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विषय ८ : कवि वंदना

चौपाई २ : चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे ॥ 

कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा ॥ 

 

भावार्थ : मैं उन सभी श्रेष्ठ कवियों के चरणकमलों में प्रणाम करता हूँ, वे मेरे सब मनोरथों को पूरा करें।  मैं कलियुग के भी उन कवियों को भी प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने श्रीरघुनाथजी के गुणसमूहों का वर्णन किया है॥ २॥

 

Meaning : bowing down to the lotus like feet of all those great poets, i will request them to fulfill all my wishes. I will also pay my respects to those poets of Kaliyuga who have described the qualities of Shri Raghunathji.

चौपाई ३ : जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने ।। 

भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें। प्रनवउँ सबहि कपट सब त्यागें ।।३।।

 

(प्राकृत = साधारण , लौकिक ( अर्थात् प्राकृतिक हूं से विशिष्ट)। भए = हुए। (अर्थात हमारे पहले जो हो गए हैं, जैसे चंद कवि , जो भाषा के आदि कवि हुए जिनका पृथ्वीराज रासो प्रसिद्ध ग्रंथ है।) अहहिं = (वो कवि जो) आजकल हमारे समय में मौजूद है। होइहहिं = आगे होंगे।

 

भावार्थ : जो बड़े बुद्धिमान् प्राकृत कवि हैं (अर्थात् जो वेद व्यास जैसे दिव्य नहीं है), जिन्होंने (अपनी अपनी) भाषा में हरि चरित्रों का वर्णन किया है, जो ऐसे कवि पहले हो चुके हैं, जो इस समय वर्तमान हैं और जो आगे होंगे, उन सबको मैं सारा कपट त्याग- कर प्रणाम करता हूँ ॥३॥

 

Meaning :  Even those poets of supreme wisdom who belong to the Prakrta or popular class (means those are ordinary poets not divine like Ved Vyas and Valmiki ji ,), who have narrated the exploits of Shri Hari in the spoken language, including those who have flourished in the past, those who are still living and those who are yet to come, I reverence them, one and all, renouncing all false appearance.

( प्राकृत : प्रकृति इस शब्द के दो अर्थ लिए गए हैं। इसीलिए यह भी बताना आवश्यक है कि प्राकृत भाषा कौन है। ईसवी सन 300 वर्ष पूर्व अर्थात आज से 2300 वर्ष पूर्व भाषा प्रकृत रूप में आ चुकी थी। पूर्वी प्रकृति पाली भाषा के नाम से प्रसिद्ध हुई। संस्कृत के विकृत और वर्तमान हिंदी के प्रारंभिक अवस्था का नाम प्रकृति था। 

 

चंदबरदाई के पहले तथा 16वीं शताब्दी के आसपास तक सर्वथा प्रकृति में कविता होती थी। जैन ग्रंथ तथा अनेक बौद्ध ग्रंथ भी प्राकृत ही में है। वर्तमान हिंदी अर्थात और सैनिक (ब्रजभाषा) अवधी और मागधी आदि का सम्मिश्रण ही भाषा है।

 

कपट क्या है? : ऊपर से प्रणाम करना और भीतर से बराबरी का अभिमान रखना कि ये भाषा के कवि हैं और हम भी तो भाषा के कवि हैं यही कपट है। छल से प्रणाम नहीं करते कि मेरी कविता की निन्दा न करें, बल्कि सद्भाव से प्रसन्न होने के लिये प्रणाम करते हैं। आगे होनेवाले कवियों को प्रणाम किया, इससे लोग यह अनुमान न करें कि छोटे को प्रणाम क्यों किया, अतएव ऐसा कहा कि छोटाई-बढ़ाई या ऊँच-नीचका भेद न रखकर वन्दना करता हूँ।)

चौपाई ४ : होहु प्रसन्न देहु बरदानू । साधु समाज भनिति सनमानू ॥ 

जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं ॥४।।

 

भावार्थ : आप सब प्रसन्न होकर यह वरदान दीजिये कि साधु-समाज में मेरी कविता का सम्मान हो; क्योंकि बुद्धिमान् लोग जिस कविता का आदर नहीं करते, मूर्ख कवि ही उस कविता की रचना का व्यर्थ परिश्रम करते हैं ॥४।।

 

Meaning : Please be grateful and bestow upon me the blessing , that my song get heard among a group of religious people. Because , A work that the intelligent people do not value is a pointless endeavor that only foolish poets attempt.

चौपाई ५ : कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई ॥ 

राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा ॥

 

भावार्थ : कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है जो गङ्गाजी की तरह सबका हित करनेवाली हो। श्रीरामचन्द्रजी की कीर्ति तो बड़ी सुन्दर (सबका अनन्त कल्याण करनेवाली ही) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है। यह असामञ्जस्य है (अर्थात् इन दोनों का मेल नहीं मिलता), इसीकी मुझे चिन्ता है ॥ ५ ॥ 

 

Meaning : Only that glory, poetry and Money are best , that are used for the good of everyone, just like the celestial Ganga river, which removes the sins of all the people. The glory of Shri Ram is very beautiful, and my poem is very bad. That's the reason I am afraid as both of them don't match with each other.

चौपाई ६ : तुम्हरी कृपाँ सुलभ सोउ मोरे। सिअनि सुहावनि टाट पटोरे ।। 

 

भावार्थ : परन्तु हे कवियो! आपकी कृपासे यह बात भी मेरे लिये सुलभ हो सकती है। रेशम की सिलाई, टाट अर्थात् जिससे बोरियां बनती है , उनपर भी सुहावनी लगती है ॥ ६ ॥

 

Meaning : But O dear Poets, by your blessings, even this could turn out to be good for me. The embroidery of silk looks charming even on coarse cloth.

दोहा १४(क) : सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान। 

सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान ॥ १४ (क) ॥

 

भावार्थ : चतुर / होशियार पुरुष उसी कविता का आदर करते हैं, जो सरल हो, जिसमें निर्मल / अच्छे चरित्र का वर्णन हो तथा जिसे सुनकर शत्रु भी स्वाभाविक वैर (शत्रुता के स्वभाव) को भूलकर सराहना करने लगें ॥ १४ (क) ॥

 

Meaning : The intelligent people admire only that poetry which is not only simple , but also portraying character is pure  and listening which even opponents applaud forgetting their natural animosity.

दोहा १४(ख) : सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर।

करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर ॥ १४ (ख) ॥

 

भावार्थ : ऐसी कविता बिना निर्मल बुद्धि के कहां बनती और मेरे बुद्धि का बल तो बहुत ही थोड़ा है। इसलिये बार-बार निहोरा करता हूँ (अर्थात आपसे ये कहते हुए बार बार विनती करता हूं) कि हे कवियो! आप मुझपर कृपा करें, जिससे में श्री हरि यश का वर्णन कर सकूँ ॥ १४ (ख) ॥

 

Meaning : Such poetry is impossible to make without a pure and intellectual mind, and I am not that intelligent. That's why I request you again and again , so that I could describe the glory of Shri Hari.

दोहा १४(ग) : कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल।

बालबिनय सुनि सुरुचि लखि मो पर होहु कृपाल ॥ १४ (ग) ॥

 

भावार्थ : हे कवि और पण्डितगण। आप, जो रामचरित्र रूपी मानसरोवर के सुन्दर हंस हैं, मुझ बालक की विनती सुनकर और मेरी इस कविता को बनाने की सुन्दर रुचि देखकर मुझपर कृपा करें ॥ १४ (ग) ॥

 

Meaning : O Poets and wise men, you are those lovely swans who are swimming in the Mansarovar lake of Shri Ram’s exploits! I request you to Please Hear the  prayer of this child (i.e. me)  and seeing my interest in making this poem . Please , be kind towards me.

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