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विषय ९ : वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता, शिव, पार्वती आदि की वंदना

सोरठा : बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।

सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित ॥ १४ (घ)॥ 

 

भावार्थ : मैं वाल्मीकि मुनि के चरणकमलों की वन्दना करता हूँ, जिन्होंने रामायण की रचना की है। वह रामायण जिसमें खर नामक राक्षस का उल्लेख होने पर वह खर (कठोर) नहीं है अर्थात् बड़ी कोमल और सुन्दर है तथा दूषण राक्षस का उल्लेख होने पर भी इसमें दूषण अर्थात् दोष नहीं है ॥ १४ (घ) ॥

 

Meaning : I worship the lotus feet of Valmiki Muni, who has composed Ramayana, which despite of being having the Khar (demon) in it, is not Khar (harsh) instead it is very soft and beautiful , and having Dushan (demon) who is bad, Is free from all faults. 14(d)॥

सोरठा : बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस।

जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु ॥१४(ङ)॥

 

शब्दार्थ : बारिधि = समुद्र । बोहित = जहाज, नाव, बेड़ा। यहाँ समुद्र के लिये 'जहाज' अर्थ ठीक है। खेद = क्लेश, परिश्रम। 

 

भावार्थ : मैं चारों वेदों की भी वन्दना करता हूँ, जो संसार नामक समुद्र को पार करने के लिये जहाज के समान हैं तथा जिन्हें श्रीरघुनाथजी का निर्मल यश वर्णन करते समय स्वप्न में भी खेद अथवा थकावट नहीं होती ॥ १४ (ङ) ॥

 

Meaning : I greet all the four Vedas , which are the form of Ship that helps to cross the ocean of this mundane existence i.e. the world. And also they never feel tired or sad while describing the Glory of Shri Raghunath ji.

सोरठा : बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहिं कीन्ह जहँ।

संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी ॥ १४ (च) ॥

 

भावार्थ : मैं ब्रह्माजी के चरणों के रज की भी वन्दना करता हूँ, जिन्होंने ये भवसागर बनाया। ये वो भवसागर है , जहाँ से एक ओर संतरूपी अमृत, चन्द्रमा और कामधेनु निकले वहीं दूसरी ओर दुष्ट मनुष्य रूपी विष और मदिरा ये दोनों उत्पन्न हुए ॥१४ (च)॥

 

Meaning : I also greet the Dust on the feet of Brahma ji , who created this Bhavsagar (the universe). Because it's that place where Nectar , moon and Kaamdevi manifested in the form of good people and on the other side Poison and Wine manifested in the form of Bad people.

दोहा - बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि।

होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि ॥ १४ (छ) ॥

 

भावार्थ : देवता, ब्राह्मण, पण्डित, ग्रह- में इन सबके चरणों की वन्दना करते हुए, हाथ जोड़कर कहता हूँ कि आप सभी प्रसन्न होकर , (ये कविता लिखते समय), मेरे सारे सुन्दर मनोरथों को पूरा करें ॥ १४ (छ) ॥

 

Meaning : Gods , Brahmin , Pandit , Planets  - I greet to the feet of all these great people by joining my hands , and Request them that while writing this poem please fulfill all my dreams , with your happy minds.

चौपाई १ : पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता । जुगल पुनीत मनोहर चरिता ॥

मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका ॥

 

भावार्थ : फिर मैं सरस्वतीजी और देवनदी गङ्गाजी की वन्दना करता हूँ। ये दोनों ही पवित्र और मनोहर चरित्रवाली हैं। जिसमें से एक अर्थात् गङ्गाजी स्नान करने और जल पीने से पापों को हर लेती हैं और दूसरी है सरस्वतीजी जो गुण और यश कहने और सुनने से अज्ञान का नाश कर देती हैं (अर्थात क्योंकि सरस्वती विद्या अथवा ज्ञान का स्वरूप है , इसीलिए कहां है कि ज्ञान देने सामने सामने वाली की अज्ञानता का और सुनने से हमारी अज्ञानता का नाश्ता होता है) ॥ १ ॥

 

Meaning : After this , I greet Goddess Sarasvati ji and Devnadi i.e. celestial river Ganga ji. Both of them are holy and of pure characteristics. From which one i.e. Ganga ji removes all the sins of humans when they dive inside her i.e. river and the other one removes ignorance from the human being who shares and accepts her i.e. the knowledge.

चौपाई २ : गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी ॥ 

सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के ॥२।।

 

निरुपधि = नि:स्वार्थ। पी = पति। हित= भला करनेवाले।

 

भावार्थ : में श्री महेश और पार्वती को भी प्रणाम करता हूँ, वे मेरे गुरु और माता-पिता हैं, वे दीनबन्धु (दुखी मनुष्य के मित्र) है और नित्य उन दीनों को दान करने वाले हैं। जो सीतापति श्रीरामचन्द्र जी के सेवक, स्वामी और सखा भी हैं , तथा मुझ तुलसीदास का भी सब प्रकार से सच्चे मन से हित करनेवाले हैं॥ २ ॥

 

Meaning : I greet Lord Shiva and Goddess Parvati ji , they are my parents and teachers. They are friends of the sad people and daily help those people. They call themselves the servants , Swami and friend of The Sita ji husband Shri Ramchandra ji. And also always does the well being of me i.e. Tulsidas ji.

चौपाई ३ : कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा ॥ अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू ॥

चौपाई ४ : सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला । सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ । बरनउँ रामचरित चित चाऊ ॥

 

जाल = समूह। सिरिजा = रचा। अनमिल = अन+मिल = नहीं + मिलना (बेमेल) अर्थात जिसमें अक्षरों की मैत्री नहीं मिलती। प्रभाउ = प्रभाव। प्रतापू = प्रभाव।

 

भावार्थ : जिन शिव-पार्वती ने कलियुग को देखकर, जगत्‌ के हित के लिये, शाबर मन्त्र समूह की रचना की। अब जिन मन्त्रों के अक्षर बेमेल हैं, जिनका न कोई बराबर अर्थ भी होता है और ना ही उनका जप होता है, लेकिन श्रीशिवजी के प्रताप से इस मंत्र का प्रभाव प्रत्यक्ष है ॥ ३ ॥ वे उमापति शिवजी मुझपर प्रसन्न होकर [श्रीरामजीकी] इस कथाको आनन्द और मङ्गलकी मूल उत्पन्न करनेवाली बनायेंगे। इस प्रकार पार्वतीजी और शिवजी दोनों का स्मरण करके और उनका प्रसाद पाकर मैं चावभरे चित्तसे श्रीरामचरित्रका वर्णन करता हूँ ॥४॥

 

Meaning : Seeing the prevalence of the Kali Lord Shiva and Parvati ji,  created the Shabar Mantra. Now that poem whose words were not easily understood, which has neither has any interpretation and Nor anyone can chant them properly, but because of the glory of Lord Shiva its result is very clear. I would request That great Lord of Parvati, who is Lord Shiva , to lease be happy on me and bless, so that I can make this story the abode of blessings and joy. Now after greeting Lord Shiva and Parvati ji in my mind, and obtaining Their prasad of blessing, I am so excited to relate the exploits of Shri Ram.

शाबर मंत्र क्या है?

शाबर मंत्र सतयुग, द्वापरयुग, त्रेतायुग, में नहीं था कली के प्रारंभ में हुआ है । कली में जीवों को अनेक प्रकार के क्लेश होते हैं , तो उनके इस दर्द को मिटने के शाबर मंत्र बनाए गए। दरअसल कलयुग में जीवो के दुख निवारण करने के लिए शिव पार्वती जी भील रूप से प्रकट हुए। शिवजी ने भील भाषा में शाबर मंत्र समूह–का–समूह रच दिया जो पार्वती जी की आज्ञा से गणेश जी लिखते गए। यह ग्रंथ ‘सिद्धशाबरमंत्र’ कहलाता है ।‘सबर’ भील को कहते हैं। तो क्योंकि ये भील भाषा में भील रूप से प्रकट हुआ इसी कारण इसका ये नाम पड़ा। 

चौपाई ५–६ : भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती ॥

जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता ॥

होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी ॥

दोहा १५ : सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ।

तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ ॥ १५ ॥

 

बिभाती  = विशेष सुशोभित है। ससि = चंद्रमा। सुराती = शुक्ल पक्ष की रात।

 

भावार्थ : मेरी वाणी से निकली हुई कविता श्रीशिवजी की कृपा से इस तरह से सुशोभित होगी, जैसे रात, तारों के समूह और चन्द्रमा के साथ शोभित होती है। जो इस कथा को प्रेम सहित एवं सावधानी के साथ समझकर कहेंगे और सुनेंगे, वे ना केवल कलियुग के पापों से रहित हो जायेंगे बल्कि सुन्दर कल्याण के भागी भी होंगे और इस तरह फिर श्रीरामचन्द्रजी के चरणों के प्रेमी बन जायेंगे ॥ ५-६ ॥

यदि श्रीशिवजी और पार्वतीजी की मुझ पर स्वप्न में भी सच में प्रसन्न है, तो फिर मैंने इस भाषा कविता का जो प्रभाव कहा है, वह सब सच हो जाए ॥ १५ ॥

 

Meaning : My poem will look so beautiful afte the blessings of Shiva and Parvati ji just as a night shines when the group of stars and moon comes together. Those who will recite and listen this story with it's learning will not only get free from all the sins of Kaliyug but also will develop devotion to the feet of Shri Ramchandra ji and obtain his blessings forever. If Shiv ji and Parvati ji are really with my poem even in their dreams, then all that I have said in glorification of this poetry , written in a particular language, may come true.

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