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विषय ४ : खल वंदना

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चौपाई १ : बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ । जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ । 

पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें । उजरें हरष बिषाद बसेरें ॥१।।

 

[ बहुरि = इसके उपरान्त (अर्थात् सन्त वन्दना के पश्चात्)। खलगन = (खल समाज) दुष्टसमूह। सतिभाएँ = (सतभाव) सच्चे भावसे , उचित रीति से। काज = प्रयोजन / उद्देश्य। बिनु काज = व्यर्थ ही। (अर्थात् ऐसा करनेसे उनका कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता, कुछ भला नहीं होता तो भी)। दाहिनेहु = हितैषी। बाएँ = शत्रु । ]

 

भावार्थ : अब आगे, मैं सच्चे भाव से दुष्टों को प्रणाम करता हूँ, जो बिना किसी कारण, अपना ही हित करने वाले के विरुद्ध आचरण करते हैं। अर्थात् दूसरों के हित की हानि ही इनकी दृष्टि में लाभ है, और इनको दूसरों के उजड़ने में हर्ष और बसने में विषाद होता है ॥ १ ॥

Meaning : Now further , I greet with a sincere heart the malevolent class (evil people), who are hostile (against someone) without any purpose even to the friendly. For whom other’s loss is their gain, they delight in others' desolation (destruction ) and wail (cry badly due to sadness) over other's prosperity.

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चौपाई २ : हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से ॥ 

जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी ॥२।।

 

[ जस = यश का गुणगान। राकेस = राका+पूर्णिमा+ईश+चंद्रमा = पूर्ण चंद्र। अकाज = काम का बिगाड़ना। से = समान। लखहिं = दूसरों के लक्षणों को देखना। सहसाखी। = सहस+आंखी = हजार आंखें। घृत = घी। माखी = मक्खी। ]

 

भावार्थ : जो हरि और हर के यश रूपी “पूर्णिमा के चन्द्रमा” के लिये राहु के समान हैं अर्थात् जहाँ कहीं भी भगवान् विष्णु और शंकर जी के यश का वर्णन होता है (उनकी पूजा होती है), वे दुष्ट लोग उसी में बाधा डालते हैं। जो लोग दूसरों की बुराई करने में सहस्रबाहु के समान वीर हैं, वो दूसरों के दोषों को भी हजार आँखों से देखते हैं और दूसरों के हितरूपी घी के लिये इनका मन मक्खी के समान होता है (अर्थात् जिस प्रकार मक्खी , घी में गिरकर उसे खराब कर देती है और स्वयं भी मर जाती है, उसी प्रकार दुष्ट लोग दूसरों के बने बनाये काम को बिगाड़ने के लिए अपनी ही हानि कर लेते हैं)॥२॥

 

Meaning : Just as Rahu intercepts the light of the full moon , similarly those bad people try to create obstacles whenever there is the Pooja paath going of Bhagwan Vishnu and Bhagwan Shiva ji. And they are valiant (courageous) like the reputed king Sahastrabahu in working for other’s woe (distress) [Sahastrabahu was so called because of his possessing a thousand arms] . Further , those bad people are so bad that they detect other’s faults even with a thousand eyes , meaning if someone's fault is the size of the fly , still they show them as a mountain , and if their own fault is like the size of a mountain they will show it as like the size of a fly. Also they have made their mind in such a way that they act like a fly for others work which is like butter. Just as a fly when it falls into the butter spoils it , similarly bad people will intentionally destroy themselves just for other's loss.

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सनातन स्पेशल

सहस्त्रबाहु

।। राज्य के लिए तपस्या ।।

 

इनकें अन्य नाम सहस्त्रार्जुन, अर्जुन, कार्तवीर्य और हयहय भी हैं। यह राजा कृतवीर्य का पुत्र था, जिसकी राजधानी माहिष्मती नगरी थी। (जो नर्मदातट पर , दक्षिण में स्थित थी। अनूपदेश की यह राजधानी थी। कोई इस मण्डला को “माहिष्मती” बताते हैं, पर पुराणों से इसका नर्मदातट पर होना पाया जाता है।) वो राजा पहले बहुत धार्मिक एवं पवित्र विचारवाला था। कृतवीर्य के मरने पर जब इसको मन्त्रियों आदि ने राज्य पर बिठाना चाहा तब इसने उत्तर दिया कि 'राज्य भविष्य में नरक की ओर जा रहा है। जिस उद्देश्य से प्रजा से कर लिया जाता है, यदि उसका पालन न किया जा सके तो राज्य लेना व्यर्थ है। व्यापारी अपने वाणिज्य (व्यापार) के लिये यात्रा कर सकें, लुटेरोंद्वारा लूटे न जायें, प्रजा की रक्षा हो, चोर आदि उनकी सम्पत्ति न लें, इत्यादि के लिये ही कर लिया जाता है। यदि राजा कर लेकर रक्षा नहीं कर सकता तो इसका पाप राजा को होता है। यदि राजा वैश्यों से आयका अधिकांश भाग ले ले, तो वह चोर का कर्म करता है, उसके इष्ट और पूर्त कर्मों का नाश होता है। इसलिये जबतक मैं तपस्या करके पृथिवी के पालन की शक्ति न प्राप्त कर लूँ , जिससे अपने उत्तरदायित्व का पूर्ण निर्वाह कर सकूँ और पाप का भागी न रहूँ, तबतक में राज्य ग्रहण नहीं कर सकता।' यह सुनकर महर्षि गर्ग ने उनसे कहा कि राज्य का यथावत् पालन करने के लिये यदि तुम ऐसा करना चाहते हो तो दत्तात्रेय भगवान् , जो सह्यपर्वत की गुफा में रहते हैं उनकी आराधना करो।

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।। दत्तात्रेय जी से वरदान।।

 

गर्गमुनि के आज्ञानुसार सहस्त्रार्जुन श्रीदत्तात्रेयजी के आश्रम पर जाकर उनकी आराधना करने लगा। उनके पैर दबाते , उनके लिये माला, चन्दन, सुगन्ध, जल, फल आदि सामग्री प्रस्तुत करते ; भोजन के साधन जुटाते और जूठन साफ करते थे। उस राजा ने दस हजार वर्षों तक दुष्कर तपस्या करके दत्तात्रेयजी की आराधना की। जिससे प्रसन्न होकर पुरुषोत्तम दत्तात्रेयजी ने उसे चार वरदान दिए। (१) पहले तो राजा ने अपने लिये एक हजार भुजाएँ माँगी। (२) दूसरा , यह माँगा कि 'मेरे राज्य में लोगों को अधर्म की बात सोचते हुए भी मुझ से भय हो और वे अधर्म के मार्गसे हट जायें। (३) तीसरा , यह कि मैं युद्ध में पृथ्वी को जीतकर धर्म पूर्वक बल का संग्रह करूँ।' (४) चौथे वर के रूप में उन्होंने यह माँगा कि 'संग्राम में लड़ते-लड़ते मैं अपनी अपेक्षा श्रेष्ठ वीर के हाथ से मारा जाऊँ।' दत्तात्रेयजी ने उन्हें वरदान दे दिए और साथ ही एक सोने का विमान भी दिया। इसके बाद पृथ्वी के सभी प्राणियों पर उनका प्रभुत्व हुआ।

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।। ऋषि वशिष्ठ का श्राप।।

 

वह महान तेजस्वी राजा थे , एक बार तो उन्होंने अश्वमेधयज्ञ में अपने बाहुबल से जीती संपूर्ण पृथ्वी ब्राह्मणों को तक दे दी थी। एक बार की बात है, अग्नि देव ने उनसे भिक्षा मांग की और उन्होंने अपनी सहस्त्रभुजाओं के पराक्रम के भरोसे भिक्षा दी। उनके बाणों के अग्रभाग से प्रकट होकर अग्नि ने अनेकों ग्रामों, देश, नगरों , गौशालाओं को भस्म कर दिया। उन्होंने महात्मा वशिष्ठ मुनि के आश्रम को भी जला दिया । जिससे मुनि ने उनको श्राप दिया कि तेरी भुज को परशुराम काट डालेंगे । पर अर्जुन ने इस शाप पर ध्यान नहीं दिया।

।। कौन मेरा अन्त करेगा?।।

 

एक दिन कार्तवीर्य / सहस्त्रबाहु समुद्र के किनारे विचरता हुआ बल के घमण्ड में आकर सैकड़ों बाणों की वर्षा से उसने समुद्र को ढक दिया। तब समुद्र ने प्रकट होकर प्रार्थना की 'बाणवर्षा न कीजिये, इससे मेरे अन्दर रहने वाले प्राणियों की हत्या हो रही है। उन्हें अभय दीजिये और जो आपकी आज्ञा हो उसका मैं पालन करूँ'। उसने कहा कि मेरे समान धनुर्धर योद्धा वीर जो मेरा मुकाबला कर सके यदि कोई हो तो उसका पता बता दो। समुद्रने तब उसे जमदग्नि ऋषि के आश्रम पर जाने को कहा और कहा कि उनका पुत्र परशुराम तुम्हारा अच्छी तरह सत्कार कर सकता है।

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।। सहस्त्रबाहु का अन्त।।

 

यज्ञों में देवता इसे प्रत्यक्ष दर्शन देते थे। वर्षाकाल में यह समुद्र का वेगतक रोक देता था। एक बार वह पञ्च बाणों से ही अभिमानी रावण को उसकी सेना सहित मूर्च्छित करके बांध ले गया था। इच्छा करते ही इसके हजार भुजाएँ प्रकट हो जाती थीं। पद्मपुराण सृष्टिखण्ड के अनुसार  , युद्ध करते समय हजार भुजाएँ हो जाती थीं जिनमें बहुत बल होता था पर जो बहुत हलकी होती थीं, जिससे शरीरपर भार न पड़ता था। मार्कण्डेयपुराण में भी इसकी कथा है। उसमें स्पष्ट लिखा है कि उसकी सदा दो भुजाएँ रहती थी पर जब-जब लड़ता था तब उसकी हजार भुजाएँ हो जाती थीं। पर आगे चलकर यह बहुत उदण्ड हो गया। रथ और वर के प्रभाव से वीर, देवता, यक्ष और ऋषि सभी को कुचलने लगा। सभी प्राणी उसके द्वारा पीडित होने लगे। इस प्रकार पचासो हजार वर्ष इसने राज्य किया। और अन्त में परशुरामजी के हाथों मारा गया।

Reference of the story : Markandeya Puran Adhyay 18 to 20

and Manas Piyush

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चौपाई ३ : तेज कृसानु रोष महिषेसा । अघ अवगुन धन धनी धनेसा ॥ 

उदय केत सम हित सबही के । कुंभकरन सम सोवत नीके ॥३।।

 

[  तेज = ताप । कृसानु (कृशानु) = अग्नि। रोष = क्रोध। महिषेस = यमराज । अघ = पाप। धनी = धनवान्। धनेसा (धनेश) =  धन के स्वामी कुबेर। ये विश्रवा मुनिके पुत्र और रावणके सौतेले भाई थे। ब्रह्माजीने इन्हें देवता बनाकर उत्तर दिशाका अधिकारी बना दिया था। संसारभरके धनके स्वामी इन्द्रकी नवनिधियोंके भण्डारी और श्रीशिवजीके मित्र कहे जाते हैं। पूर्वजन्ममें ये ही गुणनिधि द्विज थे। ]

 

भावार्थ : वे क्रोध में यमराज के समान हैं, पाप और तेज ( अर्थात् दूसरों को जलाने वाले ताप) में अग्नि और अवगुण रूपी धन में कुबेर के समान धनी हैं, जिनकी तरक्की सभी के हित का नाश करने के लिये केतु (पुच्छल तारे / धूमकेतु) के समान है, और इसीलिए उनके कुम्भकर्ण की तरह सोते रहने में ही भलाई है ॥ ३ ॥ 

 

Meaning : In splendour they just like the Agni dev and in anger they vie (compete eagerly with someone) just like the Yamraj, who rides on a buffalo. Their richness in crime Is like Kubera (just like Kuber is the storehouse of richness , they are the storehouse of crime). Like the rise of a comet their advancement augurs is ill for others interests; and it's good for the world if they get into slumber (deep sleep) like Kumbhakarna.

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चौपाई ४ : पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं ॥ 

बंदउँ खल जस सेष सरोषा । सहस बदन बरनइ परदोषा ॥

 

[ परिहरहीं = त्याग देना। हिम उपल = ओले (बर्फ का पत्थर)। कृषी = फसल। दलि = नाश करके। गरहीं = गल जाते है। जस = समान। सरोषा = क्रोधपूर्वक। सहस : हजार। बदन = मुख। बरनइ = वर्णन। परदोषा = दूसरों के दोष।]

 

भावार्थ : जैसे ओले खेती का नाश करके अपने आप ही गल जाते हैं, वैसे ही वे दूसरों का काम बिगाड़ने के लिये अपने शरीर को तक छोड़ देते हैं (खुद मर जाएंगे लेकिन दूसरों का काम बिगड़ के ही मानेंगे)। मैं उन दुष्टों को हजार मुखवाले शेषनाग जी के समान समझकर प्रणाम करता हूँ, जो पराये दोषों का हजार मुखों से बड़े रोष (क्रोध) के साथ वर्णन करते हैं॥ ४॥

 

Meaning : They lay down their life in order to harm others, just like hail-stones dissolve after destroying the crop. I revere a wicked soul , considering them as a thousand - faced serpent-god Sheshnaag , as they eagerly expatiate (explain in detail) on others faults with their thousand tongues angrily.

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चौपाई ५ : पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना ।। 

बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही ॥५।।

चौपाई ६ : बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा ॥

 

[ पुनि = तत्पश्चात। प्रनवउँ = प्रणाम करता हूं। परअघ = पराए पापों को।  काना = कान। सक्र = इंद्र। बिनवउँ = प्रार्थना करता हूं। तेही = उसको। संतत = सदा। सुरानीक = सुरा+नीक = मदिरा अच्छी लगती है।  सुर+अनिक = देवताओं की सेना इंद्र के पक्ष में। हित = प्यारी। [ बज्र = इंद्र का शस्त्र। परदोष = (यहां इसका मतलब है) दोषों से परे, भगवान। ]]

 

भावार्थ : पुनः उनको राजा पृथु (जिन्होंने वरदान में भगवान्‌ विष्णु का यश सुनने के लिये दस हजार कान माँगे थे) , उनके समान जानकर प्रणाम करता हूँ, जो दस हजार कानों से भी दूसरों के पापों को ही सुनते हैं। फिर इन दुष्टों को इन्द्र के समान मानकर, उनकी विनय करता हूँ, जिनको सुरा (मदिरा) नीकी (अच्छी लगती है) और उनको उनके लिए हितकारी मालूम देती है। परंतु [इन्द्र के लिये सुरानीक का अर्थ है इंद्र के लिए देवताओं की सेना उनके पक्ष में है] {यहां “सुरानिक” शब्द एक जैसा है इसीलिए उसकी तुलना हुई है}॥५॥ जिनको वज्र के समान कठोर वचन सदा प्यारे लगते है और जो हजार आँखों से दूसरों के दोषों को देखते हैं ॥ ६ ॥

 

Meaning : Again, I bow to him thinking them as the Greatest king Prithu (who prayed for ten thousand ears in order to be able to hear the glories of the Lord to his heart’s content) , because those evil people, also use thousand ears but  just to hear the faults of others. Once more I supplicate to them as Indra (the lord of celestials) , because for them wine appears charming and but for him the army of gods is beneficial). Harsh Ianguage which is as harsh as Indra’s gada , is dear to them; and they are always busy in detecting others faults with their thousand eyes.

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सनातन स्पेशल

राजा पृथु के हजार कान

।। पृथु की उत्पत्ति।।

जब राजा वेन प्रजा में अधर्म का प्रचार करने लगा और महर्षियों के समझाने पर भी ना मन तब ऋषियों ने भगवान के निंदा करने वाले उसे दुष्ट को अपने हुंकार मात्र से (महाभारत शांति पर्व के अनुसार अभिमंत्रित कुशाओं से) मार डाला। फिर अराजकता से रक्षा के लिए उन्होंने प्रथम उसकी बाई जंघा को मथा जिससे निषाद की उत्पत्ति हुई। उसके जन्म से वेन के पाप दूर हो गए। तब उन्होंने वेन के हाथों का मंथन किया जिससे एक स्त्री पुरुष का जोड़ा उत्पन्न हुआ। दाहिने हाथ से पृथु और बाईं हाथ से अर्ची की उत्पत्ति हुई।

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।। बाल पृथु का रूप।।

 

पृथु जी के दक्षिण हस्त में विष्णु भगवान को हस्त रेखाएं और चरणों में कमल का चिन्ह देखकर महर्षियों ने जान लिया कि यह विष्णु के अंश अवतार है, क्योंकि जिसके हाथ में अन्य रेखाओं से बिना मिला हुआ चक्र का चिन्ह होता है वह भगवान का अंश हुआ करते हैं। और अर्चि लक्ष्मी जी की अवतार है। श्री पृथ्वी जी के शरीर पर दिव्य कवच सुशोभित था कमर में तलवार , कंधे पर अजगव नमक धनुष तथा बाण थे। वे वेद वेदांगों के ज्ञाता और धनुर्विद्या में पारंगत थे।

।। राजा पृथु का राज्य अभिषेक।।

 

प्रकट होने पर उन्होंने ऋषियों से कहा , “ मुझे धर्म और अर्थ का निर्णय करने वाली सूक्ष्म बुद्धि प्राप्त है। इसके द्वारा मुझे क्या करना चाहिए यह ठीक-ठाक बताइए।” देवताओं और महर्षियों ने कहा , “ जिस कार्य में तुम्हें धर्म की स्तिथि जान पड़े उसी को नि:शंक होकर करो। प्रिय अप्रिय की चिंता न करके सब जीवों के प्रति समान भाव रखो। काम , क्रोध , लोभ , मान को दूर से नमस्कार करो। सर्वदा धर्म पर दृष्टि रखो और जो धर्म से विचलित होता दिखाई पड़े उसे अपने बाहुबल से दमन करो। श्री शुक्राचार्य जी उनके पुरोहित बने , बालखिल्यों ने मंत्रि का काम संभाला। इंद्र , देवगण , भगवान विष्णु, प्रजापति, ऋषि, ब्राह्मण और आंगिरस तथा देवताओं के साथ ब्रह्मा जी (सब) ने मिलकर पृथु जी का राज्याभिषेक किया। कुबेर, इंद्र, पवन, ब्रह्मा आदि सभी ने उन्हें दिव्या दिव्या बेटे दी। 

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।। राजा पृथु का राज्य काल।।

 

उनके राज्य में बुढ़ापा दुष्कल आधी व्याधि तथा सर्प कोरिया आपस में एक दूसरे से किसी प्रकार का भय नहीं था। पृथ्वी बिना जोत हुए अन्य देती थी। उन्होंने पृथ्वी से सहस्त्र प्रकार के धन्य दुहे थे। उन्होंने लोक में धर्म की वृद्धि और सारी प्रजा का मनोरंजन किया था इसी से वह “राजा” नाम से प्रसिद्ध हुए। ब्राह्मणों का क्षति से त्राण करने के कारण वे “क्षत्रिय” हुए तथा उन्होंने धर्म अनुसार पृथ्वी को पालित किया इससे मेदिनी का नाम “पृथ्वी” हुआ। उन्होंने पृथ्वी को समतल कर पुर , नगर , दुर्ग आदि की योजनाकर सारी प्रजा को यथा योग्य बसाया।

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।। हजार कान का वरदान ।।

 

पूर्ववाहिनी सरस्वती-तटपर ब्रह्मावर्तक्षेत्र में श्रीपृथुमहाराज ने सौ अश्वमेधयज्ञ की दीक्षा ग्रहण की। निन्नानबे यज्ञ पूरे होने पर के अन्तिम यज्ञ में इन्द्र ने विघ्न्न किये। अनेक रूप धारण कर-करके उसने घोड़ा चुराया। कई बार ऐसा करने पर पृथुने इन्द्र को भस्म करनेका निश्चय किया। ज्यों ही उसके भस्म करने के लिये स्रुवा लेकर वे आहुति देने को हुए, ब्रह्माजीने आकर उनको रोक दिया। उनकी आज्ञा से राजाने अनुष्ठान निन्नानबे ही यज्ञोंसे समाप्त कर दिया, इन्द्रसे मित्रता कर ली। अवभृथस्रान से निवृत्त होने पर भाग पानेवाले वरदायक देवताओं ने इच्छित वरदान दिये। तदनन्तर भगवान् विष्णु इन्द्रसहित वहाँ आये और उनके गुण और शीलपर प्रसन्नता प्रकट करके उनसे वर माँगने को कहा। उन्होंने माँगा, ' हे नाथ! जहाँ महान् पुरुषों के हृदय से उनके मुखद्वारा बाहर निकला हुआ आपके चरण कमल का (कीर्तिरूप) मकरन्द नहीं है, उस पदको मैं कभी नहीं प्राप्त करना चाहता। बस, मेरा वर तो यही है कि आपके सुयश सुनने के लिये , आप मुझे दस सहस्त्र कान दें।”  (Shrimad Bhagwat Puran - 4.20.24) और इस प्रकार श्री प्रथम महाराज अपने दो कानों से ही 10,000 कान के बराबर श्री विष्णु जी का महान यश सुनते थे।

Reference : श्रीमद भगवतम पुराण , स्कंद ४ , अध्याय १५ से २०

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दोहा  ४ : उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति। 

जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति ॥ ४ ॥

 

[ उदासीन = जो किसी के लेने देने में ना हो। अरि = शत्रु। मीत = मित्र। रीति = स्वभाव। पानि = हाथ। जन = दास। ]

 

भावार्थ : दुष्टों की यह रीति है कि वे उदासीन ( शत्रु हो या मित्र) किसी का भी हित सुनकर जलते हैं। यह जानकर दोनों हाथ जोड़कर यह दास प्रेमपूर्वक उनसे विनय करता है॥४॥

Meaning : The wicked burn with jealousy as they hear of others welfare, be they his friends or enemies: such is their wont. Knowing thus, this humble soul makes loving entreaties (humble request) to them with joined palms.

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चौपाई १ : मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा ॥

बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा ॥ 

 

[ दिसि = ओर से। निहोरा = प्रार्थना। तिन्ह = वे। ओर = तरफ। लाउब = लगावेंगे। भोरा = भोलापन। न+लाउब+भोरा = भोलापन नही लावेंगे / अपना स्वभाव नहीं छोड़ेंगे। बायस = कौवा। पलिअहिं = पालिए। निरामिष = बिना मास का। आमीष = मास। कागा = कौआ। कि = क्या। ]

 

भावार्थ : मैंने अपनी ओर से तो विनती की है, परन्तु वे अपनी ओर से कभी नहीं चूकेंगे (सुधरेंगे)। कौओं को बड़े प्रेम से पालिये; परन्तु वे क्या कभी मांस के त्यागी हो सकते हैं? ॥१॥

 

Meaning : I for my side have made entreaties (humble request) to them; but  they will never fail to do their part / they will do what they want. Although , fondly you may nurture group of crows, can you ever expect ravens to turn vegetarians?

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