
विषय ५ : संत-असंत वंदना
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चौपाई २ : बंदउँ संत असज्जन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ।।
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं ॥२।।
[ असज्जन = दुर्जन। दुखप्रद = दुःख देने वाले। उभय = दोनों। बीच = अन्तर। कछु = कुछ। बरना = कहा गया है।बिछुरत = वियोग होते ही। हरि लेहीं = हर लेते है। दारुन = कठिन। ]
भावार्थ : अब मैं संत और असंत दोनों के चरणों की वन्दना करता हूँ; दोनों ही दुःख देने वाले हैं, परन्तु उनमें कुछ अन्तर है। वह अन्तर यह है कि एक संत तो हमसे बिछड़ते समय हमारे प्राण से हर लेते हैं और दूसरे असंत जब हमसे मिलते हैं तो हमें दारुण दुःख देते हैं। (अर्थात् संतों का बिछड़ना मरने के समान दुःख दायी होता है और असंतों का मिलना) ॥ २ ॥
Meaning : Now I adore the feet of a saint as well as of a wicked soul, both of them give us a pain but with some differences. We get sad when the saint leaves us , and we react the same when wicked comes to meet .
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चौपाई ३ : उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं ।।
सुधा सुरा सम साधु असाधू । जनक एक जग जलधि अगाधू ॥३।।
[ उपजहिं = उत्पन्न होते हैं। माहीं = में। जलज = कमल। जोंक = जलौका = जल में रहने वाले। बिलगाहीं = अलग स्वभाव के होते है। सुधा = अमृत। जनक = उत्पत्ति स्थान। जलधि = समुद्र। अगाधू = गहरा , अथाह। ]
भावार्थ : दोनों , संत और असंत , जगत् में एक साथ पैदा होते हैं; पर एक साथ पैदा होने वाले कमल और जोंक की ही तरह उनके भी गुण अलग-अलग होते हैं। जैसे कमल दर्शन और स्पर्श से सुख देता है, किन्तु जोंक शरीर का स्पर्श पाते ही रक्त चूसने लगता है। साधु भी अमृत के समान ही होते हैं , जो मृत्यु के रूप में इस संसार से उबारने वाला है , वहीं असाधु मदिरा के समान है, जो मोह, प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करता है, दोनों को उत्पन्न करने वाला जगत रुपी अगाध समुद्र एक ही है। अर्थात [शास्त्रों के अनुसार समुद्र मन्थन से अमृत भी उत्पन्न हुआ था और मदिरा भी] ॥३॥
Meaning : Saints and wicked people both are born together in this world, but they differ in certain characteristics , alike lotus and the leech , both of which are born from water. Just as lotus, when touched gives happiness , and leech when touched sucks the blood from our body. Similarly The good and the wicked resemble nectar and wine respectively, both of which were manifested from the ocean which is immeasureable while samudra Manthan.
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चौपाई ४ : भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती ॥
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू । गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू ॥
चौपाई ५ : गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई ॥
[ भल = अच्छा। अनभल = बुरा। करतूती = करनी। लहत = लभंते = पाते है। सुजस = सुंदर यश। अपलोक = बदनामी। बिभूती = संपत्ति (ऐश्वर्य)। सुधाकर = अमृत किरणवाला = चंद्रमा। गरल = जहर। अनल = आग। कलिमल सरि = कर्मनाशा नदी। ब्याधू = दुष्ट। भाव = भाता है। ]
भावार्थ : भले और बुरे अपनी-अपनी करनी के अनुसार सुन्दर यश और अपयश की सम्पत्ति पाते हैं। जैसे अमृत को अपनी करनी के अनुसार चन्द्रमा, गङ्गाजी और साधु मिलते है एवं विष को मिलती है अग्नि, कलियुग के पापों की नदी अर्थात् कर्मनाशा और हिंसा करनेवाला व्याध (रोग) , इनके गुण-अवगुण भी सभी जानते हैं; किन्तु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है ॥ ४-५ ॥
Meaning : The good and the wicked gather a rich harvest of good reputation and infamy by their respective doings. Just like the merits of nectar, provides it the place on moon - which is called the seat of nectar, the Ganga - called the river of the celestials and a pious soul. and the demerits of venom, provide it fire, the unholy river Karmanasha river - which is said to be full of the impurities of the Kali age and the violent anger. In this way their characteristics are known to all, only that which is to a man’s taste appears good to him.



दोहा ५ : भलो भलाइहि पै लहइ लहड़ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु ॥ ५ ॥
[ भलो = सज्जन। भलाइहि = भलाई ही को। पै = निश्चय करके। लहइ = ग्रहण करता है। सराहिअ = प्रशंसा की जाती है। अमरताँ = अमर करने का धर्म। ]
भावार्थ : भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचता को ही ग्रहण किये रहता है। अमृत की सराहना अमर करने में होती है और विष की मारने में ॥ ५ ॥
Meaning : Of course, just as a good man accepts goodness, while a vile person vileness. Similarly , nectar is praised for its immortalizing virtue, poison is extolled for its deadly effects.




चौपाई १ : खल अघ अगुन साधु गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा ॥
तेहि तें कछु गुन दोष बखाने । संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने ॥१।।
[ अगुन = अवगुण। गाहा = कथा। अपार = जिसका कोई पार न पा सकते। उदधि = समुद्र। अवगाहा = अथाह , बहुत गहरा। तें = से। बखाने = कहे। संग्रह = ग्रहण या स्वीकार करने को क्रिया। त्याग = छोड़ना। ]
भावार्थ : दुष्टों के सारे पाप और अवगुणों तथा साधुओं के गुणों की सारी कथाएं, दोनों ही समुद्र के समान अपार और अथाह हैं। इन्हीं बड़ी बड़ी कथाओं में से मैंने चुन चुनकर कुछ गुण और दोषों का वर्णन किया है, क्योंकि बिना पहचाने (कि कौनसा गुण अच्छा है या बुरा) उनका ग्रहण या त्याग नहीं हो सकता॥१॥
Meaning : The tales of sins and vices of the wicked and of the virtues of the virtuous are like ocean which is boundless and immeasurable . That's why I have described only a few virtues and vices after picking up from those stories; because those qualities cannot be accepted or rejected without being distinguished.


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चौपाई २ : भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए ॥
कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना ॥२।।
[ भलेउ = भले भी। पोच = बुरे। बिधि = विधाता। उपजाए = उत्पन्न या पैदा करना। गनि = विचारकर। बिलगाए = देखिए। इतिहास = वह पुस्तक जिसमें बीती हुई प्रसिद्ध घटनाओं और उससे संबंध रखने वाले पुरुषों का वर्णन हो और उसके साथ-साथ धर्म, भक्ति ज्ञान और कर्मकाण्ड के गुण उपस्थिति में हो इत्यादि। जैसे महाभारत और वाल्मीकि रामायण। बिधि प्रपंचु = संसार। साना = दो वस्तुओं को आपस में मिलाना या संयुक्त करना। ]
भावार्थ : भले और बुरे , सभी ब्रह्मा के पैदा किये हुए हैं, पर गुण और दोषों को विचारकर वेदों ने उनको अलग- अलग कर दिया है। वेद, इतिहास और पुराण कहते हैं कि ब्रह्मा की यह सृष्टि गुण-अवगुणों से सनी हुई है ॥२॥
Meaning : The good as well as the vile, all have been brought into being by the Creator , Brahma ji; it is the Vedas that have differentiated them by reckoning the merits of the former class and the demerits of the other. The Vedas, the Historical Stories (such as the Ramayan and the Mahabharat) and the Puranas unanimously ( without opposing) has declare that the creation of Brahma (the Creator) is an intermixture of good and evil.

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चौपाई ३ : दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती ॥
दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू ॥
चौपाई ४ : माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा ।।
कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा ॥
चौपाई ५ : सरग नरक अनुराग बिरागा । निगमागम गुन दोष बिभागा ॥
[ सुजाति = अच्छी जाती , कुलीन। कुजाती = नीच जाती। दानव = दक्ष की कन्या ‘दनु’ के पुत्र कश्यप से उत्पन्न हुए असुर। अमिअ = अमृत। सुजीवनु = सुंदर जीवन। माहुरु = विष। मीचू = मृत्यु। लच्छि = लक्ष्मी। रंक = दरिद्र। अवनीसा = अवनी+ईश = पृथ्वी का स्वामी , राजा। महिदेव = ब्राह्मण। गवासा = गऊ को खाने वाले, कसाई , मलेच्छ। सरग = स्वर्ग। बिभागा = भाग , अलग अलग करके दिए। ]
भावार्थ : दुःख-सुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु–असाधु, सुजाति-कुजाति, दानव-देवता, ऊँच-नीच, अमृत-विष, सुजीवन (सुन्दर जीवन)– मृत्यु, माया– ब्रह्म, जीव-ईश्वर, सम्पत्ति-दरिद्रता, रंक-राजा, काशी-मगध, गङ्गा-कर्मनाशा, मारवाड़-मालवा, ब्राह्मण कसाई, स्वर्ग-नरक, अनुराग-वैराग्य, [ये सभी पदार्थ ब्रह्मा जी की सृष्टि में हैं। वेद शास्त्रों ने उनके गुण-दोषों का विभाग कर दिया है॥ ३-५॥
Meaning : It is characterized by pairs of opposites such as pain and pleasure, sin and merit, day and night, the good and the wicked, good birth and vile birth, demons and gods, the high and the low, nectar and poison, a happy life and death, Maya (illusion) and Brahma, i.e., Matter and Spirit, the soul and God (the Lord of the universe), plenty and poverty, the pauper and the king, the sacred Kashi or Varanasi and Magadha or North Bihar (the accursed land), the holy Ganga - the river of the celestials and the unholy Karmanasa (in Bihar), the desert land of Marvar (Western Rajputana and Sindha) and the rich soil of Malava, the Brahmin - who is a veritable god on earth and the barbarian ( a wild person with no culture) who feeds on the cow, heaven and hell, attachment and dispassion. The Vedas and other sacred books have sifted good from evil.

दोहा ६ : जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार ॥६॥
[ बिस्व = संसार। करतार = परमेश्वर। पय = दूध। बारि = जल। बिकार = दोष। गहहिं = गृहण करना। जड़ = जीवित प्राणी , जैसे मनुष्य , पशु इत्यादि। चेतन = अजीवित प्राणी जैसे टेबल , कुर्सी इत्यादि]
भावार्थ : विधाता ने इस जड-चेतन विश्व जिसमे जीवित और अजिवित प्राणी दोनो रहते है उनको गुण और दोषमय रचा है; किन्तु संत रूपी हंस दोष रूपी जल को छोड़कर गुण रूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं (दूध में जब पानी मिला दिया जाता है , तो पानी दूध की गुणवत्ता को कम कर देता है , इसीलिए यहां पानी को खराब माना गया है) (इसीलिए ऐसा कहा है कि जैसे हंस दूध पीकर पानी अलग कर देते है , वैसे ही संत भी गुण को ही ग्रहण करते हैं दोष को नहीं)॥६॥
Meaning : God has created the universe consisting of living and non living beings and has added some good and bad qualities at a certain level, in both good and evil. But just as swans in the form of saints drink the milk separating it from water , saints gain good qualities although being with bad people. (When we mix water in milk , because water reduces the properties of milk , that's why here water is treated as bad.)


चौपाई १ : अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता ॥
काल सुभाउ करम बरिआईं। भलेउ प्रकृति बस चुकड़ भलाईं ॥
[ राता = लगता है। बरिआईं = जबरदस्ती। प्रकृति = माया। ]
भावार्थ :विधाता जब अपने भक्तों को इस प्रकार का अर्थात् हंस के जैसा विवेक देता हैं, तब दोषों को छोड़कर, मन आखिरकार गुणों में अनुरक्त हो ही जाता है। परंतु फिर भी काल (समय), स्वभाव और कर्म की प्रबलता से (अर्थात् जब बुरे कर्मों का प्रभाव भी ज्यादा होता है तब), भले लोग भी माया के वश में होकर कभी-कभी भलाई से चूक जाते हैं , और बुरा काम ही करते हैं॥ १॥
Meaning : When God blesses someone with such a quality like as of a swan, then eventually the mind of Saint abandon baf qualities and adopt of good qualities. But sometimes by force of the spirit of the times, old habits and past Karma, even that good person departs from his own established good quality under the influence of Maya, and finally does the bad work.


चौपाई २ : सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं ।॥
खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू । मिटड़ न मलिन सुभाउ अभंगू ॥
[ अभंगू = ना भंग होने वाला। दलि = नाश करके। ]
भावार्थ : भगवान् के भक्त जैसे उस चूक को सुधार लेते हैं और अपने उन अतीत के बुरे कर्मों से मिले दुःख दोषों को मिटाकर फिर निर्मल यश पा लेते हैं, वैसे ही दुष्ट भी कभी-कभी उत्तम सङ्ग पाकर भलाई ही करते हैं; परन्तु उनका कभी भंग न होने वाला मलिन स्वभाव नहीं मिटता॥ २ ॥
Meaning : But just as devotee of Shri Hari , improve their mistakes and, removing sorrow and weakness gain due to past bad karma, they bring achieve great glory for them. Well sometimes even the wicked do some good works because of their involvements with the good people, but still their bad nature, which is unchangeable, is not vanished .


चौपाई ३ : लखि सुबेष जग बंचक जेऊ । बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ ॥
उघरहिं अंत न होइ निबाहू । कालनेमि जिमि रावन राहू ।।३।।
[ लखि = देखकर। सुबेष = सुंदर वेष। बंचक = ठगने वाला। जेऊ = जो भी। प्रताप = महिमा। पूजिअहिं = पूजे जाते है। तेऊ = वे भी। उघरहिं = खुल जाते हैं। निबाहू = निर्वाह। ]
भावार्थ : जो साधु का वेष बनाकर लोगों को ठगते हैं , उन्हें भी ये अच्छा सा साधु का वेष बनाये देखकर , और साथ ही उस वेष के प्रताप के कारण ये जगत् उन्हें पूजता है; परन्तु एक-न-एक दिन उनका सच सामने आ ही जाते हैं , अर्थात् अन्त तक उनका कपट नहीं चलता। बिलकुल वैसे ही जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हाल हुआ ॥३॥
Meaning : Even those who are impostors , means the demons who take the form of sadhu and rob people, they too are respected because of their form. But at the end of the day , they are exposed because their false appearance don't last , till the end of the day, just like Kalnemi , Ravan and Rahu.


चौपाई ४ : किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू । जिमि जग जामवंत हनुमानू ।।
हानि कुसंग सुसंगति लाहू । लोकहुँ बेद बिदित सब काहू ॥४।।
[ किएहुँ = करने पर भी। सनमानू = सम्मान। बिदित = मालूम। काहू = किसी को। ]
भावार्थ : बुरा वेष बना लेने पर भी, इस संसार में साधु का सम्मान वैसा ही होता है, जैसे जाम्बवान् और हनुमान्जी का हुआ। बुरे संग से हानि और अच्छे संग से लाभ होता है, यह बात ना केवल वेद में लिखी हुई है बल्कि तीनों लोकों में सब इसे जानते हैं॥ ४॥
Meaning : The good are honored inspite of their bad appearance, just as Jambhavan (a general of Sugriva’s army, who was endowed with the form of a bear and possessed miraculous strength) and Hanuman ji (the monkey-god) got honoured in this world. Bad association is harmful, while good company is an asset in itself: not only world knews it but Vedas also says it.


चौपाई ५ : गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा ॥
साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं ॥
[ गगन = आकाश। रज = धूल। पवन = वायु। प्रसंगा = साथ। कीचहिं = कीचड़ में। सदन = घर। सुक = तोता। सारीं = मैना। गनि = गिन गिनकर अर्थात् बुरी से बुरी और बहुत अधिक। गारीं = गाली। ]
भावार्थ : पवन के संग से धूल आकाश पर चढ़ जाती है और वही नीचे की ओर बहनेवाली धूल जल के संग से कीचड़ में मिल जाती है। साधु के घर के तोता मैना राम-राम सुमिरते हैं और असाधु के घर के तोता-मैना गिन-गिनकर गालियाँ देते हैं ॥५॥
Meaning : Through contact with the wind dust ascends to the sky, while it gets mixed in the mud when united with low-lying waters. Parrots and Maina’s which are nurtured in the house of the virtuous repeat the name of Ram while that of wicked pour a volley of abuses respectively.


चौपाई ६ : धूम कुसंगति कारिख होई । लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई ॥
सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता ॥
[ धूम = धुआं। कारिख = कालिख। मसि = स्याही। अनिल = वायु। संघाता = साथ से। जलद = मेघ। जीवन = प्राण। ]
भावार्थ : कुसंग के कारण हो धुआँ कालिख कहलाता है, वही धुआँ [सुसंग से] सुन्दर स्याही होकर पुराण लिखने के काम में आता है और वही धुआँ जल, अग्नि और पवन के संग से जब बादल होकर जगत् को जीवन देनेवाला बन जाता है ॥ ६ ॥
Meaning : When Smoke comes in contact with an evil earthy substance it turns into the soot; the same smoke when comes in contact with good substance it turns into ink and used for writing the Puranas . further , when same smoke comes in contact with water, fire and air it gets transformed into a cloud and gives life to the world.





दोहा ७ : ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग ॥ ७ (क) ॥
दोहा ७ : सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।
ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह ॥ ७ (ख) ॥
[ ग्रह = जिन बिम्बों की आकाश में गति है। (9 ग्रह होते है , रवि , सोम , मंगल , बुध , गुरु , शुक्र , शनि , राहु और केतु। भेषज = औषधि। पट = वस्त्र। कुजोग = बुरे का संग। सुजोग = अच्छे का संग। कुबस्तु = बुरे पदार्थ। सुबस्तु = अच्छा पदार्थ। सुलच्छन = भली प्रकार लखनेवाले। पाख = पक्ष। दुहुँ = दोनों में। प्रकास = उजाला। पोषक = बढ़ानेवाला। सोषक = घटानेवाला। ]
भावार्थ : ग्रह, ओषधि, जल, वायु और वस्त्र- ये सब भी समय समय पर कुसंग और सुसंग पाकर संसार में बुरे और भले पदार्थ हो जाते हैं। चतुर एवं विचारशील पुरुष ही इस बात को जान पाते हैं ॥७(क)॥ महीने के दोनों पखवाड़ों में उजियाला और अँधेरा समान ही रहता है, परन्तु विधाता ने इनके नाम में भेद कर दिया है (एक का नाम शुक्ल और दूसरे का नाम कृष्ण रख दिया)। एक को चन्द्रमा का बढ़ानेवाला और दूसरे को उसका घटानेवाला समझकर जगत्ने एक को सुयश और दूसरे को अपयश दे दिया ॥ ७ (ख) ॥
Meaning : Planets, medicines, water, air and clothes - all these things also gain become bad and good qualities are coming in contact with good and bad things in the world. Only smart and intelligent men will able to understand what i am saying. Light and darkness remains the same in both the fortnights (14-14 days) of the month, but the Creator has made a difference in their names (one was named Shukla and the other was named Krishna). in which the size of the moon get rises in one and in the other it gets decreases, the world has said good luck to one and bad luck to the other.

