
विषय १ : मंगलाचरण

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श्लोक १ : वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ॥ १ ॥
[ वर्णानाम–अर्थ–संघनाम= अक्षरों और अर्थ समूहों । छंद–साम–अपि = छंदों के भी। कर्त्तारौ = करने वाले दोनों। ]
भावार्थ : र, आ, म, इन तीन अक्षरों के मिलने से एक शब्द बनता है. शब्दों को जोड़ देने से वाक्य बनता है. फिर जब वर्ण और मात्रा की संख्या के साथ विराम और गति के नियम को ध्यान में रखकर किसी वाक्य को पद के रूप में रचा जाए, तो छंद बनता है. और काव्य नौ रस से मिलकर बनते है - श्रृंगार, हास्य, करुण, क्रोध, वीर, भय, वीभत्स, आश्चर्य और शांत। इस प्रकार जब अक्षर शब्द बनकर नौ रस में समाकर हमारे मुख से छंद या वाक्य के रूप में बाहर निकलते है , तो उन्हें कहा जाता है “वाणी”। सभी का कल्याण करनेवाली उस वाणी की देवी सरस्वती जी की मैं वंदना करता हूँ, साथ ही इस शुभ कार्य को शुरू करने से पूर्व मैं भगवान गणेशजी की भी मैं वंदना करता हूँ॥1॥
Meaning : 3 letters joins to form a word, which has a certain meaning . for example, R,A,M joins and form RAM which means Lord Ram. Poem is created with the help of 9 ras or feeling , which are - Shringara (love), Hasya (laughter), Karuna (compassion), Raudra (anger), Veera (heroism), Bhayanaka (fear), Bibhatsa (disgust), Adbhuta (wonder), and Shanta (peace) and named Chhand in this shlok. In this way, when letter combines to form words, creating a certain meaning and when they comes out from the mouth after mixing in a ras, it is called Vaani or Sound. I worship Maa Saraswati ji, the Goddess of Speech , who does the well being of everyone , and also Lord Ganesh, who is always worshipped before the beginning of any good work .


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श्लोक २ : भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥2॥
[ याभ्याम = जिन दोनों के। पश्यन्ती = देखते है। सिद्धा: = सिद्ध लोग। स्व–अन्त: स्थम–ईश्वरम = अपने अंतः करण में स्थित ईश्वर को। ]
भावार्थ : तुलसीदास जी ने पिछले श्लोक में ज्ञान और बुद्धि की वंदना कर फिर इस श्लोक में भगवान शिव और पार्वती जी को श्रद्धा और विश्वास का रूप मानकर उनकी पूजा की है। क्योंकि वे कहते है कि , अज्ञान का नाश और ज्ञान की प्राप्ति, बिना श्रद्धा और विश्वास के नहीं हो सकती। श्री कृष्णा भी गीता के चौथे अध्याय और उनचालीसवे श्लोक में कहते है कि - श्रद्धावान पुरुष ही ज्ञान को प्राप्त होता है। सिद्ध पुरुष भी श्रद्धा और विश्वास के बिना अपने मन में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते।
Meaning : After worshiping Knowledge and Intelligence in the previous stanza, now in this second stanza , Tulsidas ji Worships Lord Shiva and Parvati ji considering them as the form of belief and faith respectively. Because the destruction of ignorance and attainment of knowledge cannot happen without faith and belief. Shri Krishna in the 4th Adhyay and 39th Shlok of Geeta says that - Only a devoted man attains knowledge. One cannot become a yogi or a skilled person (in that particular work) unless he had belief and faith in himself/herself.
श्लोक ३ : वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते ॥ ३॥
[ बोधमयं = ज्ञानस्वरूप। नित्यम = नाशरहित। यमाश्रितो = यम+आश्रित = जिनके आश्रित होकर। हि = निश्चय ही। वक्रोऽपि = वक्र: + अपि = टेढ़ा भी। वन्द्यते = वन्दना किया जाता है। ]
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भावार्थ : तुलसीदास जी ने इस श्लोक में भगवान शंकर जी को ज्ञान का स्वरूप और नाशरहित कहकर , उन्हें अपना गुरु माना है, और उनकी वंदना करते हुए कहा है कि , वह टेढ़ा चंद्रमा जो शुक्ल पक्ष की द्वितीय का चंद्रमा होता है जिसे ना राहू ग्रस्ता है, ना कोई पूजता है । लेकिन जब वो शिव जी के माथे पर शरण लेता है और स्वयं को शिव जी को समर्पित कर देता है , तो वही टेढ़ा चंद्रमा वंदनीय हो जाता है। इसी पर तुलसीदास आगे कहते हैं कि, जैसे शिवजी के ऊपर आश्रित होने से दूज का टेढ़ा चंद्रमा वंदनीय हो गया, वैसे ही मैं भी शिव जी को अपना गुरु मानकर, उनकी शरण में जाकर, खुद को उन उन्हें समर्पित करता हूं। ताकि मैं अज्ञानी शिष्य भी उनकी शरण में जाकर वन्दनीय हो जाऊं अर्थात ज्ञानी कहलाऊं।
Meaning : Here, Tulsidas ji worships lord Shankar ji calling him immortal and the form of knowledge and then considering him as his Guru ji further says that just like the curved moon which is the second day of Shukla Paksha from which neither Rahu is affected, nor does anyone worship it. But when, the same crooked moon takes shelter on the head of Lord Shiva or surrenders itself to him, then it is also worshipped. Tulsidas says In the same way, just as the moon of Duj becomes venerable by surrendering to Lord Shiv ji, similarly, I want myself to surrender and take shelter under my Lord Shiv ji, knowing him as my Guru ji, so that I, who is an ignorant disciple, under his guidance become venerable I.e. knowledgeable.
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श्लोक ४ : सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरी ॥४॥
[ गुणग्राम = गुणों का समूह , कथा। पुण्यारण्य = पुण्य+अरण्य= पुण्यों का वन। विहारिणौ = विहार करने वाले। विशुद्ध = अत्यंत शुद्ध। कवीश्वर : महर्षि वाल्मीकि जी। कपिश्वर = हनुमान जी ]
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भावार्थ : जिस प्रकार, वन में लगे पेड़ों की संख्या गिनी नहीं जा सकती , उसी प्रकार सीता जी और राम जी के गुणों की संख्या भी गिनी नहीं जा सकती, वो असीमित है। और सीताराम के गुणों से बने इस जंगल अर्थात् (इस राम कथा ) के पाठ और कथन में जिस प्रकार से हनुमान जी और वाल्मीकि जी सदा लीन रहते है , उसी पर तुलसीदास जी , हनुमान जी और वाल्मीकि जी की वंदना करते हुए कहते हैं कि , सीता जी और राम जी के गुण समूह के बने इस जंगल (रामायण) में हनुमान और वाल्मीकि जी सदा निवास (पाठ) किया करते है।
Meaning : Just like, it is impossible to count the number of trees in the jungle , in the same way ,it is impossible to count the good qualities of Sita ji and Ram ji. And because Hanuman ji and Valmiki ji are always busy in reciting Ram Katha , therefore Tulsidas ji while praying to both Shri Hanuman ji and Valmiki ji says that both of them always stays in the jungle (always recites Ramayan) made up of the good qualities of Sitaram ji.
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श्लोक ५ : उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करी नतोऽहं सीतां रामवल्लभाम् ॥ ५॥
[ उद्भव = उत्पत्ति, पैदा करना। स्थिति = पालन-पोषण। संहार = नाश। श्रेयस्करी = श्रेयः-करी-कल्याण करनेवाली को। नतोऽहं =नतः+अहं = अहं नतः अस्मि मैं नमस्कार करता हूँ। ]



भावार्थ : उत्पत्ति , स्तिथि और संहार , ये तीनों काम जो ब्रह्मा , विष्णु और महेश के है, वो यहां अकेली माता सीता जी के बताए गए हैं। क्योंकि माता सीता जी कोई और नहीं , बल्कि स्वयं देवी भगवती ही है । वही देवी भगवती जो श्रीमद् देवी भगवत पुराण के अनुसार पूरे संसार का मूल स्वरूप है, उन्हीं से सब जन्म लेते है और उन्हीं में लौट जाते है। ये बात सीता उपनिषद में भी कहीं गई है, कि सीता जी स्वयं देवी भगवती का ही एक रूप है, जिसने स्वयं त्रिदेव और उनकी पत्नियों का भी निर्माण किया है , और उन्हीं की मदद से श्रृष्टि की उत्पत्ति की है। तो यहां इस श्लोक में, तुलसीदास जी वही सीता जी के बारे में कहते है कि , हे माता , आप जो मनुष्य के सारे क्लेशों / विपत्तियों को हर लेती हो, सभी का कल्याण करती हो , और श्री राम जी की धर्म पत्नी हो, हे माता सीता जी मैं आपको हृदय से प्रणाम करता हूं।
Meaning : The Originator, Operator and destroyer, all these works which are to be done by Brahma, Vishnu and Mahesh are described here to be done by Mother Sita ji. And that is because, Mata Sita ji is none other than Goddess Bhagwati herself, the same Goddess Bhagwati who according to Shrimad Devi Bhagwat Puran is the original creator of the entire world, that is, everyone takes birth from her and returns to her only. It has also been said in Sita Upanishad that Sita ji herself is a form of Goddess Bhagwati, who has also created the Trinity gods and their wives, and with their help created the entire universe. Tulsidas ji, further praying to Sita ji says that , I salute to her who is the wife of Shri Ram ji and takes away all the troubles of human beings and does welfare to everyone.

श्लोक ६ : यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥6॥
[ यन्माया = जिसके माया के। वशवर्त्ति = वश+वर्त्ति ( आज्ञानुसार चलनेवाला)। विश्वमखिलम् = अखिलं+विश्वम् = सारा जगत् । ब्रह्मादिदेवासुरा = ब्रह्मादि+देव+असुराः = देवता और असुर। यत्सत्त्वादमृपैव = यत्+सत्त्वात् = जिसकी सत्ता से। अमृषा = यथार्थ। एव = ही। सत्त्व = सत्ता। अस्तित्व = होने का भाव। भाति = प्रतीत होता है। रज्जौ = रज्जु रस्सी में। यथाऽहेर्भमः = यथा+अहेः+भ्रमः- जैसे साँप का भ्रम। भ्रम = सन्देह / किसी पदार्थ को कुछ-का-कुछ समझना। यत्पादप्लव+यत्+पाद+प्लव = जिनकी चरण नाव हैं। एक = एकमात्र। एव = केवल यही।हि = निश्चय ही। भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां = भव+अम्भोधेः+तितीर्षावतां = भव-संसार (अर्थात् संसार में बारम्बार जन्म लेना और मरना)। अम्भोधि: = समुद्र । तितीर्षावताम् = तरने वा पार जाने की इच्छा करने वालों को। तमशेषकारणपरम् = तम्+ अशेष+कारण+परम् = सम्पूर्ण कारणों से परे = सब कारणों का कारण (सबसे श्रेष्ठ परम तत्त्व ब्रह्म)। रामाख्यमीशं = राम+ आख्यं+ईशम् = राम नाम वाले समर्थ। हरिम् = भक्तों के मन को हरनेवाले भगवान् । ]
भावार्थ : जिनकी माया के वश में सम्पूर्ण विश्व है , जिसमें ब्रह्मा जी, अन्य देवता सहित सारे असुर भी आते हैं। वो जो इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड के प्रधान ईश्वर है। उदाहरण के तौर पे , जैसे रात के अंधेरे में रस्सी कभी कभी , हमारे भ्रमित हो जाने के कारण सांप की तरह दिखाई देती है , पर वास्तव में होती वो रस्सी ही है , वैसे ही यह संसार जो हमें सच लगता है , परंतु वास्ताव में ये एक मायावी और रचा हुआ संसार है, जो उस परमात्मा द्वारा बनाया गया है , जी हां ये वास्तविक नहीं है। और इस मायावी संसार से (जिसे भवसागर भी कहा जाता है) दूर जाने का एक ही रास्ता (नाव) है, और वो है भगवान श्री हरि के चरणों की वंदना करना। क्योंकि भगवान श्री हरि , सभी कारणों के कारण भी है और कर्ता धर्ता भी , अर्थात् इस संसार में जो भी घटित होता है, वही करवाते है, उन्हीं की आज्ञा से होता है। तो इस प्रकार तुलसीदास जी , उस परमात्मा अर्थात् भगवान विष्णु जी की अद्भुत व्याख्या और प्रशंसा करते हुए कहते है कि, उन सबसे श्रेष्ठ , राम कहलाने वाले , भक्तों के मन को हरने वाले, भगवान श्री हरि की मैं हृदय से वन्दना करता हूं।
Meaning : The entire world , i.e. Demons including Brahma ji and all the other gods are under the control of his maya, Because He is the supreme God of this entire universe. And just as in the darkness of the night, a rope sometimes appears like a snake due to our confusion, but in reality it is a rope, similarly this world which seems real to us but is actually an illusory and created world, is actually created by God, it's not real. And there is only one boat (way) to come out from this illusory world which is also called the mundane existence, and it is to worship the feet of Bhagwan Shri Hari, who is the cause of all causes and is the doer, i.e. whatever happens in this world, he himself makes it happen (it happens only and only with his permission). And thus praising Bhagwan Vishnu, Tulsidas ji says that, I worship Bhagwan Shri Hari, who conquers the minds of the devotees, who is the best of all the gods, and who is also called by the name of Shri Ram. I bow down and pay reverence to him.

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श्लोक ७ : नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा
भाषानिबन्धमतिमंजुलमातनोति॥7॥
[ पुराण = कृष्णद्वैपायन अर्थात वेद व्यास जी के द्वारा बनाए गए १८ पुराण। निगम = वेद , जो चार है (ऋग्वेद , यजुर्वेद ,सामवेद , अथर्ववेद) । आगम = शिवजी के मुख से निकला हुआ और पार्वती जी के कानों में पड़ा हुआ और वासुदेव भगवान का जिसमें सम्मत (सहमत) है उसे “आगम” कहते है। सम्मतं = सहमत। यद्रामायणे = रामायण में। निगदितं = कहा हुआ है। क्वचिदन्यतोऽपि = क्वचित्+अन्यत:+अपि = कुछ किसी और स्थान से या कहीं और से भी। स्वान्तः = स्व+अंत: = अपने अंत: करण के। भाषानिबन्धमतिमंजुलमातनोति = निबन्धम = अति +मंजुल+आतनोति = अत्यंत सुंदर निबंध विस्तार करता है अर्थात बनाता है। निबंध = वह व्याख्या या काव्य जिसमे अनेक मतों का संग्रह हो। ]
भावार्थ:- रामचरितमानस लिखने के लिए , पहले तो तुलसीदास जी ने अनेक वेद, पुराण और शास्त्र पढ़कर उनसे अनुभव लिया , जिसमें सही और प्रमाणित जानकारी थी। फिर वो रामायण जो शिव जी ने पार्वती जी को सुनाई थी उससे भी प्रेरणा ली। फिर उन्होंने वाल्मीकि जी के द्वारा लिखी रामायण को आधार बनाया। इसके बाद कुछ अन्यत्र अर्थात दूसरे महान ग्रंथों में जो भी ज्ञान और विज्ञान उपलब्ध था उसे ध्यान में रखकर , और अंत में कुछ महान पुरुषों के मतों को भी ध्यान में रखकर, इन सभी को एक रचना दी। और इस प्रकार से तुलसीदास जी ने अपने मन के सुख के लिए, श्री रघुनाथजी की कथा को अत्यन्त सुंदर भाषा में विस्तृत करके रामचरितमानस लिखी ॥7॥
Meaning : Verifying from all the Puranas, Vedas including all the Hindu scriptures and also taking Ramayana as the base of all the stories , he also took information available from elsewhere like great granths and great Muni’s perception. And in this way , as said by Tulsidas ji himself , he created this story of Shri Raghunathji in a very beautiful language just for his inner happiness.
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सोरठा १ : जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।
करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥1॥
[ जो = जिसे। सुमिरत = स्मरण मात्र से। सिधि = कामना की पूर्ति। गन नायक = गणों के नायक, गणेश जी। करि = हाथी। बर = सुंदर। बदन = मुख। बुद्धि रासि = बुद्धि के राशि / भंडार। ]
भावार्थ:- जिन्हें स्मरण करने से ही सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं, जो गणों अर्थात् सभी लोगों के स्वामी हैं और सुंदर हाथी के मुख वाले हैं, जो बुद्धि के भंडार है और शुभ एवं उत्तम गुणों के धाम है , वे श्री गणेशजी मुझ पर कृपा करें॥1॥
Meaning : By just remembering him, all the works are accomplished, who is the leader of people, and has a beautiful face of elephant, who is the storehouse of knowledge , Abode of best qualities , and who removes the ignorance , the one and only Shri Ganesh ji, i want him to please bless me.






सोरठा २ : मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन।
जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन॥2॥
सोरठा ३ : नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन।
करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन॥3॥
[ मूक = गूंगा। बाचाल = वाचा+अल = बहुत बोलने वाला। पंगु = जिसके पैर न हो। गिरिबर = बड़े बड़े पर्वत। गहन = गंभीर ।गिरिबर गहन = बड़े दुर्गम पर्वत। कलि मल दहन = पापों को जला डालने वाले।
सरोरुह = सर+रूह = सरसे उत्पन्न। स्याम = श्याम / सांवला शरीर। तरुन = तुरंत ही का पूरा खिला हुआ। अरुन = लाल। बारिज = वारि+अज = जल से उत्पन्न (कमल)। छीरसागर = दूध का समुद्र। सयन = शयन। ]
क्षीरसागर सात प्रधान समुद्र में से प्रधान माना गया है , जिसमे नारायण शयन करते हैं।
भावार्थ:- जिनकी कृपा से गूँगा बहुत सुंदर वाणी बोलने लगता है और लँगड़ा-लूला दुर्गम अर्थात् कठिन से कठिन पहाड़ पर चढ़ जाता है, वे कलियुग के सब पापों को जला डालने वाले दयालु भगवान श्री हरि मुझ पर दया करें॥2॥ जो नीले कमल के समान दिखते है और रंग में श्यामवर्ण अर्थात् सांवले रंग के हैं, जिनके नेत्र तरुण कमल अर्थात जल से उत्पन्न हुए और तुरंत ही नए-नए खिले हुए लाल कमल के रंग के समान हैं और जो सदा क्षीरसागर (अर्थात् सात प्रधान समुद्र में से प्रधान समुद्र) में शयन (निवास) करते हैं, वे भगवान् नारायण मेरे हृदय में निवास करें॥3॥
Meaning : By whose blessing even the dumb is able to speak beautiful words, and the one handicap from leg is able to climb the hard mountains, the one who burns all the sins of the kaliyug, Shri Hari, the merciful bhagwan please be kind to me. 2 .He, the one who is swarthy like a blue lotus, who has eyes like the newly blown red lotus, which has been recently manifested from water , and he who always lives in an kshirsagar (Which is the prime of all the 7 prime oceans), that Bhagwaan Narayan please come and stay in my heart.3.



सोरठा ४ : कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन।
जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन॥4॥
[ कुंद = कुन्दका फूल। कुन्द जुही की तरह का एक पौधा है जिसमें श्वेत फूल होता है। यह कुआर से चैत तक फूलता रहता है। इसका फूल उज्ज्वल, कोमल और सुगन्धित होता है। इंदु = चन्द्रमा। सम = समान। उमारमन = उमार+मण= पार्वती पति / शिवजी । करुना = करुणा = मनका वह विकार जो दूसरे का दुःख देखकर उत्पन्न होता है और उसके दुःख को दूर करने की प्रेरणा करता है । अयन = घर। नेह = स्नेह, प्रेम। मर्दन = नाश करनेवाले। मयन = कामदेव ।]
भावार्थ:- जिनका कुंद के फूल और चन्द्रमा के समान (गौर) गोरा शरीर है, जो पार्वतीजी के प्रियतम और दया के धाम हैं और जिनका (दीनों) दुःखी लोगों पर स्नेह है, वे कामदेव को मारने वाले शंकरजी मुझ पर कृपा करें॥4॥
Meaning : The one who has the body like Jasmine flower and Moon, who is the consort (husband) of Parvati ji and the abode of Kindness, the who loves to those who are suffering from pain, the one who killed Kaamdev, (Shri Shankar ji) please bless me.