै आईं। 

देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है।३ 

​

जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा ॥ 

सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी ॥४ 

​

छंद

 

कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा। 

सकुचहिं कहत श्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा ॥ 

छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ। 

अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ ॥

दोहा

 

मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि । 

कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि ॥ १०० ॥

​

चौपाई 

 

जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई ॥ 

गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी ॥१ 

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पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हिय हरषे तब सकल सुरेसा ॥ 

बेदमंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं ॥ २ 

​

बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना ॥ 

हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू । सकल भुवन भरि रहा उछाहू ॥३  

​

दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा ।। 

अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना ॥४  

​

छंद

 

दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो। 

का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो । 

सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो। 

पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो ॥

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दोहा

 

नाथ उमा मम प्रान सम गृहकिंकरी करेहु । 

छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु ॥ १०१ 

​

चौपाई 

 

बहु बिधि संभु सासु समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई ।।

जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही ॥ १ 

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करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा ॥ 

बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी ॥ २ 

​

कत बिधि सृर्जी नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं ।। 

भै अति प्रेम बिकल महतारी । धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी ॥३ 

​

पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेमु कछु जाइ न बरना ॥ 

सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी ॥४

​

छंद

 

जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दई। 

फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गईं ॥ 

जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले। 

सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले ॥

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दोहा

 

चले संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु ।

बिबिध भाँति परितोषु करि बिदा कीन्ह बृषकेतु ॥ १०२ ॥ 

​

चौपाई 

 

तुरत भवन आए गिरिराई । सकल सैल सर लिए बोलाई ॥

आदर दान बिनय बहुमाना । सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना।१ 

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जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए ॥ 

जगत मातु पितु संभु भवानी। तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी ॥२ 

​

करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा ॥ 

हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ ॥३ 

​

तब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुरु समर जेहिं मारा ॥

आगम निगम प्रसिद्ध पुराना । षन्मुख जन्मु सकल जग जाना ॥४ 

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छंद

 

जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा। 

तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा ॥ 

यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं। 

कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं ॥

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दोहा 

 

चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु। 

बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु ॥ १०३ ॥ 

​

चौपाई 

 

संभु चरित सुनि सरस सुहावा । भरद्वाज मुनि अति सुखु पावा ॥ 

बहु लालसा कथा पर बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी ॥१ 

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प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी ।। 

अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा । तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा ॥२ 

​

सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं ।। 

बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू ॥३ 

​

सिव सम को रघुपति व्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी ॥ 

पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई ॥४ 

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दोहा

 

प्रथमहिं मैं कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार। 

सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार ॥ १०४ ॥ 

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चौपाई 

 

मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला ॥ 

सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें ॥१  

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राम चरित अति अमित मुनीसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा ॥ 

तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी ॥ २ 

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सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी ॥ 

जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी ॥३ 

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प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा ॥ 

परम रम्य गिरिबरु कैलासू । सदा जहाँ सिव उमा निवासू ॥४ 

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दोहा

 

सिद्ध तपोधन जोगिजन सुर किंनर मुनिबूंद ।

बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिव सुखकंद ॥ १०५ ॥

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चौपाई

 

हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं ॥

तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला ॥ १ 

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त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया ॥ 

एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ ।।२ 

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निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठे सहजहिं संभु कृपाला ।। 

कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा ॥ ३ 

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तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना ।। 

भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी ।।४ 

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