
विषय ३ : ब्राह्मण-संत वंदना


चौपाई २ : बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना ॥
सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी ॥२।।
[ महीसुर = ब्राह्मण। चरना = चरण। जनित = उत्पन्न। संसय = संशय। हरना = हरने वाले। सुजन = साधु। समाज = समुदाय। सप्रेम = प्रेम सहित। सुबानी = सुंदर वाणी से। ( जो सुनने मीठी हो , सुनते ही कानों में सुखद लगे , सत्य कहे , समय सुहावनी और थोड़े अक्षरों में बहुत से भाव जिसमें कह दिए जाए , उस वाणी को “सुबानी” कहते है।) ]
भावार्थ : यहां तुलसीदास जी कहते है , पहले तो मैं पृथ्वी के देवता, ब्राह्मणों के चरणों की वन्दना करता हूँ, जो अज्ञानता से उत्पन्न हुए सभी प्रकार के संदेहों को हरनेवाले / मिटा देने वाले हैं। फिर (जैसे खानों से सोना , चांदी , मणि इत्यादि सब निकलते है) वैसे ही साधु भी सब “शुभ गुणों” की खान होते है, उस संत समाज को मैं यहां प्रेम सहित सुन्दर और मीठी वाणी से प्रणाम करता हूं॥२॥
Meaning : First I revere the feet of Brahmin, the very gods on the earth, who are able to dispel all doubts of human beings born of ignorance. Then I make loving obeisance, in a polite and beautiful language, to the whole community of these pious souls, who are the mines of all virtues.



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चौपाई ३ : साधु चरित सुभ चरित कपासू । निरस बिसद गुनमय फल जासू ॥
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा । बंदनीय जेहिं जग जसु पावा ॥
[ चरित = आचरण। सुभ = उत्तम। निरस = रसरहित बिसद गुनमय फल जासू ॥ फल = कर्म का फल। बिसद = उज्ज्वल (मद , मोह , काम आदि रहित होने से उज्ज्वल है। गुनमय = सद्गूणयुक्त। दुरावा = छिपाया। बंदनीय = वंदनीय करने योग्य। जसु = प्रसिद्धि। ]
भावार्थ : संतों का चरित्र कपास के चरित्र अर्थात् कपास के जीवन के समान शुभ होता है। जैसे कपास का फल नीरस होता है वैसे ही साधु भी काम, क्रोध जैसे विकारों से रहित होते हैं और इन्द्रियों के भी विषय भोग में लिप्त नहीं होता। इसके बाद, जैसे कपास विशद अर्थात् निर्मल होता है वैसे ही साधु भी निष्काम और भगवत सम्बन्धी होते है , उनका हृदय अज्ञान नमक अन्धकार से दूर और पाप रहित होता है और साथ ही जैसे कपास गुणमय होता है अर्थात उसमे छोटे छोटे सूत्र होते है जिससे वो जुड़ा होता है वैसे ही साधु भी सदगुणों से युक्त होता है। फिर जैसे कपास के अंदर में तीन फल होते है अर्थात् छिलका , बिनौला और रुई वैसे ही साधु भी तीन गुणों और तीन अवस्थाओं से युक्त होता है वो है (सत्व , रज और तम) और (जागृति , स्वप्न और सुषुप्ति)। इसके बाद, जैसे कपास का धागा सूई के किये हुए छेद को अपना तन देकर ढक देता है, अथवा जिस तरह से कपास लोढ़े जाने, काटे जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर, वस्त्र के रूप में परिणत होकर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढकता है , उसी प्रकार से, संत स्वयं दुःख सहकर दूसरों के छिद्रों (दोषों) को ढकता है, जिस कारण उसने जगत् में वन्दनीय यश प्राप्त किया है ॥ ३॥
Meaning : The character of saints is as auspicious as the character of cotton i.e. the life of cotton. Just as the cotton’s fruit is dull, similarly a sage too is free from all the vices like lust and anger, and also he does not indulge in enjoyment of the senses. Just as cotton is bright i.e. pure, similarly saints are also selfless and related to God, and their heart is free from all the darkness of ignorance and sin and at the same time, just as cotton is virtuous i.e. it has small threads with which it is connected. Similarly, a saint is also full of virtues. Just as there are three fruits inside the cotton i.e. peel, cotton and thread, similarly a saint has three qualities and three states, that is (Sattva, Raja and Tama) and (Jagruti, Swapna and Sushupti). After this, just as a cotton thread enters the hole of a needle by giving its body, and later on after going through the number of troubles of being rolled, cut and woven, it turns into a cloth and then covers the private body of people. In the same way, thus, the saint himself covers the holes (i.e. defects) of others by bearing suffering. Due to which he has achieved praiseworthy fame in the world. 3॥
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चौपाई ४ : मुद मंगलमय संत समाजू । जो जग जंगम तीरथराजू ॥
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥४।।
[ मुद = मानसी आनंद। मंगल = कोई प्रसिद्ध या दिव्य उत्सव जैसे भगवान के जन्म , विवाह आदि का उत्सव। मय = भरा हुआ । संत समाजू । तीरथराजू = प्रयाग। सुरसरि = देवनदी गंगा। धारा = प्रवाह। सरसइ = सरस्वती। ब्रह्म बिचार प्रचारा = ब्रह्म विद्या का प्रचार। प्रचारा = निरंतर व्यवहार। ]
भावार्थ : संतों का समाज आनन्द और कल्याणमय है, जो जगत् में चलता-फिरता एक तीर्थ के समान है। तो, वो संत समाज जो प्रयागराज (तीर्थ स्थान) का एक रूप है। उसमें रामभक्ति, गङ्गाजी की धारा के समान है ( जो मन में बहती ही रहती है), उनके ब्रह्मविचार ( अर्थात् ईश्वर को पाने का ज्ञान) इसका ज्ञान और उनके द्वारा इसका किया गया प्रचार , सरस्वतीजी के समान हैं ॥४॥
Meaning : The assemblage of saints, which is the extreme happiness and felicity, is just like a moving Prayag which is the king of all holy places , as it were. Whereas Devotion to Shri Ram represents, the moving of stream of the holy Ganga, which the river of the celestials; while the knowledge of knowing what is Brahma (the Supreme Lord) , and promoting this knowledge to the people is like the Sarasvati (a subterranean stream which is traditionally believed to join the Ganga and the Yamuna at Prayag, thus accounting for the name Triveni, which signifies a meeting-place of three rivers).
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चौपाई ५ : बिधि निषेधमय कलिमल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी ।।
हरि हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी ॥५।।
[ बिधि : वेदों में जिन कर्मों के करने को आज्ञा है। निषेध : वह कर्म जिन्हें त्याग देने की आज्ञा है। कलिमल हरनी : कली के पापों का नाश करने वाली। करम कथा : कर्म काण्ड । रबिनंदनि = सूर्य की पुत्री यमुना। हरि हर = शंकरजी परम भागवत है। बिराजति = सुशोभित है। बेनी = (वेणी) त्रिवेणी = गंगा , यमुना और सरस्वती का संगम है। ]
भावार्थ : विधि और निषेध ( अर्थात् यह कर्म करो और यह कर्म ना करो) , इस प्रकार जो भी अच्छे और बुरे कर्मों की कथा है , उन कलियुग के पापों को हरने वाली , सूर्यतनया (सूर्य को पुत्री) यमुनाजी हैं। भगवान् विष्णु और शङ्करजी की कथाएँ , उस त्रिवेणी की तरह वहां सुशोभित हैं, जिसके सुनते ही सभी को आनन्द और कल्याण होता हैं॥ ५॥
Meaning : Discourses (language that is studied) on Karma or Action, consisting of injunctions ( actions not allowed to do) and interdictions (prohibiting something from doing) , have been spoken of as the sacred Yamuna ji, daughter of the sun-god in her angelic form washing the impurities of the Kali age; while the anecdotes (short stories) of Vishnu ji and Shiv ji stand out as the triple stream known as Triveni, bringing joy and blessings to those who listen to them.
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सनातन स्पेशल
यमुना
यह नदी हिमालय के यमुनोतरी स्थान से निकलकर प्रयागमें गङ्गाजी से मिली है। पुराणानुसार यह यम की बहिन यमी है , जो सूर्य के वीर्य से, संज्ञाके गर्भ से उत्पन्न हुई थी और जो संज्ञाको सूर्यद्वारा मिले हुए शाप के कारण पीछे से नदीरूप हो गयां थी। यमने कार्त्तिक शुक्ला द्वितीया को अपनी बहिन के यहाँ भोजन किया और उसके प्रसाद में यह वरदान दिया कि जो इस दिन तुम्हारे जल में स्नान करेगा वह यमदण्ड से मुक्त हो जायगा। इसी को भैयादूज कहते हैं। उस दिन बहिन के यहाँ भोजन करना और उसको कुछ देना मङ्गलकारक और आयुवर्धक माना जाता है।



चौपाई ६ : बटु बिस्वास अचल निज धरमा । तीरथराज समाज सुकरमा ।।
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा । सेवत सादर समन कलेसा ॥६।।
चौपाई ७ : अकथ अलौकिक तीरथराऊ । देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ ।।७।।
[ बटु = बरगद का वृक्ष। (अक्षयवट जो प्रयाग में है, इसका नाश प्रलय में भी नहीं होता ऐसा पुराणों में कहा गया है। निज धरमा = वेद अनुसार सही कर्म करना। सुकरमा = सुंदर कर्म। समाज = परिकर / परिषद्। (प्राचीन काल के विद्बान् ब्राह्मणों की वह सभा, जिसे राजा समय समय पर राजनीति, धर्मशास्त्र आदि के किसी विषय पर व्यवस्था देने के लिये , आवाहित किया करते थे और जिसका निर्णय सर्वमान्य होता था ।) सेवत = सेवा करने से। कलेसा = दुख। (पतंजल योग सूत्र में क्लेश पांच प्रकार के कहे गए हैं। अविद्या (मोह , अज्ञान) अस्मिता (“मैं” का अहंकार) राग , द्वेष और अभिनिवेश (मृत्यु का भय) । अकथ = जो कहा ना जा सके। अलौकिक = जिसकी समानता के कोई वस्तु इस लोक में नहीं । देइ = देता है। सद्य = तुरंत। ]
भावार्थ : उस संतसमाज के रूप में जो प्रयाग है, जिन्हें अपने धर्म अर्थात् सही कर्मों पर जो अटल विश्वास है वही अक्षयवट है। और उस संत समाज के द्वारा किया गया शुभकर्म ही, उस तीर्थराज का समाज (परिकर) है (जिस तरह एक सभा में राजा का लिया गया निर्णय सर्व मान्य होता है) वैसे ही इन संत समाज के द्वारा किया गया शुभ कर्म या निर्णय वो भी सबको मान्य होता है , क्योंकि उनका कर्म और निर्णय, ईश्वर के निर्णय के बराबर होता है। वह संतसमाज के रूप में जो प्रयागराज है , वो सब देशों में, किसी भी समय पर और सभी को बड़ी आसानी से प्राप्त हो सकता है और यदि उनका आदरपूर्वक उनकी सेवा की जाए तो वह क्लेशों (दुखों) को नष्ट भी कर देता है ॥६॥ वह संत समाज के रूप में जो तीर्थराज है , वह अलौकिक और अकथनीय है, एवं तत्काल फल देनेवाला है; और उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है ॥७।।
Meaning ; Unwavering faith in their own creed constitutes the immortal banyan tree and their noble actions represent the royal court of that king of holy places , just like the decision taken by the court of king is final , similarly decisions of Sants are final. All the saints are easy to access on any day and at any place , and this moving Prayag i.e. Saints destroy all afflictions of those who serve them with reverence. This king of holy places means sants is beyond all description and supra-mundane (as mentioned above which is extra ordinary) in character; it bestows the reward immediately and its glory is manifest.



दोहा २ : सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग ॥२॥
[ जन = लोग / भक्त। मुदित = प्रसन्न।लहहिं = लाभ प्राप्त करते हैं। चारि फल = शुभ कर्मों के चार फल अर्थात चार पुरुषार्थ ( अर्थ , धर्म , काम , मोक्ष)। अछत = रहते हुए / जीते जी। साधु समाज = संत समाज। ]
भावार्थ : जो भी मनुष्य / भक्त , इस संत-समाज रूपी तीर्थराज का प्रभाव , प्रसत्र मन से सुनते और समझते हैं और फिर अत्यन्त, प्रेमपूर्वक इसमें गोते लगाते हैं, वे इस मानव शरीर के रहते ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों फल पा जाते हैं ॥ २ ॥
Meaning : Men who having heard the glory of this moving Prayag in the form of the assemblage of holy men appreciate it with an enraptured mind and then take a plunge into it with extreme devotion obtain the four rewards ( arth , dharma , kaam , moksh) of human existence during their very lifetime.


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चौपाई १ : मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकठ मराला ।।
सुनि आचरज करै जनि कोई। सतसंगति महिमा नहिं गोई ।।१।।
[ पेखिअ = दिखाई देता है। ततकाला = उसी समय। काक = कौवा। पिक = कोयल। बकउ = बक+उ = बकुला भी। मराल = हंस। आचरज = आश्चर्य। जनि = नहीं। गोई = गुप्त। ]
भावार्थ : इस तीर्थराज में स्नान का फल तत्काल मिलता है। ऐसा देखने में आता है कि इस स्नान से कौए भी कोयल बन जाते हैं और बगुले हंस बन जाते है। जी हां, यह सुनकर आप में से कोई आश्चर्य न करे, क्योंकि सत्संग की महिमा किसी से छिपी नहीं है॥ १॥
Meaning : The result of an immersion into the sacred waters of this king of holy places is instantly perceived. It's so instant that even crows turn into cuckoos and herons into swans. Yes , don't be so surprised; the glory of contact with saints is not hidden with anyone , yes everyone knows it.
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चौपाई २ : बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी ।।
जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना ।।२।।
चौपाई ३ : मति कीरति गति भूति भलाई । जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई ॥
सो जानब सतसंग प्रभाऊ । लोकहुँ बेद न आन उपाऊ ॥३।।
चौपाई ४ : बिनु सतसंग बिबेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥
सतसंगत मुद मंगल मूला । सोइ फल सिधि सब साधन फूला ।।४।।
[ घटजोनी = कुम्भज / घड़े से जो उत्पन्न हुए थे , अर्थात् ऋषि अगस्त्य जी। मुखनि = मुखों से। होनी = जीवन का वृतांत। जलचर = जल में रहने वाले। थलचर = पृथ्वी पर रहने वाले। नभचर = आकाश में विचरने वाले। जहाना = संसार। गति = मोक्ष। भूति = सिद्धियां। भलाई = श्रेष्ठा। जानब = जानिए। ]
भावार्थ : वाल्मीकिजी, नारदजी और अगस्त्यजी (जो घड़े से उत्पन्न हुए थे) , इन तीनों ने अपने-अपने मुखों से अपनी होनी अर्थात अपने अपने जीवन का वृत्तान्त कहा है। जल में रहनेवाले, जमीन पर चलनेवाले और आकाश में विचरनेवाले , नाना प्रकार के जड़-चेतन जितने भी जीव इस जगत में हैं, ॥२॥ उनमें से जिसने भी, जिस समय पर और जहाँ कहीं भी , जिस किसी यत्न से बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, विभूति (ऐश्वर्य) और भलाई पायी है, वो सब आप सत्संग का ही प्रभाव समझिए। क्योंकि, वेदों में और लोक में इनकी प्राप्ति का दूसरा और कोई उपाय नहीं है॥ ३॥ सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्रीरामजी की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता नहीं। सत्संगति आनन्द और कल्याण की जड़ है। सत्संग की सिद्धि (प्राप्ति) ही फल है और सब साधन तो फूल हैं ॥ ४ ॥
Meaning : Valmiki ji , Narad ji and Agastya ji (who was born of a pitcher) , have related their respective story of the birth and have told their own transformation with their own words. Of the various creatures, both animate and inanimate, living in this world, whether in water or on land or in the air, whoever has ever attained wisdom, glory, salvation, material prosperity or welfare anywhere and by any means whatsoever, know it to be the result of association with these holy men only; because as per Vedas there is no other means of attaining it , yes you cannot find it anywhere in the world too. Wisdom can't rise (like a sunrise) without association with saints and one cannot get such association easily without the grace of Shri Ram. Contact with noble souls is the root of joy and blessings. It constitutes the very fruit and fulfillment of all the achievements , whereas all other practices are blossoms as it were.





चौपाई ५ : सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई ॥
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं ।।५।।
चौपाई ६ : बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी । कहत साधु महिमा सकुचानी ॥
सो मो सन कहि जात न कैसें । साक बनिक मनि गुन गन जैसें ॥६।।
[ सठ = मूर्ख। पारस = एक पत्थर जिसके विषय में प्रसिद्ध है कि यदि लोहा उसमें छुलाया जाए तो सोना हो जाता है। परस = छूना। कुधात = बुरी धातु / लोहा। सुहाई = सुहावनी हो जाती है। कबि = काव्य लिखने वाला। कोबिद = पण्डित, विद्वान्। बानी = वाणी। साक (शाक) = साग, भाजी, तरकारी, पत्ती, फूल, फल आदि जो पकाकर खाये जाते हैं सब 'साक' कहलाते हैं। बनिक (वणिक) = बनिया , व्यापार करनेवाला। साक–बनिक-साग = सब्जी बेचने वाला। ]
भावार्थ : दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, बिलकुल वैसे ही जैसे पारस का स्पर्श पाकर लोहा सुन्दर सोना बन जाता है। किन्तु दैवयोग (संयोग) से यदि कभी सज्जन कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी सांप के मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं (अर्थात् जिस प्रकार साँप का संसर्ग पाकर भी मणि उसके विष को ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाश को नहीं छोड़ता, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टों के संग में रहकर भी दूसरों को प्रकाश ही देते हैं, दुष्टों का उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता) ॥ ५ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितों की वाणी भी यहां संत-महिमा का वर्णन करने में सकुचाती है (संत की महिमा इतनी महान है, कि उनसे भी कही नहीं जाती) ; तो फिर वह मुझसे भला किस प्रकार से कही जाएगी?। बिलकुल वैसे ही जैसे सब्जी बेचने वाला मणियों के गुणों का वर्णन नहीं कर सकता ॥६॥
Meaning : Through contact with the virtuous even the wicked get reformed, just as a base metal is transmuted by the touch of the philosopher’s stone. On the other hand, if by mischance good men fall into evil company, they maintain their noble character like the gem on the hood of a serpent. That is, just as a gem, even after coming in contact with a snake, does not absorb its poison and does not give up its innate quality of light, in the same way, sages give light to others even after coming in the company of wicked people; means the wicked people are unable to make any effect on them. Even the deities like Brahma, Vishnu and shiva, poets and men of wisdom are unable to depict the glory of pious souls. Then how can I Describe the glory of saints? Just like the vegetable seller finds himself incapable of explaining the qualities of gems.




दोहा ३(क)- बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ ॥३(क)॥
दोहा ३(ख) : संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु ।
बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु ॥३(ख)॥
[ समान चित = सबके लिये अर्थात् शत्रु–मित्रु सबको मन में समान मानने वाले। हित = मित्र। अनहित = शत्रु । अंजलि = दोनों हाथों की हथेली एक ओर जोड़ने से 'अंजलि' कही जाती है। गत = में प्राप्त। सुभ = शुभ और सुगन्धित। सुमन = फूल। सम = बराबर। कर = हाथ। कर = करता है। सरल = सीधा-सादा, निश्छल। यथा- 'सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं।' रति = प्रेम। ]
भावार्थ : मैं संतों को प्रणाम करता हूँ, जिनके चित्त में समता है अर्थात् जिनका न कोई मित्र है और न शत्रु ! जैसे अञ्जलि (हाथ) में रखा हुए सुन्दर फूल , तो जिस हाथ ने फूलों को तोड़ा और जिसने उसको रखा उन दोनों ही हाथों को समान रूप से सुगन्धित करते हैं , वैसे ही संत शत्रु और मित्र दोनों का ही समान रूप से कल्याण करते हैं॥३(क) ॥ संत सरल हृदय और जगत के हितकारी होते हैं, उनके ऐसे स्वभाव और स्नेह को जानकर मैं उनसे विनय करता हूँ, और मेरी इस बाल-विनय को सुनकर में चाहूंगा वे मुझपर कृपा करके श्रीरामजी के चरणों में मुझे प्रीति दें ॥३(ख)॥
Meaning : I bow to the saints, who are even-minded towards all and neither have friends nor enemies. Means just as a flower of good quality placed in the palm of one’s hands communicates its fragrance alike to both the hands (the one which plucked it and the other who held and preserved it). In this way , noble disposition (natural qualities) and loving nature of saints, are similar for both who are innocent at heart and catholic in spirit. Saints are of pure heart and compassionate towards the word. So , I make this humble request to them , that Listening to my childlike prayer and taking compassion on me, O noble souls, bless me and give me devotion in the feet of Shri Ram.

