
विषय २ : गुरु वंदना
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सोरठा ५ : बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर ॥ ५ ॥
[ बंदउँ = मैं पूजा करता हूं। कंज = कमल । महामोह = भारी मोह । मोह = अज्ञान। तम = अंधकार। पुंज = समूह। रबि = सूर्य। कर = किरण। निकर = समूह। ]
भावार्थ : मैं गुरु महाराज के चरण–कमल की वंदना करता हूँ, जिनकी कृपा समुद्र की तरह विशाल है और जो मनुष्य के रूप में स्वयं श्री हरि ही हैं। और जिस प्रकार सूर्य की किरणें अंधकार का नाश करती है। उसी प्रकार गुरु के वचन जो ज्ञान से भरपूर होते है वे शिष्य के मोह और अज्ञानता को दूर करते है ॥५॥
Meaning : I bow to the lotus like feet of my Guru ji, who is an ocean of mercy and also the human form of Shri Hari himself. Guru is the one whose words i.e. knowledge destroys complete ignorance, just like the sun rays destroys darkness.
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चौपाई १ : बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू ।।
[ पदुम = कमल। परागा= (कमल के संबध में) वह रज या धूल जो फूलों के बीच लंबे केसरों पर जमा रहती है अर्थात् पुष्परज। गुरु पद = गुरु जी के पैर। सुरुचि = सुंदर स्वाद। सुवास = सुगंध। सरस = रस सहित। सरस अनुरागा = अनुराग सुंदर रस है। अमिय = अमृत। अमियमुरि= अमरमुर (संजीवनी बूटी)। चूरन = सुखी पिसी हुई औषधि , जड़ी या बूटी। चारू = सुंदर। समन= नाश करने वाला। भव + रूज + परिवार= भव + रोग + परिवार ( काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मान, ममता , मत्सर, दम्भ , कपट , तृष्णा, राग, द्वेष इत्यादि) ]
भावार्थ : मैं गुरु महाराज के चरण कमलों की रज (अर्थात् धूल) की भी वन्दना करता हूँ, जिसका स्वाद, सुगन्ध और अनुराग रूपी रस , जासवंत के फूल के बीज की तरह परीपूर्ण होता है। वह धूल अमर मूल मतलब सजीवनी बूटी की तरह है , जैसे सञ्जीवनी बूटी ने लक्ष्मण जी को ठीक कर जीवन दान दिया था। उसी तरह गुरु के चरणों की धूल भी सुन्दर चूर्ण (चुरा) है, जो सम्पूर्ण “भव” मतलब सांसारिक रोगों – मोह, माया, क्रोध इत्यादि का नाश करती है और वास्तविकता से परिचय कराती है॥१॥
Meaning : I pray to the pollen-like dust of the lotus feet of my Guru ji, which is full of taste, fragrant and is flavored with love like as of the pollen seeds of hibiscus flower. Similarly the feet of Guru ji's dust is a lovely powder , which is just like the life-giving herb Sanjeevani buti , Just as Sanjeevani buti saved the life of Shri Laxman ji, similarly dust of guru's feet destroys diseases like anger , attachment of mundane existence.
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चौपाई २ : सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती ॥
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी ।।२।।
[ सुकृत = पुण्य। (धर्मशील : जो उत्तम रूप से किया गया हो)। सुकृत संभू तन = श्री शिव जी सुकृत रूप है। तन = शरीर। बिमल = निर्मल। विभूति = अंग में चढ़ाने की राख/ भस्म। मंजुल = सुंदर। मंगल = कल्याण। मोद = आनंद। प्रसूति = जननी / माता। जन = दास। मंजु = सुंदर। मुकुर = स्वच्छ दर्पण / आईना। मल = मैल। तिलक = टीका। ]
भावार्थ : यह गुरु जी के चरणों धूल , सुकृती मतलब पुण्यवान् पुरुष के माथे पे बिलकुल वैसे ही सुंदर लगती है जैसे शिवजी के शरीर पर निर्मल विभूति सुशोभित होती है, जो सुन्दर कल्याण और आनन्द की जननी है। ये भक्त के मन के मैल को दूर कर देती है, बिलकुल वैसे ही जैसे सुन्दर दर्पण से धूल हटा दी गई हो और यही विभूति जब तिलक के रूप में माथे पे लगती है तो ये अच्छे गुणों के समूह को अर्थात सकारात्मक उर्जा को एकत्रित कर, वश में करती है (और इंसान को चिन्ता मुक्त करती है)॥२॥
Meaning : It adorns the body of a Virtuous person just like white ashes beautify the body of Bhagwan Shiv ji, and brings forth sweet blessings and joys. It rubs the dirt off the devoteeís heart just like remove the dirt from the beautiful mirror ; and when applied to the forehead in the form of a Tilaka (a religious mark), it attracts a host of virtues i.e. it collects positive vibes.
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चौपाई ३ : श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियें होती ।।
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवड़ जासू ॥३।।
चौपाई ४ : उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के ॥
सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक ॥४।।
[ नख = नाखून। मनि गन = मणियों का समूह। जोती = ज्योति / प्रकाश। दिव्य दृष्टि = नेत्रों की दिव्य ज्योति / देखने को अलौकिक शक्ति। हियें = हृदय। दलन = नाश करने वाला। सो सु प्रकासु = वह सुंदर प्रकाश / सूर्य का प्रकाश। भाग = भाग्य। उघरहिं = खुलना। बिलोचन = दोनों नेत्र। ही = हृदय। बिलोचन ही = हृदय के दोनो नेत्र (ज्ञान , वैराग्य)। सूझहिं = दिखाई देना। मनि = बहुमूल्य रत्न (जैसे हीरा , पन्ना , मोती)। मानिक = लाल रंग का रत्न जो ‘लाल‘ कहलाता है। गुपुत = गुप्त / छुपा हुआ। खानिक = खान , खदान। खानि = वह स्थान जहां से धातु , पत्थर , रत्न आदि खोदकर निकले जाते हैं। ]
भावार्थ : श्री गुरु महाराज के चरण-नखों की ज्योति , मणियों के प्रकाश के समान होती है, जिसे मन में याद करते ही, हृदय में “दिव्य दृष्टि” उत्पन्न हो जाती है। चरण नखों का वह प्रकाश हमारे मन में अज्ञान के रूप में बसे अंधकार का नाश करता है ,और वो जिसके हृदय में आ जाता है , वो बड़ा भागशाली कहलाता हैं॥३॥ क्योंकि उसके हृदय में आते ही, हृदय के निर्मल नेत्र खुल जाते हैं, जिसके बाद जैसे रात्रि के दोष और दुख सुबह होते ही मिट जाते हैं, बिलकुल वैसे ही गुरु के ज्ञान से काम , मोह , मद , क्रोध इत्यादि नामक संसार के दोष भी दूर हो जाते हैं। जिसके बाद “श्रीरामचरित्र” नामक मणि और माणिक्य, जिस किसी रूप में हमारे मन के अंधेरे में छुपा होता है , वहां से प्रकट होकर ये सब दिखने लगता है और हम भी सद्गुण से भर जाते है।॥४॥
Meaning : The light of the nails of the feet of Guru ji is like the light of splendour gems which unfolds the divine vision of the heart by its very thought. The lustre (reflection) of that light (i.e. knowledge) disperses/finishes the shades of infatuation (ignorant), and highly blessed is that person in whose bosom it shines. With its very appearance the bright eyes of the heart get opened; the evils and sufferings of the mundane existence in the form of darkness of the night disappears ; after which the gems and rubies in the shape of stories of Shri Ram, both patent and hidden, wherever in and whatever mine they may be ( i.e. in greed or bad quality of person) , it means Shri Ram good forms that teaches us a good lesson comes out from there into the light.





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दोहा १ : जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान ॥ १ ॥
चौपाई १ : गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन ॥
तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन ॥१॥
भावार्थ : { जैसे आज कल जमीन के अंदर दबे सोने को निकालने के लिए गोल्ड डिटेक्टर्स का इस्तेमाल किया जाता है। वैसे ही पुरातन काल में “सिद्धांजन” नामक काजल का इस्तेमाल किया जाता था , जिसे यदि आंखों में लगाकर साधना की जाए , तो जमीन के अंदर दबे सोने जैसे इत्यादि वस्तुएं ढूंढी जा सकती था। } ईसीपर तुलसीदास कहते हैं कि, जैसे सिद्धाञ्जन , को नेत्रों में लगाकर , साधक (साधना करने वाला), सिद्ध (सिद्धि प्राप्त किया हुआ) और सुजान (ज्ञानी) , ये तीनों को ही , पर्वतों, वनों और पृथ्वी के अंदर बड़ी आसानी से बहुत-सी खानें दिख जाती हैं ॥१॥ उसी तरह , श्रीगुरु महाराज के चरणों की रज , कोमल और सुन्दर नयनामृत-अञ्जन (अर्थात् नेत्रों के लिए अमृत के समान काजल) है, वो नेत्रों के उन सांसारिक दोषों का नाश करती है जो बुरी राह पर ले जाते है और उस अञ्जन से मैं अपने नेत्रों को निर्मल करके ताकि मुझे केवल सत्य जी दिखाई दे और साथ ही अपने मन को भी विवेक में रख, मैं संसार रूपी बन्धन से छुड़ाने वाले “श्रीरामचरित्र” का वर्णन करता हूँ॥१॥
Meaning :For example, nowadays gold detectors are used to extract gold buried underground. Similarly, in ancient times, kajal called “Siddhanjan” was used, which if applied in the eyes and used for meditation, could find things like gold buried under the ground. On this, Tulsidas says that, just like by applying Siddhanjan in the eyes, the Yogu (one doing Sadhana), the Adepts (the one who has attained Siddha) and the knowledgeable man, all these three can easily see inside the mountains, forests and the earth.॥1॥ Similarly, the dust of Shri Guru Maharaj's feet is soft and beautiful kajal like nectar for the eyes, it destroys the worldly defects of the eyes which take us on the bad path and through that Anjan I Having purified my eyes so that I can see only the Truth and at the same time keeping my mind in my control, I narrate “Shri Ram Charitra” which frees me from the bondage of the world.

