top of page

श्रीपरमात्मने नमः

अथ श्रीविष्णुसहस्त्रनामस्तोत्रम्

 

जिनके स्मरण करनेमात्रसे मनुष्य जन्म-मृत्युरूप संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है, सबकी उत्पत्तिके कारणभूत उन भगवान् विष्णु को नमस्कार है।

सम्पूर्ण प्राणियोंके आदिभूत, पृथ्वीको धारण करनेवाले, अनेक रूपधारी और सर्वसमर्थ भगवान् विष्णुको प्रणाम है।

 

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन् ! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने सम्पूर्ण विधिरूप धर्म तथा पापोंका क्षय करनेवाले धर्मरहस्योंको सब प्रकार सुनकर शान्तनुपुत्र भीष्मसे फिर पूछा ॥ १ ॥

 

युधिष्ठिर बोले - समस्त जगत्में एक ही देव कौन है? तथा इस लोकमें एक ही परम आश्रयस्थान कौन है? जिसका साक्षात्कार कर लेनेपर जीवकी अविद्यारूप हृदय-ग्रन्थि टूट जाती है, सब संशय नष्ट हो जाते हैं तथा सम्पूर्ण कर्म क्षीण हो जाते हैं। किस देवकी स्तुति-गुणकीर्तन करनेसे तथा किस देवका नाना प्रकारसे बाह्य और आन्तरिक पूजन करनेसे मनुष्य कल्याणकी प्राप्ति कर सकते हैं ? ॥ २ ॥

आप समस्त धर्मोंमें पूर्वोक्त लक्षणोंसे युक्त किस धर्मको परम श्रेष्ठ मानते हैं ? तथा किसका जप करनेसे जननधर्मा जीव जन्म-मरणरूप संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है ? ॥ ३ ॥

 

भीष्मजीने कहा- स्थावर जंगमरूप संसारके स्वामी, ब्रह्मादि देवोंके देव, देश-काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्न, क्षर-अक्षरसे श्रेष्ठ पुरुषोत्तमका सहस्त्रनामोंके द्वारा निरन्तर तत्पर रहकर गुण-संकीर्तन करनेसे पुरुष सब दुःखोंसे पार हो जाता है ॥ ४ ॥

तथा उसी विनाशरहित पुरुषका सब समय भक्तिसे युक्त होकर पूजन करनेसे, उसीका ध्यान करनेसे तथा पूर्वोक्त प्रकारसे सहस्त्रनामोंके द्वारा स्तवन एवं नमस्कार करनेसे पूजा करनेवाला सब दुःखोंसे छूट जाता है ॥ ५ ॥

उस जन्म-मृत्यु आदि छः भावविकारोंसे रहित, सर्वव्यापक, सम्पूर्ण लोकोंके महेश्वर, लोकाध्यक्ष देवकी निरन्तर स्तुति करनेसे मनुष्य सब दुःखोंसे पार हो जाता है ॥ ६ ॥

जगत्की रचना करनेवाले ब्रह्माके तथा ब्राह्मण, तप और श्रुतिके हितकारी, सब धर्मोंको जाननेवाले, प्राणियोंकी कीर्तिको (उनमें अपनी शक्तिसे प्रविष्ट होकर) बढ़ानेवाले, सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी, समस्त भूतोंके उत्पत्तिस्थान एवं संसारके कारणरूप परमेश्वरका स्तवन करनेसे मनुष्य सब दुःखोंसे छूट जाता है ॥ ७ ॥

विधिरूप सम्पूर्ण धर्मोंमें मैं इसी धर्मको सबसे बड़ा मानता हूँ कि मनुष्य अपने हृदयकमलमें विराजमान कमलनयन भगवान् वासुदेवका भक्ति-पूर्वक तत्परतासहित गुण-संकीर्तनरूप स्तुतियोंसे सदा अर्चन करे ॥ ८ ॥

जो देव परम तेज, परम तप, परम ब्रह्म और परम परायण है, वही समस्त प्राणियोंकी परम गति है ॥ ९ ॥

पृथ्वीपते ! जो पवित्र करनेवाले तीर्थादिकोंमें परम पवित्र है, मंगलोंका मंगल है, देवोंका देव है तथा जो भूतप्राणियोंका अविनाशी पिता है, कल्पके आदिमें जिससे सम्पूर्ण भूत उत्पन्न होते हैं और फिर युगका क्षय होनेपर महाप्रलयमें जिसमें वे विलीन हो जाते हैं, उस लोकप्रधान, संसारके स्वामी भगवान् विष्णुके पाप और संसारभयको दूर करनेवाले हजार नामोंको मुझसे सुन ॥ १०-१२॥

जो नाम गुणके कारण प्रवृत्त हुए हैं, उनमेंसे जो-जो प्रसिद्ध हैं और मन्त्रद्रष्टा मुनियोंद्वारा जो जहाँ-तहाँ सर्वत्र भगवत्कथाओंमें गाये गये हैं, उस अचिन्त्यप्रभाव महात्माके उन समस्त नामोंको पुरुषार्थसिद्धिके लिये वर्णन करता हूँ ॥ १३ ॥

ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप, 

विश्वम् - समस्त जगत्के कारणरूप, 

विष्णुः - सर्वव्यापी, 

वषट्‌कारः - जिनके उद्देश्यसे यज्ञमें वष‌क्रिया की जाती है, ऐसे यज्ञस्वरूप, 

भूतभव्यभवत्प्रभुः - भूत, भविष्यत् और वर्तमानके स्वामी, 

भूतकृत्- रजोगुणका आश्रय लेकर ब्रह्मारूपसे सम्पूर्ण भूतोंकी रचना करनेवाले, 

भूतभृत्-सत्त्वगुणका आश्रय लेकर सम्पूर्ण भूतोंका पालन-पोषण करनेवाले, 

भावः - नित्यस्वरूप होते हुए भी स्वतः उत्पन्न होनेवाले, 

भूतात्मा - सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा अर्थात् अन्तर्यामी, 

भूतभावनः - भूतोंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाले (१-९) ॥ १४ ॥

पूतात्मा - पवित्रात्मा, 

परमात्मा - परम श्रेष्ठ नित्यशुद्ध-बुद्ध मुक्तस्वभाव, 

मुक्तानां परमा गतिः -मुक्त पुरुषोंकी सर्वश्रेष्ठ गतिस्वरूप, 

अव्ययः - कभी विनाशको प्राप्त न होनेवाले, 

पुरुषः - पुर अर्थात् शरीरमें शयन करनेवाले, 

साक्षी - बिना किसी व्यवधानके सब कुछ देखनेवाले, 

क्षेत्रज्ञः - क्षेत्र अर्थात् समस्त प्रकृतिरूप शरीरको पूर्णतया जाननेवाले, 

अक्षरः - कभी क्षीण न होनेवाले (१०-१७) ॥ १५ ॥

योगः - मनसहित सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियोंके 

निरोधरूप योगसे प्राप्त होनेवाले, 

योगविदां नेता -योगको जाननेवाले भक्तोंके योगक्षेमादिका निर्वाह करनेमें अग्रसर रहनेवाले, 

प्रधानपुरुषेश्वरः - प्रकृति और पुरुषके स्वामी, 

नारसिंहवपुः - मनुष्य और सिंह- दोनोंके-जैसा शरीर धारण करनेवाले नरसिंहरूप, 

श्रीमान् -वक्षःस्थलमें सदा श्रीको धारण करनेवाले, 

केशवः -(क) ब्रह्मा, (अ) विष्णु और (ईश) महादेव- इस प्रकार त्रिमूर्तिस्वरूप, 

पुरुषोत्तमः - क्षर और अक्षर इन दोनोंसे सर्वथा उत्तम (१८-२४) ॥ १६ ॥

योगः - मनसहित सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियोंके 

निरोधरूप योगसे प्राप्त होनेवाले, 

योगविदां नेता -योगको जाननेवाले भक्तोंके योगक्षेमादिका निर्वाह करनेमें अग्रसर रहनेवाले, 

प्रधानपुरुषेश्वरः - प्रकृति और पुरुषके स्वामी, 

नारसिंहवपुः - मनुष्य और सिंह- दोनोंके-जैसा शरीर धारण करनेवाले नरसिंहरूप, 

श्रीमान् -वक्षःस्थलमें सदा श्रीको धारण करनेवाले, 

केशवः -(क) ब्रह्मा, (अ) विष्णु और (ईश) महादेव- इस प्रकार त्रिमूर्तिस्वरूप, 

पुरुषोत्तमः - क्षर और अक्षर इन दोनोंसे सर्वथा उत्तम (१८-२४) ॥ १६ ॥

सर्वः - असत् और सत्-सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके स्थान, 

शर्वः - सारी प्रजाका प्रलयकालमें संहार करनेवाले, 

शिवः - तीनों गुणोंसे परे कल्याणस्वरूप, 

स्थाणुः - स्थिर, 

भूतादिः - भूतोंके आदिकारण, 

निधिरव्ययः - प्रलयकालमें सब प्राणियोंके लीन होनेके अविनाशी स्थानरूप, 

सम्भवः - अपनी इच्छासे भली प्रकार प्रकट होनेवाले,

 भावनः - समस्त भोक्ताओंके फलोंको उत्पन्न करनेवाले, 

भर्ता - सबका भरण करनेवाले, 

प्रभवः - उत्कृष्ट (दिव्य) जन्मवाले,

 प्रभुः - सबके स्वामी, 

ईश्वरः - उपाधिरहित ऐश्वर्यवाले (२५-३६) ॥ १७॥

स्वयम्भूः - स्वयं उत्पन्न होनेवाले, 

शम्भुः - भक्तोंके लिये सुख उत्पन्न करनेवाले, 

आदित्यः - द्वादश आदित्योंमें विष्णु नामक आदित्य, 

पुष्कराक्षः - कमलके समान नेत्रवाले, 

महास्वनः - वेदरूप अत्यन्त महान् घोषवाले, 

अनादिनिधनः - जन्म-मृत्युसे रहित, 

धाता - विश्वको धारण करनेवाले, 

विधाता - कर्म और उसके फलों की रचना करनेवाले, 

धातुरुत्तमः - कार्य-कारणरूप सम्पूर्ण प्रपंचको धारण करनेवाले एवं सर्वश्रेष्ठ (३७-४५) ॥ १८ ॥

अप्रमेयः - प्रमाणादिसे जाननेमें न आ सकनेवाले, 

हृषीकेशः - इन्द्रियोंके स्वामी, 

पद्मनाभः - जगत्के कारणरूप कमलको अपनी नाभिमें स्थान देनेवाले, 

अमरप्रभुः - देवताओंके स्वामी, 

विश्वकर्मा - सारे जगत्की रचना करनेवाले, 

मनुः - प्रजापति मनुरूप, 

त्वष्टा - संहारके समय सम्पूर्ण प्राणियोंको क्षीण करनेवाले, 

स्थविष्ठः - अत्यन्त स्थूल, 

स्थविरो ध्रुवः -अति प्राचीन एवं अत्यन्त स्थिर (४६-५४) ॥ १९ ॥

अग्राह्यः - मनसे भी ग्रहण न किये जा सकनेवाले, 

शाश्वतः - सब कालमें स्थित रहनेवाले, 

कृष्णः -सबके चित्तको बलात् अपनी ओर आकर्षित करनेवाले परमानन्दस्वरूप, 

लोहिताक्षः- लाल नेत्रोंवाले, 

प्रतर्दनः -प्रलयकालमें प्राणियोंका संहार करनेवाले, 

प्रभूतः - ज्ञान, ऐश्वर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न, 

त्रिककुब्धाम - ऊपर-नीचे और मध्यभेदवाली तीनों दिशाओंके आश्रयरूप, 

पवित्रम् - सबको पवित्र करनेवाले, 

मङ्गलं परम् -परम मंगलस्वरूप (५५-६३) ॥ २० ॥

ईशानः - सर्वभूतोंके नियन्ता, 

प्राणदः - सबके प्राण-संशोधन करनेवाले, 

प्राणः - सबको जीवित रखनेवाले प्राणस्वरूप, 

ज्येष्ठः - सबके कारण होनेसे सबसे बड़े, 

श्रेष्ठः - सबमें उत्कृष्ट होनेसे परम श्रेष्ठ, 

प्रजापतिः - ईश्वररूपसे सारी प्रजाओंके मालिक, 

हिरण्यगर्भः - ब्रह्माण्डरूप हिरण्यमय अण्डके भीतर ब्रह्मारूपसे व्याप्त होनेवाले, 

भूगर्भः - पृथ्वीके गर्भमें रहनेवाले, 

माधवः - लक्ष्मीके पति, 

मधुसूदनः -मधु नामक दैत्यको मारनेवाले (६४-७३) ॥ २१ ॥

ईश्वरः - सर्वशक्तिमान् ईश्वर, 

विक्रमी - शूरवीरतासे युक्त, 

धन्वी - शार्ङ्गधनुष रखनेवाले, 

मेधावी - अतिशय बुद्धिमान्, 

विक्रमः - गरुड़ पक्षीद्वारा गमन करनेवाले,

क्रमः - क्रम-विस्तारके कारण, 

अनुत्तमः - सर्वोत्कृष्ट, 

दुराधर्षः - किसीसे भी तिरस्कृत न हो सकनेवाले, 

कृतज्ञः - अपने निमित्तसे थोड़ा-सा भी त्याग किये जानेपर उसे बहुत माननेवाले यानी पत्र-पुष्पादि थोड़ी-सी वस्तु समर्पण करनेवालोंको भी मोक्ष दे देनेवाले, 

कृतिः - पुरुष-प्रयत्नके आधाररूप, 

आत्मवान् - अपनी ही महिमामें स्थित (७४-८४) ॥ २२ ॥

सुरेशः - देवताओंके स्वामी, 

शरणम् - दीन-दुःखियोंके परम आश्रय, 

शर्म - परमानन्दस्वरूप, 

विश्वरेताः - विश्वके कारण, 

प्रजाभवः- सारी प्रजाको उत्पन्न करनेवाले, 

अहः - प्रकाशरूप, 

संवत्सरः -कालरूपसे स्थित, 

व्यालः - सर्पके समान ग्रहण करनेमें न आ सकनेवाले, 

प्रत्ययः - उत्तम बुद्धिसे जाननेमें आनेवाले, 

सर्वदर्शनः - सबके द्रष्टा (८५-९४) ॥ २३ ॥

अजः - जन्मरहित, सर्वेश्वरः - समस्त ईश्वरोंके  भी ईश्वर, 

सिद्धः - नित्यसिद्ध, 

सिद्धिः - सबके फलस्वरूप, 

सर्वादिः - सर्वभूतोंके आदि कारण, 

अच्युतः - अपनी स्वरूप-स्थितिसे कभी त्रिकालमें भी च्युत न होनेवाले, 

वृषाकपिः - धर्म और वराहरूप, 

अमेयात्मा - अप्रमेयस्वरूप, 

सर्वयोगविनिःसृतः -नाना प्रकारके शास्त्रोक्त साधनोंसे जाननेमें आनेवाले (९५-१०३) ॥ २४ ॥

वसुः - सब भूतोंके वासस्थान, 

वसुमनाः - उदार मनवाले, 

सत्यः - सत्यस्वरूप, 

समात्मा - सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक आत्मारूपसे विराजनेवाले, 

असम्मितः समस्त पदार्थोंसे मापे न जा सकनेवाले, 

समः -सब समय समस्त विकारोंसे रहित, 

अमोघः -भक्तोंके द्वारा पूजन, स्तवन अथवा स्मरण किये जानेपर उन्हें वृथा न करके पूर्णरूपसे उनका फल प्रदान करनेवाले, 

पुण्डरीकाक्षः - कमलके समान नेत्रोंवाले, 

वृषकर्मा - धर्ममय कर्म करनेवाले, 

वृषाकृतिः -धर्मकी स्थापना करनेके लिये विग्रह धारण करनेवाले (१०४-११३) ॥ २५ ॥

रुद्रः - दुःख या दुःखके कारणको दूर भगा देनेवाले, 

बहुशिराः - बहुत-से सिरोंवाले, 

बभ्रुः- लोकोंका भरण करनेवाले, 

विश्वयोनिः - विश्वको उत्पन्न करनेवाले, 

शुचिश्रवाः - पवित्र कीर्तिवाले, 

अमृतः - कभी न मरनेवाले, 

शाश्वतस्थाणुः - नित्य सदा एकरस रहनेवाले एवं स्थिर, 

वरारोहः - आरूढ़ होनेके लिये परम उत्तम अपुनरावृत्तिस्थानरूप, 

महातपाः - प्रताप (प्रभाव)-रूप महान् तपवाले (११४-१२२) ॥ २६ ॥

सर्वगः - कारणरूपसे सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले, 

सर्वविद्भानुः - सब कुछ जाननेवाले तथा प्रकाशरूप, 

विष्वक्सेनः - युद्धके लिये की हुई तैयारीमात्रसे ही दैत्यसेनाको तितर-बितर कर डालनेवाले, 

जनार्दनः -भक्तोंके द्वारा अभ्युदय-निःश्रेयसरूप परम पुरुषार्थकी याचना किये जानेवाले, 

वेदः - वेदरूप,

 वेदवित्- वेद तथा वेदके अर्थको यथावत् जाननेवाले, 

अव्यङ्गः -ज्ञानादिसे परिपूर्ण अर्थात् किसी प्रकार अधूरे न रहनेवाले- सर्वांगपूर्ण, 

वेदाङ्गः - वेदरूप अंगोंवाले, 

वेदवित्- वेदोंको विचारनेवाले,

कविः - सर्वज्ञ (१२३-१३२) ॥ २७ ॥

लोकाध्यक्षः - समस्त लोकोंके अधिपति, 

सुराध्यक्षः - देवताओंके अध्यक्ष, 

धर्माध्यक्षः - अनुरूप फल देनेके लिये धर्म और अधर्मका निर्णय करनेवाले, 

कृताकृतः - कार्यरूपसे कृत और कारणरूपसे अकृत, 

चतुरात्मा - सृष्टिकी उत्पत्ति आदिके लिये चार पृथक् मूर्तियोंवाले, 

चतुर्यूहः - उत्पत्ति, स्थिति, नाश और रक्षारूप चार व्यूहवाले, 

चतुर्दष्ट्रः- चार दाढ़ोंवाले नरसिंहरूप, 

चतुर्भुजः - चार भुजाओंवाले वैकुण्ठवासी भगवान् विष्णु (१३३-१४०) ॥ २८ ॥

भ्राजिष्णुः - एकरस प्रकाशस्वरूप, 

भोजनम् -ज्ञानियोंद्वारा भोगनेयोग्य अमृतस्वरूप, 

भोक्ता - पुरुषरूपसे भोक्ता, 

सहिष्णुः - सहनशील, 

जगदादिजः - जगत्के आदिमें हिरण्यगर्भरूपसे स्वयं उत्पन्न होनेवाले, 

अनघः - पापरहित, 

विजयः - ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य आदि गुणोंमें सबसे बढ़कर, 

जेता - स्वभावसे ही समस्त भूतोंको जीतनेवाले,

 विश्वयोनिः -प्रकृतिस्वरूप, 

पुनर्वसुः - पुनः पुनः शरीरोंमें आत्मरूपसे बसनेवाले (१४१-१५०) ॥ २९ ॥

उपेन्द्रः - इन्द्रको अनुजरूपसे प्राप्त होनेवाले, 

वामनः - वामनरूपसे अवतार लेनेवाले, 

प्रांशुः -तीनों लोकोंको लाँघनेके लिये त्रिविक्रमरूपसे ऊँचे होनेवाले, 

अमोघः - अव्यर्थ चेष्टावाले, 

शुचिः - स्मरण, स्तुति और पूजन करनेवालोंको पवित्र कर देनेवाले, 

ऊर्जितः - अत्यन्त बलशाली, 

अतीन्द्रः- स्वयंसिद्ध ज्ञान-ऐश्वर्यादिके कारण इन्द्रसे भी बढ़े-चढ़े हुए, 

संग्रहः -प्रलयके समय सबको समेट लेनेवाले, 

सर्गः - सृष्टिके कारणरूप, 

धृतात्मा - जन्मादिसे रहित रहकर स्वेच्छासे स्वरूप धारण करनेवाले, 

नियमः - प्रजाको अपने-अपने अधिकारोंमें नियमित करनेवाले, 

यमः - अन्तःकरणमें स्थित होकर नियमन करनेवाले (१५१-१६२) ॥ ३० ॥

वेद्यः - कल्याणकी इच्छावालोंके द्वारा जाननेयोग्य, 

वैद्यः – सब विद्याओंके जाननेवाले, 

सदायोगी - सदा योगमें स्थित रहनेवाले, 

वीरहा - धर्मकी रक्षाके लिये असुर योद्धाओंको मार डालनेवाले, 

माधवः - विद्याके स्वामी, 

मधुः - अमृतकी तरह सबको प्रसन्न करनेवाले, 

अतीन्द्रियः - इन्द्रियोंसे सर्वथा अतीत, 

महामायः -मायावियोंपर भी माया डालनेवाले, महान् मायावी, 

महोत्साहः - जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके लिये तत्पर रहनेवाले परम उत्साही, 

महाबलः - महान् बलशाली (१६३-१७२) ॥ ३१ ॥

महाबुद्धिः - महान् बुद्धिमान्, 

महावीर्यः - महान् पराक्रमी, 

महाशक्तिः - महान् सामर्थ्यवान्, 

महाद्युतिः -महान् कान्तिमान्, 

अनिर्देश्यवपुः - अनिर्देश्य विग्रहवाले, 

श्रीमान् - ऐश्वर्यवान्, 

अमेयात्मा - जिसका अनुमान न किया जा सके ऐसे आत्मावाले, 

महाद्रिधृक् -अमृतमन्थन और गोरक्षणके समय मन्दराचल और गोवर्धन नामक महान् पर्वतोंको धारण करनेवाले (१७३-१८०) ॥ ३२ ॥ 

महेष्वासः - महान् धनुषवाले, 

महीभर्ता - पृथ्वीको धारण करनेवाले, 

श्रीनिवासः - अपने वक्षःस्थलमें श्रीको निवास देनेवाले, 

सतां गतिः - सत्पुरुषोंके परम आश्रय, 

अनिरुद्धः - सच्ची भक्तिके बिना किसीके भी द्वारा न रुकनेवाले, 

सुरानन्दः - देवताओंको आनन्दित करनेवाले, 

गोविन्दः - वेदवाणीके द्वारा अपनेको प्राप्त करा देनेवाले, 

गोविदां पतिः - वेदवाणीको जाननेवालोंके स्वामी (१८१-१८८) ॥ ३३ ॥

मरीचिः - तेजस्वियोंके भी परम तेजरूप, 

दमनः -प्रमाद करनेवाली प्रजाको यम आदिके रूपसे दमन करनेवाले, 

हंसः - पितामह ब्रह्माको वेदका ज्ञान करानेके लिये हंसरूप धारण करनेवाले, 

सुपर्णः - सुन्दर पंखवाले गरुड़स्वरूप, 

भुजगोत्तमः - सर्पोंमें श्रेष्ठ शेषनागरूप, 

हिरण्यनाभः – हितकारी और रमणीय नाभिवाले, 

सुतपाः- बदरिकाश्रममें नर-नारायणरूपसे सुन्दर तप करनेवाले, 

पद्मनाभः -कमलके समान सुन्दर नाभिवाले, 

प्रजापतिः - सम्पूर्ण प्रजाओंके पालनकर्ता (१८९-१९७) ॥ ३४ ॥

अमृत्युः - मृत्युसे रहित, 

सर्वदृक्- सब कुछ देखनेवाले, 

सिंहः - दुष्टोंका विनाश करनेवाले, 

सन्धाता - पुरुषोंको उनके कर्मोंके फलोंसे संयुक्त करनेवाले, 

सन्धिमान् - सम्पूर्ण यज्ञ और तपोंको भोगनेवाले, 

स्थिरः - सदा एकरूप, 

अजः - भक्तोंके हृदयोंमें जानेवाले तथा दुर्गुणोंको दूर हटा देनेवाले, 

दुर्मर्षणः - किसीसे भी सहन नहीं किये जा सकनेवाले, 

शास्ता - सबपर शासन करनेवाले, 

विश्रुतात्मा - वेदशास्त्रोंमें विशेषरूपसे प्रसिद्ध स्वरूपवाले, 

सुरारिहा - देवताओंके शत्रुओंको मारनेवाले (१९८-२०८) ॥ ३५ ॥

गुरुः - सब विद्याओंका उपदेश करनेवाले, 

गुरुतमः - ब्रह्मा आदिको भी ब्रह्मविद्या प्रदान करनेवाले, 

धाम-सम्पूर्ण प्राणियोंकी कामनाओंके आश्रय, 

सत्यः - सत्यस्वरूप, 

सत्यपराक्रमः - अमोघ पराक्रमवाले, 

निमिषः - योगनिद्रासे मुँदे हुए नेत्रोंवाले, 

अनिमिषः -मत्स्यरूपसे अवतार लेनेवाले, 

स्त्रग्वी - वैजयन्ती माला धारण करनेवाले, 

वाचस्पतिरुदारधीः- सारे पदार्थोंको प्रत्यक्ष करनेवाली बुद्धिसे युक्त समस्त विद्याओंके पति (२०९-२१७) ॥ ३६ ॥

अग्रणीः - मुमुक्षुओंको उत्तम पदपर ले जानेवाले, 

ग्रामणीः - भूतसमुदायके नेता, 

श्रीमान् - सबसे बढ़ी-चढ़ी कान्तिवाले, 

न्यायः - प्रमाणोंके आश्रयभूत तर्ककी मूर्ति, 

नेता - जगद्रूप यन्त्रको चलानेवाले, 

समीरणः -श्वासरूपसे प्राणियोंसे चेष्टा करानेवाले, 

सहस्त्रमूर्धा -हजार सिरवाले, 

विश्वात्मा - विश्वके आत्मा, 

सहस्त्राक्षः - हजार आँखोंवाले, 

सहस्त्रपात्- हजार पैरोंवाले (२१८-२२७) ॥ ३७ ॥

आवर्तनः - संसारचक्रको चलानेके स्वभाववाले, 

निवृत्तात्मा - संसारबन्धनसे मुक्त आत्मस्वरूप, 

संवृतः -अपनी योगमायासे ढके हुए, 

सम्प्रमर्दनः - अपने रुद्र आदि स्वरूपसे सबका मर्दन करनेवाले, 

अहः संवर्तकः – सूर्यरूपसे सम्यक्तया दिनके प्रवर्तक, 

वह्निः - हविको वहन करनेवाले अग्निदेव, 

अनिलः - प्राणरूपसे वायुस्वरूप, 

धरणीधरः - वराह और शेषरूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले (२२८-२३५) ॥ ३८ ॥

सुप्रसादः - शिशुपालादि अपराधियोंपर भी कृपा करनेवाले, 

प्रसन्नात्मा - प्रसन्न स्वभाववाले अर्थात् करुणा करनेवाले, 

विश्वधृक् - जगत्को धारण करनेवाले, 

विश्वभुक् - विश्वको भोगनेवाले अर्थात् विश्वका पालन करनेवाले, 

विभुः - विविध प्रकारसे प्रकट होनेवाले, 

सत्कर्ता - भक्तोंका सत्कार करनेवाले, 

सत्कृतः - पूजितोंसे भी पूजित, 

साधुः - भक्तोंके कार्य साधनेवाले, 

जह्नुः -संहारके समय जीवोंका लय करनेवाले, 

नारायणः जलमें शयन करनेवाले, 

नरः - भक्तोंको परमधाममें ले जानेवाले (२३६-२४६) ॥ ३९ ॥

असंख्येयः - नाम और गुणोंकी संख्यासे शून्य, 

अप्रमेयात्मा - किसीसे भी मापे न जा सकनेवाले, 

विशिष्टः - सबसे उत्कृष्ट, 

शिष्टकृत् - शासन करनेवाले, 

शुचिः - परम शुद्ध, 

सिद्धार्थः - इच्छित अर्थको सर्वथा सिद्ध कर चुकनेवाले, 

सिद्धसंकल्पः - सत्यसंकल्पवाले, 

सिद्धिदः - कर्म करनेवालोंको उनके अधिकारके अनुसार फल देनेवाले, 

सिद्धिसाधनः - सिद्धिरूप क्रियाके साधक (२४७-२५५) ॥ ४० ॥

वृषाही - द्वादशाहादि यज्ञोंको अपनेमें स्थित रखनेवाले, 

वृषभः - भक्तोंके लिये इच्छित वस्तुओंकी वर्षा करनेवाले, 

विष्णुः - शुद्ध सत्त्वमूर्ति, 

वृषपर्वा - परमधाममें आरूढ़ होनेकी इच्छावालोंके लिये धर्मरूप सीढ़ियोंवाले, 

वृषोदरः -अपने उदरमें धर्मको धारण करनेवाले, 

वर्धनः -भक्तोंको बढ़ानेवाले, 

वर्धमानः - संसाररूपसे बढ़नेवाले, 

विविक्तः - संसारसे पृथक् रहनेवाले, 

श्रुतिसागरः -वेदरूप जलके समुद्र (२५६-२६४) ॥ ४१ ॥

सुभुजः - जगत्की रक्षा करनेवाली अति सुन्दर भुजाओंवाले, 

दुर्धरः - दूसरोंसे धारण न किये जा सकनेवाले पृथ्वी आदि लोकधारक पदार्थोंको भी धारण करनेवाले और स्वयं किसीसे धारण न किये जा सकनेवाले, 

वाग्मी - वेदमयी वाणीको उत्पन्न करनेवाले, 

महेन्द्रः - ईश्वरोंके भी ईश्वर, 

वसुदः -धन देनेवाले, 

वसुः - धनरूप, 

नैकरूपः - अनेक रूपधारी, 

बृहद्रूपः - विश्वरूपधारी, 

शिपिविष्टः -सूर्यकिरणोंमें स्थित रहनेवाले, 

प्रकाशनः- सबको प्रकाशित करनेवाले (२६५-२७४) ॥ ४२ ॥

ओजस्तेजोद्युतिधरः - प्राण और बल, शूरवीरता आदि गुण तथा ज्ञानकी दीप्तिको धारण करनेवाले, 

प्रकाशात्मा - प्रकाशरूप विग्रहवाले, 

प्रतापनः - सूर्य आदि अपनी विभूतियोंसे विश्वको तप्त करनेवाले, 

ऋद्धः- धर्म, ज्ञान और वैराग्यादिसे सम्पन्न, 

स्पष्टाक्षरः - ओंकाररूप स्पष्ट अक्षरवाले, 

मन्त्रः -ऋक्, साम और यजुरूप मन्त्रोंसे जाननेयोग्य, 

चन्द्रांशुः- संसारतापसे संतप्तचित्त पुरुषोंको चन्द्रमाकी किरणोंके समान आह्लादित करनेवाले, 

भास्करद्युतिः - सूर्यके समान प्रकाशस्वरूप (२७५-२८२) ॥ ४३ ॥

अमृतांशूद्भवः - समुद्रमन्थन करते समय चन्द्रमाको उत्पन्न करनेवाले समुद्ररूप, 

भानुः- भासनेवाले, 

शशबिन्दुः - खरगोशके समान चिह्नवाले, चन्द्रमाकी तरह सम्पूर्ण प्रजाका पोषण करनेवाले, 

सुरेश्वरः - देवताओंके ईश्वर, 

औषधम् - संसाररोगको मिटानेके लिये औषधरूप, 

जगतः सेतुः - संसारसागरको पार करानेके लिये सेतुरूप, 

सत्यधर्मपराक्रमः - सत्यरूप धर्म और पराक्रमवाले (२८३-२८९) ॥ ४४ ॥

भूतभव्यभवन्नाथः - भूत, भविष्य और वर्तमान सभी विषयोंके स्वामी, 

पवनः - वायुरूप, 

पावनः - दृष्टिमात्रसे जगत्को पवित्र करनेवाले, 

अनलः - अग्निस्वरूप, 

कामहा - अपने भक्तजनोंके सकामभावको नष्ट करनेवाले, 

कामकृत्- भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, 

कान्तः -कमनीयरूप, 

कामः - (क) ब्रह्मा, (अ) विष्णु, (म) महादेव - इस प्रकार त्रिदेवरूप, 

कामप्रदः - भक्तोंको उनकी कामना की हुई वस्तुएँ प्रदान करनेवाले, 

प्रभुः -सर्वोत्कृष्ट सर्वसामर्थ्यवान् स्वामी (२९०-२९९) ॥ ४५ ॥

युगादिकृत् - युगादिका आरम्भ करनेवाले, 

युगावर्तः - चारों युगोंको चक्रके समान घुमानेवाले, 

नैकमायः - अनेकों मायाओंको धारण करनेवाले, 

महाशनः - कल्पके अन्तमें सबको ग्रसन करनेवाले, 

अदृश्यः - समस्त ज्ञानेन्द्रियोंके अविषय, 

अव्यक्तरूपः -निराकार स्वरूपवाले, 

सहस्त्रजित् - युद्धमें हजारों देवशत्रुओंको जीतनेवाले, 

अनन्तजित् - युद्ध और क्रीड़ा आदिमें सर्वत्र समस्त भूतोंको जीतनेवाले (३००-३०७) ॥४६॥

इष्टः - परमानन्दरूप होनेसे सर्वप्रिय, 

अविशिष्टः - सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित, सर्वश्रेष्ठ, 

शिष्टेष्टः - शिष्ट पुरुषोंके इष्टदेव, 

शिखण्डी -मयूरपिच्छको अपना शिरोभूषण बना लेनेवाले, 

नहुषः - भूतोंको मायासे बाँधनेवाले, 

वृषः -कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, 

क्रोधहा- क्रोधका नाश करनेवाले, 

क्रोधकृत्कर्ता - दुष्टोंपर क्रोध करनेवाले और जगत्को उनके कर्मोंके अनुसार रचनेवाले, 

विश्वबाहुः - सब ओर बाहुओंवाले, 

महीधरः - पृथ्वीको धारण करनेवाले (३०८-३१७) ॥ ४७ ॥

अच्युतः - छः भावविकारोंसे रहित, 

प्रथितः -जगत्की उत्पत्ति आदि कर्मोंके कारण, 

प्राणः -हिरण्यगर्भरूपसे प्रजाको जीवित रखनेवाले, 

प्राणदः-सबका भरण-पोषण करनेवाले, 

वासवानुजः - वामनावतारमें कश्यपजीद्वारा अदितिसे इन्द्रके अनुजरूपमें उत्पन्न होनेवाले, 

अपां निधिः - जलको एकत्र रखनेवाले समुद्ररूप, 

अधिष्ठानम् - उपादान कारणरूपसे सब भूतोंके आश्रय, 

अप्रमत्तः - अधिकारियोंको उनके कर्मानुसार फल देनेमें कभी प्रमाद न करनेवाले, 

प्रतिष्ठितः – अपनी महिमामें स्थित (३१८-३२६) ॥ ४८ ॥

स्कन्दः - स्वामिकार्तिकेयरूप, 

स्कन्दधरः -धर्मपथको धारण करनेवाले, 

धुर्यः - समस्त भूतोंके जन्मादिरूप धुरको धारण करनेवाले, 

वरदः - इच्छित वर देनेवाले, 

वायुवाहनः - सारे वायुभेदोंको चलानेवाले, 

वासुदेवः - समस्त प्राणियोंको अपनेमें बसानेवाले तथा सब भूतोंमें सर्वात्मारूपसे बसनेवाले दिव्यस्वरूप, 

बृहद्भानुः - महान् किरणोंसे युक्त एवं सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाशित करनेवाले, 

आदिदेवः - सबके आदिकारण देव, 

पुरन्दरः - असुरोंके नगरोंका ध्वंस करनेवाले (३२७-३३५) ॥ ४९ ॥

अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः । 

अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ।५०।

 

अशोकः - सब प्रकारके शोकसे रहित, 

तारणः -संसारसागरसे तारनेवाले, 

तारः - जन्म-जरा-मृत्युरूप भयसे तारनेवाले, 

शूरः - पराक्रमी, 

शौरिः - शूरवीर श्रीवसुदेवजीके पुत्र, 

जनेश्वरः - समस्त जीवोंके स्वामी, 

अनुकूलः - आत्मारूप होनेसे सबके अनुकूल, 

शतावर्तः- धर्मरक्षाके लिये सैकड़ों अवतार लेनेवाले, 

पद्मी - अपने हाथमें कमल धारण करनेवाले, 

पद्मनिभेक्षणः -कमलके समान कोमल दृष्टिवाले (३३६-३४५) ॥५०॥

पद्मनाभः - हृदय-कमलके मध्य निवास करनेवाले, 

अरविन्दाक्षः - कमलके समान आँखोंवाले, 

पद्मगर्भः -हृदय-कमलमें ध्यान करनेयोग्य, 

शरीरभृत्- अन्नरूपसे सबके शरीरोंका भरण करनेवाले, 

महद्धिः – महान् विभूतिवाले, 

ऋद्धः - सबमें बढ़े-चढ़े, 

वृद्धात्मा - पुरातन आत्मवान्, 

महाक्षः - विशाल नेत्रोंवाले, 

गरुडध्वजः - गरुड़के चिह्नसे युक्त ध्वजावाले (३४६-३५४) ॥ ५१ ॥

अतुलः - तुलनारहित, 

शरभः - शरीरोंको प्रत्यगात्मरूपसे प्रकाशित करनेवाले, 

भीमः - जिससे पापियोंको भय हो ऐसे भयानक, 

समयज्ञः - समभावरूप यज्ञसे प्राप्त होनेवाले, 

हविर्हरिः - यज्ञोंमें हविर्भागको और अपना स्मरण करनेवालोंके पापोंको हरण करनेवाले, 

सर्वलक्षणलक्षण्यः - समस्त लक्षणोंसे लक्षित होनेवाले, 

लक्ष्मीवान् - अपने वक्षःस्थलमें लक्ष्मीजीको सदा बसानेवाले, 

समितिञ्जयः -संग्रामविजयी (३५५-३६२) ॥ ५२ ॥

विक्षरः - नाशरहित, 

रोहितः - मत्स्यविशेषका स्वरूप धारण करके अवतार लेनेवाले, 

मार्गः - परमानन्दप्राप्तिके साधनस्वरूप, 

हेतुः - संसारके निमित्त और उपादान-कारण, 

दामोदरः - यशोदाजीद्वारा रस्सीसे बँधे हुए उदरवाले, 

सहः - भक्तजनोंके अपराधोंको सहन करनेवाले, 

महीधरः - पर्वतरूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले, 

महाभागः - महान् भाग्यशाली, 

वेगवान्– तीव्र गतिवाले, 

अमिताशनः - सारे विश्वको भक्षण करनेवाले (३६३-३७२) ॥ ५३ ॥

उद्भवः - जगत्‌की उत्पत्तिके उपादानकारण, 

क्षोभणः - जगत्की उत्पत्तिके समय प्रकृति और पुरुषमें प्रविष्ट होकर उन्हें क्षुब्ध करनेवाले, 

देवः - प्रकाशस्वरूप, 

श्रीगर्भः - सम्पूर्ण ऐश्वर्यको अपने उदरगर्भमें रखनेवाले, 

परमेश्वरः - सर्वश्रेष्ठ शासन करनेवाले, 

करणम् - संसारकी उत्पत्तिके सबसे बड़े साधन, 

कारणम् - जगत्के उपादान और निमित्तकारण, 

कर्ता -सब प्रकारसे स्वतन्त्र, 

विकर्ता - विचित्र भुवनोंकी रचना करनेवाले, 

गहनः - अपने विलक्षण स्वरूप, सामर्थ्य और लीलादिके कारण पहचाने न जा सकनेवाले, 

गुहः - मायासे अपने स्वरूपको ढक लेनेवाले (३७३-३८३) ॥ ५४॥

व्यवसायः - ज्ञानमात्रस्वरूप, 

व्यवस्थानः -लोकपालादिकोंको, समस्त जीवोंको, चारों वर्णाश्रमोंको एवं उनके धर्मोंको व्यवस्थापूर्वक रचनेवाले, 

संस्थानः -प्रलयके सम्यक् स्थान, 

स्थानदः- ध्रुवादि भक्तोंको स्थान देनेवाले, 

ध्रुवः - अविनाशी, 

परद्धिः- श्रेष्ठ विभूतिवाले, 

परमस्पष्टः - ज्ञानस्वरूप होनेसे परम स्पष्टरूप अवतारविग्रहमें सबके सामने प्रत्यक्ष प्रकट होनेवाले, 

तुष्टः - एकमात्र परमानन्दस्वरूप, 

पुष्टः -सर्वत्र परिपूर्ण, 

शुभेक्षणः - दर्शनमात्रसे कल्याण करनेवाले (३८४-३९३) ॥ ५५ ॥

रामः - योगिजनोंके स्मरण करनेके लिये नित्यानन्दस्वरूप, 

विरामः - प्रलयके समय प्राणियोंको अपनेमें विराम देनेवाले, 

विरजः - रजोगुण तथा तमोगुणसे सर्वथा शून्य, 

मार्गः - मुमुक्षुजनोंके अमर होनेके साधनस्वरूप, 

नेयः - उत्तम ज्ञानसे ग्रहण करनेयोग्य, 

नयः - सबको नियममें रखनेवाले, 

अनयः -स्वतन्त्र, 

वीरः - पराक्रमशाली, 

शक्तिमतां श्रेष्ठः -शक्तिमानोंमें भी अतिशय शक्तिमान्, 

धर्मः -श्रुतिस्मृतिरूप धर्म, 

धर्मविदुत्तमः - समस्त धर्मवेत्ताओंमें उत्तम (३९४-४०४) ॥ ५६ ॥

वैकुण्ठः - परमधामस्वरूप, 

पुरुषः - विश्वरूप शरीरमें शयन करनेवाले, 

प्राणः - प्राणवायुरूपसे चेष्टय करनेवाले, 

प्राणदः - सर्गके आदिमें प्राण प्रदान करनेवाले, 

प्रणवः - जिसको वेद भी प्रणाम करते हैं, वे भगवान्, 

पृथुः - विरारूपसे विस्तृत होनेवाले, 

हिरण्यगर्भः -ब्रह्मारूपसे प्रकट होनेवाले, 

शत्रुघ्नः - शत्रुओंको मारनेवाले, 

व्याप्तः - कारणरूपसे सब कार्योंको व्याप्त करनेवाले, 

वायुः - पवनरूप, 

अधोक्षजः - अपने स्वरूपसे क्षीण न होनेवाले (४०५-४१५) ॥ ५७ ॥

ऋतुः - कालरूपसे लक्षित होनेवाले, 

सुदर्शनः -भक्तोंको सुगमतासे ही दर्शन दे देनेवाले, 

कालः -सबकी गणना करनेवाले, 

परमेष्ठी - अपनी प्रकृष्ट महिमामें स्थित रहनेके स्वभाववाले, 

परिग्रहः -शरणार्थियोंके द्वारा सब ओरसे ग्रहण किये जानेवाले, 

उग्रः - सूर्यादिके भी भयके कारण, 

संवत्सरः -सम्पूर्ण भूतोंके वासस्थान, 

दक्षः - सब कार्योंको बड़ी कुशलतासे करनेवाले, 

विश्रामः - विश्रामकी इच्छावाले, मुमुक्षुओंको मोक्ष देनेवाले, 

विश्वदक्षिणः -बलिके यज्ञमें समस्त विश्वको दक्षिणारूपमें प्राप्त करनेवाले (४१६-४२५) ॥ ५८ ॥

विस्तार:- समस्त लोकोंके विस्तारके कारण, 

स्थावरस्थाणुः - स्वयं स्थितिशील रहकर पृथ्वी आदि स्थितिशील पदार्थोंको अपनेमें स्थित रखनेवाले, 

प्रमाणम् - ज्ञानस्वरूप होनेके कारण स्वयं प्रमाणरूप, 

बीजमव्ययम् - संसारके अविनाशी कारण, 

अर्थः -सुखस्वरूप होनेके कारण सबके द्वारा प्रार्थनीय, 

अनर्थः - पूर्णकाम होनेके कारण प्रयोजनरहित, 

महाकोशः - बड़े खजानेवाले, 

महाभोगः - सुखरूप महान् भोगवाले, 

महाधनः - यथार्थ और अतिशय धनस्वरूप (४२६-४३४) ॥ ५९ ॥

अनिर्विण्णः - उकताहटरूप विकारसे रहित,

स्थविष्ठः - विरारूपसे स्थित, 

अभूः - अजन्मा,

धर्मयूपः - धर्मके स्तम्भरूप, 

महामखः - अर्पित किये हुए यज्ञोंको निर्वाणरूप महान् फलदायक बना देनेवाले,

नक्षत्रनेमिः - समस्त नक्षत्रोंके केन्द्रस्वरूप, 

नक्षत्री-चन्द्ररूप, 

क्षमः - समस्त कार्योंमें समर्थ, 

क्षामः - समस्त विकारोंके क्षीण हो जानेपर परमात्मभावसे स्थित, 

समीहनः - सृष्टि आदिके लिये भलीभाँति चेष्टा करनेवाले (४३५-४४४) ॥ ६० ॥

bottom of page